Tuesday, July 19, 2016

भक्ति गुरु-मौज में है


""पूर्ण सन्त सद्गुरु की मौज के अनुसार जो भी कार्यवाही है उसका नाम "भक्ति' है। यदि सेवक सही ढंग पर भक्ति पथ पर चले तो कोई कारण नहीं है कि सच्ची प्रसन्नता और आत्मिक शक्ति उसके ह्मदय में न आवे।'' सहरुाों मनुष्यों की यह शिकायत होती है कि हम भक्ति भी करते हैं किन्तु एक न एक दुःख हमारा पीछा नहीं छोड़ता-उन्हें सूक्ष्म बुद्धि से अन्तर्मुख होकर देखना चाहिये कि भक्ति किसकी हो रही है? मालिक की अथवा कामनाओं की। कामनाओं की भक्ति मन को स्थूलतर बनाया करती है। शत्रु प्रबल और आत्मा निर्बल होने लगती है। परिणाम इसका उलटा ही निकलता है। मन से इस तरह हम धोखा खा जाते हैं। प्रभु की आज्ञा में चलने से तो मन मरता है। मनुष्य सर्वथा सुप्रसन्न रहता है। सुख-दुःख में समान रहने की शक्ति उसमें आ जाती है। निन्दा-स्तुति उसे स्पर्श भी नहीं कर सकती। वह कभी भी शिकायतें नहीं करता। शिकायतें करने वाला तो एक प्रकार से अपने मालिक को ही लज्जित करता है। जो सदा रोता ही रहे कि अमुक ने मुझे दुःख दिया है-अमुक ने मेरा आदर नहीं किया-उससे पूछा जाये कि तुम अपने सम्मान के पुजारी हो या अपने गुरुदेव के? यदि गुरुदेव की पूजा करते हो और तुम्हारा सब काम-काज उनकी मौज में हो रहा है तो तुम्हारी सेवा सफल हो गई कोई यदि तुम्हारा मान करता है तो वह अपना ही भला करता है-नहीं करता तो वह जाने और उसका अपना धर्म जाने। तुम्हें इससे क्या? प्रत्येक ने अपना अपना धर्म निभाना है। हम यदि दूसरों की ओर ध्यान देंगे तो अपनी शान्ति को खो बैठेंगे। यदि इस जीवन में शान्ति का मुँह देखना है तो हमें यह बात आज ही भुला देनी चाहिये कि सब लोग मेरी इच्छा के अनुसार चलें। जब तक यह आशा मन में बनी रहेगी तब तक चिन्ता हमारा पीछा करती रहेगी। हमारा धर्म तो यह है कि हम सन्त सद्गुरु महापुरुषों की मौज और आज्ञा के अनुसार चलते चलें-इस तरफ हम ध्यान ही क्यों दें, कि लोग हमारे विषय में क्या कह रहे हैं? यदि हम अपने मन में अपने आप को बड़ा समझेंगे तो बड़ाई हमारे निकट नहीं आ सकती यह आत्मिक विद्या का अचल नियम है।
    विश्व में विविध प्रकार के लोग देखने में आते हैं। कई तो ऐसे हैं जिनके पीछे समस्त संसार के पदार्थ क्या भोज्य और क्या पहनने के अर्थात् सब प्रकार की सुखदायक वस्तुएं दौड़ी चली आती हैं यदि वे उन्हें स्वीकार करते हैं तो वे वस्तुएं और उनके देने वाले अपने को भाग्यशाली समझते हैं तथा वे लेने वाले को धन्यवाद देते हैं। दूसरे लोग ऐसे हैं जो पदार्थों के पीछे चकित और चिन्तित हैं किन्तु वे पदार्थ उनके हाथ नहीं आते। गहरी दृष्टि से देखा जाये तो इसका आधार भी मनोवृत्ति है। मन में यदि पूर्ण वैराग्य और त्याग है तो सांसारिक पदार्थों को तुम्हारे चरणों तक भाग भाग कर पहुँचना ही होगा। मार्ग में उन्हें कोई रोक नहीं सकता यदि कहीं आने वाले पदार्थ रास्ते में रुक जावें तो इसके दोषी हम होंगे। प्रथम तो हम त्याग व वैराग्य से रुक गये होंगे और पीछे बाहर के संसार में रोक आई होगी। अतः हम जितना सुधार करें तो अपने अन्दर को ही सँवारें बाहर की चिन्ता करने का दायित्व हम पर नहीं है। हम बीज़ बोयें और उनकी रक्षा करें-उन्हें खाद और जल दें फल की आशा रखें या न रखें यह तो विधि ने देना ही है। समय पर सब कुछ हो जायेगा। एक बात और भी है कि कर्म के फल पर अपनी भावनाओं का भी प्रभाव पड़ता है।
