Sunday, July 24, 2016

विश्वास कीजिए


     विश्वास कीजिए-कि हम सब जीवात्मा उस सर्वात्मा परमात्मा के अंश मात्र हैं। परन्तु कुल मालिक से विलग हो जाने के कारण स्वयं को उस मालिक से पृथक मानकर संसार की भूल-भुलैय्याँ में भटक रहे हैं और अकारण ही दुःख, क्लेश और परेशानी का शिकार हो रहे हैं। हमारे मालिक ने जिसके हम अंश हैं हमें अपने से पृथक करके दूर नहीं फेंका है,अपितु स्वयं हम अपने सच्चे मालिक को भुलाकर और उससे जुदा होकर दिनों दिन उससे दूर होते चले जा रहे हैं।
     विश्वास कीजिए-कि जगत की अनेक प्रकार की लुभावनी रचना एवं इसके मोहक आकर्षण ने हमें अपने जाल में उलझा लिया है और हम इन अस्थायी रसों में फंसकर ऐसे मदोन्मत्त हो रहे कि अपने वास्तविक आत्म-स्वरुप को भुलाकर संसार के क्रीत दास बन गये हैं।
     विश्वास कीजिए-कि हमारे मालिक ने तो जगत की नाट्यशाला में हमें एक दर्शक के रुप में भेजा था, परन्तु हम यहाँ आकर जगत की मादकता में ही खो गये। हमारा वास्तविक घर अथवा स्थायी आवास तो सत्लोक में है। पर जगत की रचना ने हमारे पाँव ऐसे जकड़ लिये कि हम यहीं के हो रहे। इस जगत की अस्थायी चमक दमक एवं क्षणिक रसों में खोए खोए हमने इतना दीर्घकाल बिता दिया है कि समय का यन्त्र भी उस दीर्घकाल को नहीं माप सकता। स्वयं हमें ही इसका आभास नहीं रहा कि कितने समय से हम जगत की दासता की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं। अपने निजी घर अर्थात् सतलोक का स्मरण तक हमें नहीं रहा। जगत के मादक रसों एवं विलासता ने हमारे मनोमस्तिष्क पर इतना स्थूल आवरण डाल दिया है कि हम अपनी सुधबुध ही खो चुके हैं।
     विश्वास कीजिए-कि हमारा मालिक जो हमें अपने प्रिय अंश मानता है वह सत्-धाम में हमारे लौट आने की प्रतीक्षा कर रहा है। इधर हम हैं कि गफलत, प्रमाद एवं आत्म-विस्मृति की अवस्था में ही सन्तुष्ट हैं और अपनी इसी मन्दावस्था को ही परम आनन्द मान कर मगन हो रहे हैं। गफलत, प्रमाद और अज्ञान की यह अवस्था हमारी वास्तविक स्थिति नहीं है। अपितु यह तो कपटपूर्ण माया की विडम्बना है। अपनी इस दीन हीन अवस्था में सन्तुष्ट रहना ही हमारी नासमझी का परिचायक है।
     विश्वास कीजिए-कि हमारा मालिक अति स्नेह पूर्वक हमें अपने निकट बुलाना चाहता है। प्रतिक्षण उसकी ओर से बुलावे पर बुलावा आ रहा है। परन्तु हम जगत के मोह में ऐसे गाफिल हैं कि उसकी आवाज़ को सुनकर भी अनसुनी किये जा रहे हैं और उसकी ओर देखकर भी देखना नहीं चाहते। क्योंकि जगत के मोह ने हमारी आँखें बन्द कर रखी हैं।
      विश्वास कीजिए-कि हम अपने उच्चस्तर से इतने गिर चुके और अपने आपको इस सीमा तक भुला चुके कि अपने सच्चे मालिक को भी नहीं पहचान सकते, जो हमारा प्रिय पिता है। न ही हम उसकी आवाज़ को सुनते हैं, जबकि वह हमें हर क्षण अपने निकट देखने को व्याकुल है।

