Thursday, July 21, 2016

श्री गुरु पूर्णिमा या व्यास पूजा


श्री गुरु पूजा का पर्व एक महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक पर्व है इसे श्री व्यास पूजा भी कहते हैं। संसार में आमतौर पर लोग ये समझते हैं कि द्वापरयुग के अन्त में प्रकट हुये महर्षि वेदव्यास जी के नाम पर ही श्री गुरुपूजा का पर्व श्रीव्यास पूजा रखा गया है लेकिन ये विचार सत्य नहीं है क्योंकि इतिहास कारों के अनुसार पुराणों में ब्राहृा जी से लेकर महर्षि वेदव्यास जी तक अट्ठाईस व्यासों की परम्परा मिलती है अर्थात सतयुग से लेकर द्वापर के अन्त तक 28 व्यास हुये हैं। वेदव्यास जी 28वें  व्यास हैं जिनका नाम कृष्णद्वैपायन था। कृष्ण इनका नाम था नदी के द्वीप में पैदा होने के कारण द्वैपायन कहलाये। इसलिये इनका नाम कृष्णद्वैपायन हुआ। इन्होंने ऋग्वेद का विस्तार करके उसको चार भागों में विभक्त करके अपने चारों शिष्यों को,पैल को ऋग्वेद,वैशम्पायन को यजुर्वेद,जैमिनी को सामवेद और सुमन्तु को अथर्ववेद का ज्ञान कराया। चार वेद बनाने और उनका ज्ञान कराने के कारण ये वेदव्यास कहलाये। चूँकि ये द्वापर केअन्त में हुये हैं इन से पहले भी सतयुग और त्रेतायुग में श्रीव्यास पूजा का पर्व मनाया जाता था। आदिकाल से ही शिष्य सतगुरु की पूजा अर्चना करता आया है इसलिये महर्षि वेदव्यास जी के नाम पर इस पर्व का नाम व्यास पूजा नहीं है। वि उपसर्ग के साथ अस धातु के लगने से व्यास होता है। व्यास का अर्थ होता है क्षेपण करने के, फैंकने के, विस्तार करने के, अलग अलग करने के। अर्थात जो सतऔर असत को अलगअलग करके जिज्ञासु के मन में बिठा दे उसे व्यास कहते हैं। गुरु शब्द का अर्थ भी अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला है।""गु''का अर्थअन्धकार और""रू''का अर्थ प्रकाश कीओर ले जाने वाला अर्थात जो अपने शिष्य के ह्मदय में मोह माया के अज्ञान का अन्धकार दूर करके आत्मज्ञान का प्रकाश करा दे सत और असत का भेद समझा दे वह गुरु है,सतगुरु है। जिसके हर पल सुमिरण से,पूजा आराधना से,ध्यान से और जिसकी कृपा से जीव केअन्दर जीव भाव काफूर होकर ब्राहृ को प्राप्त कर ले ऐसे सतगुरु का नाम ही व्यास है। ऐसे सतगुरु की पूजा ही श्रीव्यास पूजा है।
      ईश्वरीय महान विभूतियों सन्त महापुरुषों ने हर युग में समय समय पर जीवों के उपकार के लिये संसार मेंअवतार लिया। उन महापुरुषों केअलौकिक गुणों की गरिमा महिमा गायन करने के लिये और उनके द्वारा किये गये महान उपकारों के लिये आभार प्रकट करने के लिये हर वर्ष संसार में जयन्तियाँ या पर्व मनाये जाते हैं। जैसे भगवान श्री राम जी केअवतरित दिवस पर रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, श्री गुरुनानक जयन्ति,बुद्ध पूर्णिमा आदि। उन महापुरुषों के चरणों में जन समाज उनके उपकारों के प्रतिआभार प्रकट करने के लिये प्रति वर्ष निश्चित तिथी में भावभीनी श्रद्धाँजलि अर्पित करता है। इसी उद्देश्य से ही सतगुरु के द्वारा किये गये महान उपकारों और एहसानों के प्रति आभार प्रकट करने के लिये हर वर्ष श्री गुरु पूजा का पर्व बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।