      कथा हैः-मनुष्य के मन के विचारों तथा उसकी भावनाओं का प्रभाव केवल मनुष्य पर ही नहीं होता, प्रत्युत् पशु, पक्षियों एवं पेड़ों को भी वे प्रभावित किये बिना नहीं रहतीं। एक राजा आखेट के लिये वन में गया और साथियों से बिछुड़कर मार्ग भूल गया तथा दो तीन दिन भूखा-प्यासा भटकता रहा। भूख-प्यास से मरणासन्न हो रहा था कि उसे एक उद्यान दिखाई दिया। भूखे प्यासे भटकते रहने से यद्यपि शरीर निढाल हो रहा था, अत्यन्त कठिनाई से उद्यान में पहुँचा। वहां अनार के हरे-भरे पेड़ों को देखकर जान में जान आई।माली को संकेत से निकट बुलाया और उससे फलों का रस मांगा। माली वस्तुतः एक महात्मा थे, जिन्होंने अपने आश्रम में वह उद्यान लगा रखा था। उन्होंने पके हुये अनार तोड़े, उनका रस निकाला और गिलास भरकर राजा को दिया। रस पीकर राजा की जान में जान आई। उसने कहा कि ऐसा ही रस का एक गिलास और भी भर कर ला दो।
     महात्मा जी अब की बार जब पके अनार तोड़ने के लिये गये,तो एक भी अनार पका हुआ दिखाई न दिया। विवश होकर वे अधपके अनारों को तोड़कर रस निकालने का प्रयत्न करने लगे। काफी देर बाद वे केवल आधा गिलास रस लेकर राजा के पास आये। राजा ने पूछा कि पहली बार जब आप रस लेने गये थे, तो मिनटों में ही गिलास भरकर ले आये थे, परन्तु अब की बार आप काफी देर बाद लौटे हैं, फिर भी रस का आधा गिलास ही लाये हैं। इसका क्या कारण है? महात्मा जी ने उत्तर दिया-क्षमा कीजियेगा, मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि पहली बार जब आपने रस मांगा था, उस समय आपके मन में शुभ भावना थी, जिसके प्रभाव से जब मैं पेड़ों के पास गया, तो मुझे तुरन्त पके अनार दिखाई पड़ गये। उनको तोड़कर और दाने निकालकर निचोड़ा, तो तत्काल ही गिलास रस से भर गया। किन्तु अब की बार कदाचित आपकी भावना में कुछ अन्तर आ गया था, जिसके प्रभाव से सब पेड़ मुरझा गये थे। मैं प्रत्येक पेड़ के पास गया, परन्तु मुझे एक भी पका हुआ अनार दिखाई न पड़ा। मैं मन ही मन बड़ा चकित हुआ और सोचने लगा कि अभी अभी इन पेड़ों को क्या हो गया है? जब मुझे कोई पका अनार न मिला, तो मैने कच्चे पक्के अनार तोड़े, परन्तु जब रस निकालने लगा तो देखा कि दाने सूखे हुये हैं। बहुत प्रयत्न करने पर और बहुत से अनारों के दानों को निचोड़ने पर भी रस का गिलास नहीं भरा गया। राजा भी सत्यवादी था। उसने अपना अपराध स्वीकार करते हुये कहा महात्मन्! मैं इस देश का राजा हूँ। पहली बार जब आप रस लेने गये थे, तब मैंने मन ही मन विचार किया था कि आपके हाथ से रस पीकर मैं आपको प्राणदाता मानूँगा और आपके गुण गाऊँगा। किन्तु जब दूसरी बार आप रस लेने के लिये गये, तो मेरे मन में विचार उठा कि आपके पास