""जिस सेवक ने अपने विचार को ईश्वर की मौैज व आज्ञा के साथ मिला दिया तो उसी के विचार को सब देवता और सकल शक्तियाँ पूरा करने का प्रयत्न करती हैं और कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती। इसके विपरीत जो अपनी इच्छा के अनुसार चला वह शून्य का शून्य रहा।''
सद्गुरु के इन वचनों का जो पालन करता है उसकी रक्षा नियम-निर्माता स्वयं करता है। सच्चे सद्गुरु के दरबार में अधिकारी सेवक को इसी शिक्षा के सीखने का अवसर मिलता है। श्री रामचन्द्र जी को जब भगवान वशिष्ठ जी ज्ञानोपदेश कर रहे थे तो रह रह कर वे शंका करने लगे और निरर्थक वाद-विवाद में समय गँवाने लगे। तब श्री वसिष्ठ जी ने उनसे पूछा-""कि तुम ज्ञानी हो या अज्ञानी? यदि तुम ज्ञानवान हो तो मुझे तुम्हें उपदेश करने की आवश्यकता ही नहीं है यदि तुम अज्ञानी हो तो हमारे वचन सुनो और सत्य सत्य कर उन्हें मानों। इस तरह धीरे धीरे सारा भेद तुम पर अपने आप पर खुल जाएगा और सब प्रश्नों के उत्तर तुम्हें स्वयं मिल जाएँगे। ज्यों ज्यों हमारे वचनों के द्वारा प्रकाश अन्दर जाएगा वैसे वैसे आध्यात्मिक ज्योति बढ़ती जाएगी।
जब श्री रामचन्द्र जी ने उनके कथनानुसार अपने मन को उन के वचनों से मिलाया सब भ्रम और संशय अपने आप ही जाते रहे और उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त हो गई जिसके आगे सम्पूर्ण शक्तियां झुककर सेवा करने लगीं।
अवतारी पुरुषों ने भी इस नियम का परिपालन किया और हमें अपने आचरण से सिखाया। जैसे कि भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ने गीता के तीसरे अध्याय के 21वे श्लोक में कथन किया है।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते, लोकस्तदनु वत्र्तते।।
""यद्यपि इन अवतारों को कोई कर्म का बन्धन नहीं होता तो भी नियम को स्थिर रखने के लिये अपनी मौज से सब कर्म करते हैं जिससे सर्व साधारण को बड़ा लाभ होता है क्योंकि वे बड़ों का ही अनुकरण करते हैं।'' कई बार श्री गुरु महाराज जी कथन किया करते थे कि तुम अपूर्ण से पूर्ण बनने के लिये ही यहाँ आए हो। जैसे जैसे आज्ञा को मानकर सेवा करोगे तुम्हारा अधूरापन दूर होता जाएगा और तुम अपने आप ही अपने को निर्बल से बलवान एवं दुःखी से सुखी पाओगे। तुम्हारे अन्तर में ज्ञान की ज्योति जलती जाएगी और सद्गुरुदेव जी का बहुमूल्य आत्मिक धन तुम्हारे अन्दर स्वतः आ जाएगा जिससे तुम दास से स्वामी बन जाओगे। आशाएं तुम्हें नहीं सताएंगी।
जिस जन अपना हुकम मनाइया। सरब थोक नानक तिन पाया।।
श्री सतगुरुदेव जी अपनी दात(कृपादृष्टि) श्री आज्ञा में लपेट कर अपने सेवकों को प्रदान करते हैं।
वाणी गुरु गुरु है वाणी विच वाणी अमृतसारे।
गुरुवाणी कहै सेवक जन मानै परतख गुरु निसतारे।।
जिस जिसने भी आज्ञा को सीस पर रखा, उसी ने सब कुछ प्राप्त कर लिया और जिसने उस आज्ञा को अपने मन से तोलने का प्रयत्न किया वह और भी भ्रम में पड़ गया वह खाली का खाली रह गया। यही कारण है कि उस एक ही दरबार में से उस ही गुरुदेव जी से कोई रुपये का रुपया लाभ उठाता है, कोई एक पैसे का भी नहीं उठा पाता। श्री गुरुवाकः-इकना ते रंग चढ़ गया इक रह गये अमन अमान।।
जिन्होंने सद्गुरुदेव जी के वचनों पर विश्वास रखा वे भक्ति धन से मालामाल हो गये। जिन्होंने गुरु वचनों की कोई परवाह न की वे भक्ति का लाभ उठाने से वंचित रह गये।