    अनादि काल से ही ये मर्यादा चली आई है कि शिष्य अपने विद्या गुरु, कुल गुरु,दीक्षा गुरु और सतगुरु की पूजा निष्ठा से करता आया है। शिष्य के अन्दर सदशिक्षा,सदाचरण और शुभ विचारों को भरने वाला गुरु ही है और चौरासी से छुड़ाकर परमात्मा से मिलाने वाला सतगुरु है।जब से जीव संसार में जन्म लेता है उसे जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरे जीवन में पग पग पर गुरु की आवश्यकता होती है। यहाँ तक कि मृत्यु के उपरान्त भी परलोक में सतगुरु के बिना जीव की गति नहीं होती। गुरु बिन गत नहीं शाह बिना पत नहीं। चाहे कोई कितना ही बुद्धिमान है,चतुर है,सयाना है,विद्वान है,विद्वता को प्राप्त है वह सब कुछ अपने आप नहीं सीख गया। पैदा होते ही उसे किसी न किसी से चलना बोलना, खाना पहनना, यहां तक कि खेलना भी सीखना पड़ता है। उसे आप माँ बाप,भाई,बहन,मित्र,कुछ भी कह सकते हैं। बचपन से लेकर बड़े होने तक उसे कई तरह के शिक्षक अपनाने पड़ते हैं। कुछ बड़ा होने पर स्कूल में उसे हिन्दी अंग्रेज़ी,गणित,विज्ञान केअलगअलग शिक्षक मिले। कालेज में जाने पर उसे फिलासफी, कानून,इन्जिनियरिंग, डाक्टरी आदि के विद्याओं को ग्रहण करने के लिये कोई न कोई शिक्षक या गुरु की आवश्कता होती है तो आत्म ज्ञान को प्राप्त करने के लिये,परमात्मा की प्राप्ति को लिये क्या गुरु की आवश्यकता नही है? जिस परमात्मा का हमें पता ही नहीं है वह कैसा है कहां रहता है,कितनी दूर है,वह बिना सतगुरु की राहनुमाई के कैसे प्राप्त किया जा सकता है? गुरुबिन भवनिधि तरे न कोई। जे विरंची शंकर सम होई।।भले ही कोई ब्राहृा और शिव की पदवी तक पहुँच जाये लेकिन सतगुरु के बिना भव से पार होना असम्भव है।  संसार में अब तक जितने भी ऋषि मुनि,सिद्धसाधक योगी भक्त इत्यादि हुये हैं उन्होने सतगुरु की शरण में आकर ही लाभ उठाया है और ऊंची पदवी को प्राप्त हुये और संसार में पुज्यनीय कहलाये। स्वामी विवेक आनन्द जी पर रामकृष्ण जी की कृपा थी। शिवा जी पर समर्थ गुरु रामदास जी का हाथ था।अर्जुन के ऊपर भगवान श्री कृष्ण जी का अनुग्रह था। हम नित्य प्रति श्री आरती पूजा में स्त्रोत में पढ़ते हैं।
        शुक सनकादिक,ध्रुव नारदादिक गुरु उपदेश ते अमरणम।
        ऋषि  मुनि  जन  प्रकृत जग में लै दीक्षा प्रभु सुमिरणम।
शुकदेव जी को गर्भयोगीश्वर कहा जाता है। जब वह माता के गर्भ में ही थे तो उन्हें ज्ञान प्राप्त था परन्तु बिना गुरु के वे भी मोक्ष के अधिकारी नहीं हुये। जब उन्होने महाराज जनक जी को गुरु धारण किया तो वह मोक्ष के अधिकारी हुये।
          गर्भ योगीश्वर गुरु बिना लागा हरि की सेव।
          कहें  कबीर वैकुण्ठ से फेर दिया शुकदेव।।
          जनक विदेही गुरु किया लागा हरि की सेव।
          कहें कबीर वैकुण्ठ में फेर मिला शुकदेव।।
सनक,सनन्दन,सनत कुमार,सनातन और देवर्षि नारद जी ब्राहृा जी के मानस पुत्र कहलाते हैं। गुरुदेव की कृपा से उनसे नाम दीक्षा लेकर सुमिरण किया
तभी वे अमरपद को प्राप्त हुये। धनी धर्म दास जी परम सन्त श्री कबीर
साहिब जी के शिष्य हुये हैं,वे गुरु महिमा में वर्णन करते हैं।
अखिल विवुध जग में अधिकारी। व्यास वशिष्ठ महान आचारी।
गौतम कपिल कणाद पातञ्जलि।जौमिनी बाल्मीकि चरणन बलि।
ये सब गुरु की शरणहिं आये। तासे जग में श्रेष्ठ कहाये।।
विश्व में जितने भी ऋषि मुनि,राजर्षि,महर्षि,ब्राहृर्षि,देवर्षि हुयें हैं उदाहरण देते हैं गौतम,कपिल,कणाद,पातञ्जलि,वेदव्यास,वसिष्ठ,बाल्मीकि आदि ये सब शास्त्रों के रचियता, ब्राहृनिष्ठ उच्चकोटि के महापुरुष हुये हैं सभी गुरु की शरण में आये उनकी सेवा करके उनकी प्रसन्नता व कृपा के पात्र बने तब ही जग में श्रेष्ठ और पुज्यनीय हुये। परमात्मा की प्राप्ति जब भी होगी गुरु के माध्यम से ही होगी और कोई साधन है ही नहीं। प्रभु ईसामसीह ने भी अपने शिष्यों के समक्ष ये घोषणा की थी।
क्ष् ठ्ठथ्र् द्यण्ड्ढ ड्डदृदृद्ध द्यण्द्धदृद्वढ़ण् त्द ध्र्ण्त्ड़ण् न्र्दृद्व ण्ठ्ठध्ड्ढ द्यदृ ड्ढदद्यड्ढद्ध द्यदृ थ्र्ड्ढड्ढद्य ण्त्थ्र्.