तो बहुत बड़ा बाग है और इससे आपको बहुत आय होती होगी, अतएव आप पर राजस्व लगाना चाहिये। वास्तव में मेरी इस दुर्भावना का फल ही मुझे प्राप्त हुआ है कि रस का गिलास भी न मिल सका। मैं आपको वचन देता हूँ कि भविष्य में कभी भी किसी के प्रति कुभावना को मन में प्रविष्ट न होने दूँगा। आप जैसे महान सन्त की पल भर की संगति ने मेरा ह्मदय प्रकाशमान कर दिया है। सन्त उपदेश करते हैं कि अपनी भावनाओं को शुभ बनाने का यत्न करते रहो। इससे मालिक भी प्रसन्न रहते हैं। जिससे आपका जीवन भी खुशी से बीतता है और परलोक भी संवरता है।
     इसीलिये हमें श्री गुरुमहाराज जी अपने धर्म पर दृढ़ रहने की शिक्षा देते हैं-हम जितनी सच्चाई से श्री गुरुमहाराज जी कीआज्ञा को शिरोधार्य करेंगे उतनी ही शीघ्रता से ऋद्धियां-सिद्धियां हमारे निकट दौड़ी चली आएंगी। इन आध्यात्मिक भेदों को सर्वसाधारण मनुष्य नहीं समझ सकता। ऐसा भी हो सकता है कि हम अपने मन में समझते हों कि हम श्री गुरुमहाराज जी की मौज के अनुसार सेवा कर रहे हैं परन्तु वस्तुतः हम उनकी मौज से लाखों कोस दूर होते हैं। कारण यह कि हम मालिक की मौज और आज्ञा में अपने मन को सम्मिलित कर देते हैं और मन हमें धोखे में डाल कर झूठ को सच बता देता है। यद्यपि हम माया के धोखेमें आ चुके होते हैं। फिर भी मन हमें निश्चय कराता है कि तुम भक्ति कर रहे हो। भला भक्तिमान पुरुष भी कभी अशान्त रह सकता है? सुखदाता श्रीसद्गुरुदेव जी की आज्ञा रुपी मुकुट जिसके सिर पर हो उसपर सद्गुरु सर्वदा कृपालु हैं। उनका अदृश्य हाथ उसके साथ है उसे फिर क्या कमी? इस लोक में तो क्या परलोक में भी ऐसा सुखी कोई नहीं जैसा सुखी पूर्ण सद्गुरु का सच्चा सेवक है।

 वाकः-   सभे सुख  भये  प्रभ तुठे। गुर  पूरे के  चरण मनि बुठे।।
         सहज समाधि लगी लिव अन्तरि-सो रसु सोई जाणै जिउ।। गुरुवाणी माझ महला 5
कथन करते हैं कि भक्ति के रस को जानने वाला केवल भक्त ही जानता है कि वह कैसा मीठा और निर्मल रस है। क्योंकि उसकी तार आनन्द स्वरुप प्रभु से जुड़ी रहती है वहां से अमृत की धारा सर्वदा ही झरती रहती है। जिसे पीकर भक्त की आत्मा सदा तृप्त रहती है। इसी हेतु उसे संसार की तृष्णा या मोह ममता कभी भी सता नहीं सकती। ऐसा कोई सुख शेष नहीं रहता जो भक्त को न मिले। आगे महापुरुष उसी शब्द के अन्दर भक्तों की दशा का वर्णन करते हैंः-
                प्रभ मिलने की एह निसाणी। मनी इको सचा हुकमु पछाणी।।
                सहज सन्तोखि सदा त्रपतासे। अनदु खसम  कै भाणै जीउ।।
                                              गुरुवाणी माझ महला 5.पृ.106
जिसे मालिक का मिलाप हो चुका है उसकी निशानी यह है कि मन एकाग्र होकर प्रभु की आज्ञा में जुड़ जाता है। वह अपने मन को इधर उधर भटकाता नहीं। सदा ही आज्ञाकारी रहता है। चाहे उसे कितना लोभ दिया जाय अथवा डराया धमकाया जाय- किन्तु वह प्रभु की लकीर से बाहर कदापि नहीं आता- न ही वह किसी के बहकाने से किसी लालच में आता है और किसी के दबाव से वह भयभीत भी नहीं होता है। उसे दृढ़ विश्वास है कि मैं यदि सद्गुरु की आज्ञा अर्थात् शब्द की रेखा के भीतर रहूँगा तो कोई मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकता क्योंकि गुरु का शब्द मेरा प्रहरी है-शत्रु की क्या शक्ति कि शब्द की सीमा के अन्दर प्रवेश करके मुझे हानि पहुँचा सके। वाक हैः-