     विश्वास कीजिए-कि किसी स्नेही पिता का प्रिय शिशु यदि किसी मेले की गहमा गहमी में खोकर अपने पिता से बिछुड़ जाये तो वह पिता अपने प्यारे शिशु को खोज निकालने के लिये कितना व्याकुल होता है? क्या कोई पिता यह सहन कर सकता है कि उसका लाडला उससे विलग होकर दर दर भटकता और परेशान होता फिरे? कदापि नही। ठीक इसी प्रकार हमारे दयालु पिता सच्चे मालिक से भी यह कदापि सहन नहीं हो सकता कि उसके अंश अर्थात् हम जीवात्मा उससे विलग होकर जगत की भवाटवी में भटकते और पग पग पर ठोकरें खाते फिरें। इसलिये हमारा दयालु पिता हमें अपने निकट देखने का ह्मदय से इच्छुक है, हमें अपनी स्नेहमयी गोद में बिठलाकर प्यार करने को व्याकुल है; अपने घर में प्रसन्न भाव से खेलते कूदते तथा मुसकानें बिखेरते देखने को लालायित है।
      विश्वास कीजिए-कि हम में से कुछ एक यह कहते सुने जाते हैं कि हमारा मालिक हमसे अप्रसन्न है। हमारी अवज्ञाओं और अवहेलनाओं ने उसे हमसे विपरीत कर दिया है। अथवा यह कि वह हमसे द्वेष करता और हमें अपने से दूर रखना चाहता है। तो उन लोगों का यह कथन सर्वथा गलत एवं अज्ञान पर आधारित है। पुत्र चाहे कितना ही अयोग्य एवं अवज्ञाकारी क्यों न हो, दयालु पिता का ह्मदय उसे अपने से दूर रखना सहन नहीं कर सकता। अपना अंश पिता को अति प्रिय होता है और वह उसे प्रत्येक अवस्था में अपनाने को तत्पर रहता है।
     विश्वास कीजिए-कि जो लोग ऐसा कहते हैं, उनकी अपनी बेसमझी, पथ भ्रष्टता तथा दुष्कृत्यों ने ही उन्हें सच्चे एवं दयालु पिता की ओर से संशकित कर रखा है। परन्तु अज्ञानता तो अज्ञानता ही है,बुद्धिमान पुरुष उसे कभी ठीक नहीं मान सकते।
     विश्वास कीजिए-कि हमारे सच्चे मालिक को यदि कोई बात अरुचिकर प्रतीत होती है तो वह बस यही हमारी बेसमझी और अज्ञानता है अथवा हमारे दुष्कृत्य एवं अवांछित लक्षण हैं। परन्तु इसका यह अर्थ तो कदापि नहीं कि उसे हमसे भी अरुचि है। नहीं, ऐसा तो कभी भूलकर भी नहीं समझना चाहिये । हमारी बिगड़ी हुई वर्तमान अवस्था हमारी वास्तविक अवस्था तो नहीं है। यह तो स्वयं हमने ही अपना हुलिया बिगाड़ रखा है। हमारा पिता हमें इस अज्ञानावस्था से निकालकर हमें हमारा वास्तविक स्वरुप प्रदान करना चाहता है। परन्तु हम उससे सशंकित होकर दूर दूर भागने की कोशिश करते हैं। इस गलत प्रयत्न में हमारे पग और भी गलत मार्ग पर पड़ने लगते हैं, जिसके फलस्वरुप हमारी रुप-रेखा और भी अधिक बिगड़ती जा रही है।
     विश्वास कीजिए-कि पिता तो अपने प्रिय अंशज को अपने निकट लाने का ह्मदय से आकाँक्षी हो किन्तु पुत्र बार बार दूर भागने की चेष्टा करे। तो ऐसी अवस्था में पिता पुत्र का मिलन भला कैसे सम्भव हो सकता है? बस यही कारण है कि हम अपने मालिक से विलग और दूर हैं। अन्यथा वह मालिक तो हमें अपना लेने को नितान्त उत्सुक है।
      विश्वास कीजिए-कि जिस प्रकार हमारा दयालु पिता हमें अपनी गोद में बिठलाने को उत्सुक है, हमारे चित्त में यदि उसके एक प्रतिशत भाग के बराबर भी अपने मालिक से मिलने के लिये व्यग्रता एवं व्याकुलता होती, तो बीच की यह दूरी कब की समाप्त हो चुकी होती और अब तक हम अपने दयाद्र्र पिता की गोद में आराम कर रहे होते। परन्तु खेद तो इसी बात का है कि हमारे अन्तर्मन में वैसी व्याकुलता उत्पन्न ही नहीं हो रही, जैसी कि स्वाभाविक रुप से होनी चाहिये।
      विश्वास कीजिए-कि मालिक से मिलने की सच्ची तड़प औेर व्याकुलता की भावना हमारे चित्त में इसलिये जागरुक नहीं होती कि हम मानव प्राणी साधारणतया जगत के मिथ्या भोगों एवं रसों को सत् मान