अर्थात मैं वह द्वार हूँ जिसमें से गुज़र कर ही प्रभु से मिलाप हो सकता है। और कोई रास्ता नहीं है।
ड़दृथ्र्ड्ढ द्वदद्यदृ थ्र्ड्ढ ठ्ठदड्ड त् द्मण्ठ्ठथ्थ् ड्डत्द्मद्रड्ढथ् ठ्ठथ्थ् द्यण्न्र् द्मद्वढढड्ढद्धत्दढ़द्म.
मेरी शरण लो मैं तुम्हारे सब दुखों को नाश कर दूँगा।
भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी अर्जुन के माध्यम से हमें गीता का सन्देश दिया है कि ऐ अर्जुन तू सब धर्मों को छोड़कर एक मेरी शरण में आजा मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा इसमें तनिक भी संशय न कर। स्मरण रहे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के सतगुरु हैं जो उसे मार्गदर्शन कर रहे हैं। क्योंकि भगवान श्री कृष्ण स्वयं अर्जुन के सामने खड़े हैं अर्जुन दर्शन भी कर रहा है तो भी श्री कृष्ण जी कह रहे हैं कि अर्जुन तू मुझे इन आँखों से नहीं देख सकता मुझे देखने के लिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ। सिद्ध है भगवान का स्वरूप और है जिसे प्राप्त करना है। संसार में जितने भी मत मतान्तर हैं सम्प्रदाय हैं सभी ने एक ही बात पर जोर दिया है सबके एक ही मूल सिद्धान्त हैं सतगुरु के बिना अपने अन्दर में दिव्य ज्योति के दर्शन करना असम्भव है।
                  लख पीर पैगम्बर औलिया मुल्ला काजी शेख।
                  किसे शान्त न आया बिन सतगुरु के उपदेश।।
  एक बार देवर्षि नारद जी भ्रमण करते हुये वैकुण्ठ लोक में पहुँच गये तो उन्होने भगवान को अकेले और उदास बैठे पाया तो नारद जी ने विनय की भगवन आप अकेले ही और उदास बैठे दिखाई दे रहे हैं। उचित समझें तो मुझे उदासी का कारण बताने की कृपा करें। भगवान ने कहा नारद मैंने ये सृष्टि बनाई इसमें पशु पक्षी कीड़े मकौड़े जानवर पेड़ पौधे इत्यादि सब बनाये थे तो मुझे कोई परेशानी नहीं थी लेकिन जब से मैने मनुष्य को बनाया है तब से ही परेशान हो गया हूँ। कारण ये है कि बाकी सब जीव जन्तु को कोई माँग नहीं थी जैसा उनको बना दिया उसी में वे सन्तुष्ट थे लेकिन ये मनुष्य ऐसा है कि इसकी माँगें ही पूरी होने में नहीं आती। रोज द्वार पर खड़ा हो जाता है आज मुझे फलाँ चीज़ चाहिये आज मुझे ये चाहिए वो चाहिए इसकी माँग ही इतनी हैं कि पूरी होने में ही नहींआती। फिर इससे छिपकर मैं समुन्द्र में जाता हूँ तो ये पनडुब्बी लेकर वहाँ भी पहुँच जाता हैं हिमालय पर जाता हूँ तो ये वहाँ भी पहुँच जाता है, चन्द्रमा पर जाता हूँ मंगल पर जाता हूँ सब जगह ये पहुँच जाता है। अब ये सोचता हूँ कि ऐसी कोई जगह मिले जहाँ ये मनुष्य न पहुँच सके। इसलिये परेशान  हूँ। नारद जी ने विनय की भगवन एक सुझाव देता हूँ अगर आपको पसन्द आये तो प्रयोग करके देख लें हो सकता है आपकी समस्या का समाधान हो जाये। वो सुझाव ये है कि मनुष्य हमेशा आपको बाहर की चीज़ों में ढूँढने की कोशिश करता है आप इसके अन्दर छिपकर बैठ जायें यो कभी भी अन्दर झाँकने का प्रयत्न नहीं करेगा। इसलिये ये आपको ढूँढ नहीं पायेगा। भगवान ने कहा सुझाव तो तुम्हारा ठीक है लेकिन इसमें एक समस्या ये है कि ये मुझे ढूँढ नहीं पायेगा तो आनन्द से हमेशा वंचित हो जायेगा। सदा दुःखी रहेगा। ये मुझे अति प्यारा भी है। मैं नहीं चाहता कि ये दुखी रहे क्योंकि इसे दुःखी रहने के लिये भी तो नहीं बनाया। नारद जी ने कहा इसका सीधा सा