24
राजा जन्मेजय परीक्षित का पुत्र और अर्जुन के तनय अभिमन्यु का पोता था। उसने ब्रााहृणों के कहने पर नागयज्ञ किया जिसमें अनेकों नाग मर गये। क्योंकि उसके पिता महाराज परीक्षित तक्षक सर्प के डसने से मरे थे,और वह इस यज्ञ के द्वारा उसका बदला ले रहे थे। उस यज्ञ में महर्षि वेदव्यास जी भी उपस्थित थे। राजा ने उनसे पूछा कि हमारे पूर्व पुरुषों ने जुआ क्यों खेला था? संग्राम करके इतने वीरों और विद्वानों का नाश क्यों कर दिया था? उन्हें क्यों किसी विद्वान ने न रोका? वेदव्यास जी ने उत्तर दिया कि भावी बड़ी प्रबल होती है।उसे बड़े बड़े महापुरुषों ने भी सिर पर धारण किया है। यह सुनकर भी जन्मेजय राजा को विश्वास न हुआ। वह बोला कि जब मनुष्य को ज्ञात भी हो कि यह काम बुरा है, फिर वह काम करे ही क्यों? वेदव्यास जी त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने कहा कि आज हम तुम्हें सावधान करते हैं कि तुम्हारे पास किसी देश के सौदागर अच्छे अच्छे घोड़े लेकर बेचने को आएंगे। परन्तु तुम उनसे घोड़े न खरीदना। किन्तु होगा ऐसे कि तुम वे घोड़े खरीद लोगे। यदि खरीद भी लो तो उनमें से सफेद रंग का घोड़ा जिसके कान काले हों उसे मत खरीदना। परन्तु तुम उसे भी खरीद लोगे। यदि खरीद भी लो तो उसपर सवार न होना। परन्तु करोगे सही। यदि सवारी करो भी तो दक्षिण दिशा की ओर न जाना। परन्तु तुम अवश्य जाओगे। यदि उधर तुम्हारा जाना हो भी तो वहाँ से किसी स्त्री को अपने साथ न लाना। अगर उसे तुम अपने घर में भी ले आओ तो उसे अपनी रानी न बनाना। परन्तु तुम उसे अपनी पत्नी भी बनाओगे। अगर ऐसा भी कर लो तो उसके कहने में आकर ब्रााहृणों का नाश न कराना। परन्तु तुम उसका कहना मानकर ब्रााहृणों का वध करा दोगे। इस घोर पातक के कारण तुम्हें कुष्ठ रोग हो जायेगा।
चिरकाल बीत जाने से होनहार ने उससे ऋषि की सभी बातें भुलवा दीं। इससे जो होनहार था वह हो गया। ब्रााहृणों की हत्या के परिणाम-स्वरुप उसे कोढ़ हो गया। तब उसने श्री वेदव्यास जी को स्मरण किया और उनके आने पर यह निवेदन किया कि, सत्पुरुषों का वचन वस्तुतः ही अटल होता है। मैने विश्वास न करने से बुरा फल पाया। अब आप कृपा कर मुझे इस दारुण रोग से छुटकारा दिला दो। वेदव्यास जी ने कथन किया कि आप मुझसे महाभारत की कथा सुनो-उसे जितना तुम सत्य सत्य मानते जाओगे उतना तुम्हारा कोढ़ भी मिटता जाएगा। जहाँ तुम कथा में कोई संशय करोगे कि ऐसा तो नहीं हो सकता, तो शेष कोढ़ शरीर में रह जाएगा। राजा जन्मेजय सत्य सत्य करके कथा सुनते गये।साथ ही साथ कोढ़ भी मिटता गया। जब यह प्रसंग आया कि भीमसेन इतने बलवान थे कि हाथियों को घुमा घुमाकर आकाश में उछाल देते थे,जो आज तक भी नीचे नहीं गिरे। जन्मेजय ने कहा कि यह असम्भव है। उसी समय वेदव्यास जी ने मन्त्रोच्चारण करके जल की चुल्ली आकाश में फैंकी तो गगन मण्डल में गजराज घूमते हुए दृष्टिगोचर हुए। परन्तु उसका कोढ़ वहीं का वहीं रह गया। वह अब दूर होने से रह गया।
इन दृष्टान्तों से सिद्ध होता है कि जो भी प्राणी महापुरुषों की मौज के अनुसार उतरे हुए वचनों को सच सच कर मन में धारण नहीं करता, वह अति दुःख पाता है, और जो मनमति को एक ताक पर रख कर उनके वचनों को शिरोधार्य करता है उसके पास सुख संपदा की कोई कमी नहीं रहती।
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