रहे हैं जैसे कोई मदोन्मत्त प्राणी नशे में अपनी सुधबुध खो देता है। अथवा जैसे माता की गोद में जाने के लिये रोता मचलता हुआ बालक सुन्दर खिलौनों के ढेर देखकर उनमें रम जाता है और माता की गोद में उपलब्ध होने वाले अपूर्व आनन्द को विस्मृत कर देता है।
     विश्वास कीजिए-कि जगत के अति सुन्दर दिखाई देने वाले खिलौनो में वह आनन्द एवं तृप्ति कहाँ, जो दयालु पिता की गोद में है। खिलौनों की सुन्दरता एवं उनका आकर्षण तो मन बहलाने का एक अस्थायी साधन है। इस अस्थायी तृप्ति को ही आनन्द की पराकाष्ठा मान लेना घोर अज्ञान है, जिसका फल है दयालु पिता की गोद से वंचित रहना।
     विश्वास कीजिए-कि जीवात्मा को जो सात्विक आनन्द एवं अपरिमेय तृप्ति अपने वास्तविक घर (निजधाम) में उपलब्ध हो सकती है, वह जगत के अस्थायी एवं नष्टप्राय घर में कहाँ मिल सकती है? संसार भर के रस-भोग तथा उनसे प्राप्त होने वाला सुख भी उस परमानन्द के कण-मात्र की तुलना में तुच्छ है। पर खेद है कि उस अपिरमेय अनन्त एवं अपार आनन्द से वंचित रहने का दुःख ही जीव को नहीं सताता।
     विश्वास कीजिए- कि जब कोई व्यक्ति विदेश यात्रा करता है तो उसे यह आभास निरन्तर रहता है कि मैं अपने घर से दूर हूँ तथा विदेश में उपलब्ध आनन्ददायक सामग्रियां भी मात्र अस्थायी हैं। वह उन अस्थायी सुख सामग्रियों में अपना मन नहीं अटकाता, वरन् अपने घर की सुखद स्मृति उसे हरदम बनी रहती है। एक अज्ञात प्रकार की व्यग्रता उसे भीतर ही भीतर कचोटती रहती है कि कब अपने घर में पहुँचूँ और सच्चे सुख अथवा परमानन्द की प्राप्ति करुँ। इसी प्रकार हम जीवात्मा भी अपने निज-घर से, सच्चे माता पिता से बिछुड़कर दूर पड़े हुए हैं, तो हमें भी इस दूरी का आभास अवश्य होना चाहिये। यदि अपने घर एवं माता पिता से बिछुड़ने का दुःख हमें व्यग्र एवं व्याकुल नहीं करता,तो यह सर्वथा अस्वाभाविक है। विदेश में चित को अटकाकर अपने घर एवं प्रिय मित्रों को भूल जाना बुद्धिमानी नहीं, कोरी अज्ञानता है।
     विश्वास कीजिए-कि हमें चाहिये कि अपने अन्तर्मन में व्यग्रता एवं व्याकुलता की इस स्वाभाविक भावना को उत्पन्न करें। तथा अति सुखदायी अवस्था में रहने पर भी तब तक चैन लेना पसन्द न करें, जब तक कि अपने घर में पहुँच न लें तथा निज-घर का अपूर्व आनन्द हमें उपलब्ध न हो जाये।
     विश्वास कीजिए-कि ज्योंही व्याकुलता की ऐसी भावना जिसे विरह कहा जाता है, हमारे चित में जागरुक हुई कि फिर मालिक के मिलने में विलम्ब नहीं। इस विरह-कसक के प्रभाव से वे सब विघ्न-बाधाएँ स्वतः दूर हो जायेंगी, जो हमारे निज-घर तक पहुँचने तथा दयालु पिता से मिलने के मार्ग को अवरुद्ध कर रही हैं।  प्रकृति की शक्तियाँ हमारे लिये मार्ग प्रशस्त करेंगी तथा हम शीघ्रातिशीघ्र निज घर तक पहुँचने में सफल होंगे। क्योंकि हमारा मालिक हमारी तीव्र व्याकुलता की प्रतीक्षा में है। जैसे ही ऐसी तड़प हमारे मन में जागी कि वह स्वयं हमें अपने निकट बुला लेगा और हमें अपनी गोद में लेकर अति प्रसन्न होगा।

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