हल है कि जो संसार के पदार्थों की चाह करे वह तो आपने संसार में भरपूर कर दिये हैं। अगर कोई केवल आपकी ही चाहना करे तो उसे आप स्वयं सतगुरु बनकर अपनी लखता करा सकते हैं। भगवान ये सुझाव सुनकर अति प्रसन्न हुये। सन्त सहजो बाई जी ने कहा है।
हरि ने मौ सूँ आप छिपायो। गुरु दीपक दे ताहि लखायो।
कि हरि ने स्वयं को मुझसे छिपा लिया परन्तु सतगुरु ने ज्ञान का दीपक देकर हरि का पता बता दिया है। सतगुरु की महिमा उनके अलौकिक गुणों के वर्णन से शास्त्र भरे पड़े हैं। फिर भी सतगुरु की महिमा का वर्णन नहीं हो सकता। इसीलिये तो कहा है:-
       सब  धरती  कागज  करूँ  लेखनी  करूँ  बनराय।
       सात समुन्द की मसि करूँ गुरु गुण लिखा न जाये।।
इतनी महिमा है सतगुरु की। जिस सतगुरु ने भव से पार लगाया, चौरासी से छुड़ाकर परमात्मा से मिलाया और भी अनन्त उपकार किये ऐसे सतगुरु के उपकारों के प्रति श्रद्धा और आभार प्रकट करने के लिये वर्ष में एक दिन तो नियुक्त होना ही चाहिए।
प्राचीन काल में आजकल की तरह स्कूल या विद्यालय नहीं हुआ करते थे। उन दिनों गुरुकल आश्रम होते थे। जिनके संचालक ब्राहृनिष्ठ उच्चोकोटि के सन्त महापुरुष हुआ करते थे। विद्यार्थी इन गुरुकुल आश्रमों में रहकर राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक और नैतिक विद्या ग्रहण करते थे इन विद्याओं के साथ साथ आध्यात्मिक विद्या भी पढ़ाई जाती थी कि किस प्रकार संसार में रहकर संसार के कार्य व्यवहार करते हुये जीवन को सुखी एवम सफल बनाया जा सकता है। विद्यार्थी अपने जीवन के प्रथम पच्चीस वर्ष इन्हीं गुरुकुल आश्रमों में ही व्यतीत करता था। जब वह इन विद्याओं में पारंगत हो जाता था तो अपने सतगुरु की आज्ञा से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। उस समय ये नियम और मर्यादा बाँधी गई कि जिस परोपकारी सतगुरु ने जीवन जीने का ढंग औरआत्मकल्याण का मार्ग सुझाया है उनके  उपकारों के प्रति जीवन के निर्माण और व्यवसायों को करते हुये भी वर्ष के 365 दिन में से एक नियुक्त किया जाये।आषाढ़ पूर्णिमा का पवित्र दिन इस मांगिलक कार्य के लिये नियुक्त किया गया कि शिष्य इस दिन अपने सतगुरु के श्रीचरण कमलों में सादर नतमस्तक होकर दण्डवत प्रणाम करे। अपनी श्रद्धानुसार पत्र,फल,तिल,पुष्पादि भेंट करे। सतगुरु के चरणों के समक्ष बैठकर अपने अवगुणों का उल्लेख करते हुये उनसे अपने अपराधों, पापों, त्रुटियों और भूलों के लिये क्षमा याचना करे और विनयपूर्वक प्रार्थना करे कि हे गुरुदेव मुझे ऐसा शुभाशीर्वाद प्रदान करें ऐसा बल प्रदान करें कि मैं आपके आदेशों निर्देशों आदेशों पर चलता हुआ आपकी श्री आज्ञानुसार जीवन के रथ को चलाता हुआ आपकी प्रसन्नता एवम कृपा का पात्र बन जाऊँ। ये था उद्देश्य गुरु पूजा के पर्व का।
     हम सब अति सौभाग्यशाली हैं जो हमें श्री सतगुरुदेव दातादयाल जी की चरण शरण और उनकी राहनुमाई प्राप्त हुई है। हमारा कर्तव्य है कि उनकी पूजा आराधना करते हुये, उनका पावन वचनों अनुसार अपने जीवन को ढालते हुये सतगुरु की प्रसन्नता को प्राप्त करके अपने जीवन को सुखमयी बनायें और परलोक भी सँवार लें।

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