                ""गुरु का सबदु रखवारे-चौकी चौगिरद हमारे।''
                 ""चौगिर्द हमारे रामकार, दुःख लगै न भाई।।''
उसकी सुरत मालिक की मौज में भीजी रहती है उसे तो यह विश्वास है कि जो कुछ हो रहा है मेरे प्रभु की मौज में ही रहा है और इसी में ही मेरी भलाई निहित है। ऐसा दृढ़ संकल्प रखने वाला भक्त दुःख को भी सुख में बदलने की शक्ति रखता है। जैसे गर्म लू पसीने से तर बदन से टकरा कर ठण्डी वायु बन जाती है वैसे ही बड़ी से बड़ी कठिनाई एक पूर्ण भक्तिमान पुरुष के पास आकर स्वयं सुगम बन जाती है। इसलिये सत्पुरुषों ने अपने प्यारे सेवकों को यही शिक्षा दी है कि तुम और उपायों को त्याग कर गुरु शब्द की कमाई करो तुम्हारी समस्त उलझने गुरु शब्द की कमाई से सुलझ जाएंगी। कथा हैः-
छठी पादशाही श्री हरिगोबिन्द साहिब जी के बढ़ते हुये यश को देखकर चन्दू हर समय अपने मन में ईष्र्या-द्वेष की अग्नि में जलता रहता था। एक बार उसने आगरा के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी को लालच देकर इस बात पर राज़ी कर लिया कि वह बादशाह जहांगीर के पास जाये और रमल फेंककर अथवा किसी अन्य प्रकार से उसे यह विश्वास दिलाये कि बादशाह के ऊपर साढेसाती आने वाली है। यह साढ़े साती बादशाह पर बहुत भारी है। जिसमें बादशाह के प्राण जाने का भी भय है। जब बादशाह इस साढ़ेसाती से बचने का उपाय पूछे, तो उससे यह कहे कि श्री गुरुहरिगोबिन्द साहिब जी को चालीस दिन ग्वालियर के किले में नज़र बन्द किया जाये और उनसे यह कहा जाये कि वे बादशाह के कुशल क्षेम के लिये मालिक के आगे प्रार्थना करें। ज्योतिषी लालच में आ गया। चन्दू के कहे अनुसार वह बादशाह के पास गया और उसे साढ़ेसाती का भय दिखाकर कहा कि यदि आप गुरु हरिगोबिंद साहिब को चालीस दिन के लिये ग्वालियर के किले में रखेंऔर वे वहां रहकर आपके लिये मालिक से प्रार्थना करें, तो आपका कष्ट टल सकता है। बादशाह बहकावे में आ गया। उसने गुरुमहाराज जी से विनय की कि आप चालीस दिन ग्वालियर के किले में रहकर मेरे स्वास्थ्य के लिये मालिक से प्रार्थना करें। महापुरुषों की प्रत्येक कार्यवाही जीवों के हित एवं कल्याण के लिये ही होती है। उनके प्रत्येक कार्य में कोई न कोई रहस्य छिपा होता है, जिसे वे स्वयं ही जानते हैं, साधारण जीव उन रहस्यों को क्योंकर जान सकते हैं? श्री गुरुमहाराज
जी ने किले में जाना स्वीकार कर लिया। ग्वालियर के किले में उन दिनों बावन राजा कैद थे, जिन्हें अकबर ने किले में नज़रबन्द किया था और जो अब तक वहीं कैद थे। वे जीवन से पूरी तरह निराश हो चुके थे और दुःखों चिंताओं में घुल-घुल कर उनके शरीर अस्थिपिंजर मात्र रह गये थे। श्री गुरुमहाराज जी के किले में पदार्पण करते ही वहां सतसंग की पवित्र-निर्मल धारा प्रवाहित होने लगी। महापुरुषों के पावन दर्शन करके तथा उनके कल्याणकारी वचनों को श्रवण करके मुर्दा शरीरों में फिर से जान पड़ गई। उनकी सब चिंतायें, दुःख तथा कष्ट काफूर हो गये। वही किला जो पहले उनके लिये बन्दीगृह था, महापुरुषों के वहां चरण डालते ही अब बैकुण्ठ से भी अधिक सुखदायी बन गया। सभी गुरुमहाराज जी के सेवक बन गये और उनके दर्शन एवं सतसंग के अमृत पान करने के साथ-साथ उनके वचनानुसार नाम का सुमिरण करने लगे। सत्संग के प्रताप से अब उनकी सुरति की धारा राजपाट और अन्य शारीरिक सुखों स हटकर गुरु शब्द में जुड़ गई। इस शुभ कर्म से उनकी अशेष चिन्ताएं काफूर हो गर्इं। यह सब प्रताप सत्पुरुषों के दर्शन एवं वचनों का था सत्पुरुषों ने उन्हें दुःख को सुख में बदलने की अनोखी युक्ति बतला दी थी। जिस पर सभी राजा आचरण कर रहे थे। महापुरुषों के शब्द के अनुसार आचरण करने से उनके चित्त पर पड़े हुए मोह-माया के आवरण हट गये। सुरति विनिर्मल होकर सब बन्धनों से विमुक्त हो गई।
     इसी प्रकार कई महीने बीत गये। इधर बादशाह जहांगीर को वास्तव में ही रोगों ने घेर लिया और धीरे-धीरे उसका स्वास्थ्य बहुत गिर गया। तब लाहौर के सूफी फकीर मियांमीर ने दिल्ली आकर बादशाह को समझाया कि यह सारा कष्ट तुम्हारे ऊपर इसलिये आया है, क्योंकि तुमने दुष्ट लोगों के बहकावे में आकर गुरु हरिगोबिंद साहिब को, जो कि पूर्ण महापुरुष हैं, ग्वालियर के किले में नज़रबन्द कर दिया। आज इस बात को कई महीने हो गये। यदि भलाई चाहते हो,तो उन्हें तत्काल सम्मानपूर्वक रिहा कर दो। जब बादशाह ने गुरु महाराज जी की रिहाई का सन्देश भेजा, तो गुरु महाराज जी ने उत्तर में बादशाह को कहलवा भेजा कि हमारे साथ इन सब राजाओं को भी स्वतन्त्र करो तो ठीक अन्यथा हम भी इस किले से बाहर नहीं जायेंगे। तब बादशाह ने दोबारा सन्देश भिजवाया कि जितने राजा आपके चोले को पकड़ लेंगे, वे सब आपके साथ बाहर जा सकेंगे। तब गुरुमहाराज जी ने बावन कलियों वाला चोला बनवाकर पहन लिया। प्रत्येक राजा ने एक एक कली पकड़ ली और गुरुमहाराज जी की कृपा से कैद से मुक्ति प्राप्त की।
     यह सब महिमा महापुरुषों की है जो कि सेवकों को लोक परलोक के दुःखों से छुटकारा दिला देते हैं। महापुरुष तो संसार में अवतरित ही इसीलिये होते हैं ताकि वे जीवों को दुःखों, कष्टों तथा चिंताओं की ज्वाला से निकाल कर, चौरासी की कैद से छुड़ाकर, उन्हें सुख एवं आनन्द प्रदान करें और उन्हें हर प्रकार के बन्धन से मुक्ति दिलायें। इसलिये यदि सुख और आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करते हुये जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त करने की इच्छा है, तो फिर सच्चे सेवक बनो। मनमति का त्याग कर सद्गुरु की आज्ञा अथवा वचन को दृढ़तापूर्वक पकड़ लो, श्री आज्ञा को श्रद्धापूर्वक ह्मदयंगम कर ह्मदय से उसकी पालना करो। इसी में जीवन का सच्चा लाभ और परम कल्याण है।    
       

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