Monday, February 29, 2016

ख्यालों पर निर्भर


यदि किसी मनुष्य को दुनिया के सब भोग्य-पदार्थ और शारीरिक सुख सामग्री उपलब्ध हो जाये, संसार की प्रत्येक वस्तु, माया का हर एक वैभव उसके पास हो; इतना कुछ होते हुए भी वह विश्वास और दावा से नहीं कह सकता कि उनको पाकर मैं सुखी हो गया हूँ, मुझे शाश्वत् सुख मिल गया है; इसके बाद कभी दुःख नहीं आयेगा। ऐसा देखने में नहीं आया कि दुनिया के सब पदार्थ एकत्र कर इन्सान को सच्चा सुख और शान्ति मिल जाए अथवा दुःखों से छुटकारा हो जाए------ऐसा कोई प्रमाण अथवा उदाहरण नहीं।          पुरातन इतिहास से और आधुनिक समय में इन्सान स्वयं अनुमान लगा सकता है कि पहले राजा-महाराजा, अमीर     व प्रतिष्ठित----जो भी हुए हैं, उनके पास सुख-वैभव के प्रचुर सामान थे। किसी बादशाह के पास सुख सामग्री के सामानों की कोई कमी नहीं थी। परन्तु उनकी आन्तरिक दशा पर ध्यान दिया जाए तो वे दुःखी प्रतीत होते हैं। महापुरुषों ने सोध सोधकर वचन लिखे हैं।
सगल  सृसटि  को  राजा  दुखीआ ।।
हरि का  नामु  जपत  होइ  सुखीआ ।।
                                गुरुवाणी
सारी सृष्टि का राजा------जिसके पास हर प्रकार के सुख ऐश्वर्यों के सामान उपलब्ध हैं, फिर भी वह दुःखी है। इससे विदित होता है कि दुनियावी पदार्थों में सुख नाममात्र भी नहीं। वह सुखदायी वस्तु कौनसी है जिसे पाकर इन्सान सुखी हो जाए। जिस सुख शान्ति की प्राप्ति के बाद दुःख न उठाना पड़े, कष्ट-क्लेश न सतायें। सत्पुरुषों के अनुभव एवं आचरणमय जीवन के अनुसार वेदों-शास्त्रों व ग्रन्थों में प्रमाण मिलते हैं, जिसे पढ़ सुनकर आचरण करते हुए इन्सान सही अर्थों में सुखी हो सकता है और दुःखों से छुटकारा मिल सकता है। वह कौन सी चीज़ है? वह है मालिक की भक्ति, प्रभु का भजन-----जिसकी कमाई करने से जीव को कोई दुःख--क्लेश नहीं व्याप सकते। महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। चौपाई ।।
भगति  तात  अनुपम  सुख  मूला ।
मिलइ  जो  संत  होइँ  अनुकूला ।।
राम  भगति मनि  उर  बस  जाके।
दुख  लवलेस  न  सपनेहुँ  ताके ।।
चतुर  सिरोमनि  तेई  जग  माहीं ।
जे मनि लागि सुजतन कराहीं ।।
                       श्री रामचरितमानस
भक्ति ऐसी बेमिसाल है जिसकी तुलना इन्सान पदार्थों से करना चाहे तो कर नहीं सकता। कहे कि अमुक वस्तु में इतना सुख है और भक्ति में इतना-----यह तुलना हो ही नहीं सकती। भक्ति की प्राप्ति पर निरन्तर सुख, आनन्द व शान्ति इन्सान प्राप्त कर सकता है। परन्तु यह मिलती कैसे है? सत्पुरुषों की संगति एवं उन की आज्ञा व मौज अनुसार जीवन बनाने से ही जीव को प्राप्त होती है। जिसके ह्मदय में भक्ति का वास हो जाए उसे स्वप्न में भी दुःख, क्लेश, चिन्ता नहीं व्याप सकते। यह मिलती किसको है अर्थात् इसके ग्राहक कौन हैं? इस को पाने की अभिलाषा किसे होती है? वे भी केवल विशेष-विशेष प्रेमी संस्कारी रूहें आप जैसे भाग्यशाली गुरुमुख होते हैं, जिन्हें सत्पुरुषों की संगति मिल जाती है। जिनके दिल में सच्ची लगन व जिज्ञासा होती है। जिनके पूर्बले संस्कार ऐसे होते हैं और सांसारिक पदार्थों से उपरामता होती है------उन्हें ही सत्पुरुषों की सुसंगति का ऐसा संयोग मिलता है जिसके द्वारा वे भक्ति को सहज स्वभाव ही पा लेते हैं।

Saturday, February 27, 2016

यह तन विष की बेलरी

संसार में जब सुख-दुःख दोनों हैं तो सुखदायक वस्तु भी मिलनी चाहिए। उनकी मांग के अनुसार कुदरत उस का प्रबन्ध कर देती है। उन्हें ऐसा साधन मिल जाता है जिससे वे घट में ही सच्ची वस्तु को पा लेते हैं। परन्तु वह साधन कहां से मिलता है? जब जिज्ञासु की तीव्र मांग होती है तो सत्पुरुषों का मिलाप हो जाता है, उनकी संगति उपलब्ध होती है। क्योंकि यह सौदा, यह सच्ची वस्तु सत्पुरुषों के दरबार से ही मिल सकती है। अन्यत्र नहीं मिलती। अन्य कहीं से प्राप्त करने का प्रयत्न विफल होता है।
अब मानव--तन जीव को प्राप्त हुआ है। अल्पायु में वह चीज़ प्राप्त करनी है जो इसकी अपनी मांग है। जब तक इस जीवन में उसे प्राप्त नहीं करेगा, इसका लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। मानव-जन्म को धारण कर उस सच्ची वस्तु को प्राप्त कर ले जो सुखदायी हो और मानव-जन्म भी सफल हो सके। कुदरत ने तो पहले ही दोनों चीज़ें उपलब्ध कर दी हैं, दोनों साधन प्रदान किए हैं। दुनिया में मिथ्या पदार्थ भी मिल जाते हैं और जिज्ञासु को सत्पुरुषों से सच्ची वस्तु नाम और भक्ति की सम्पदा भी मिल जाती है।
प्रत्येक इन्सान अनुमान लगा सकता है कि यदि सच्ची और सुखदायक, झूठी और दुःखदायक------दोनों चीज़ें उपलब्ध हैं तो कौन ऐसा प्राणी होगा जो झूठी व दुःखदायी चीज़ को लेकर सुखदायक वस्तु को छोड़ देगा। फिर क्यों आम दुनिया दुःखदायी वस्तु ग्रहण करती है? क्योंकि उन्हें सुखदायी वस्तु की परख नहीं, झूठी वस्तु को सत्य समझकर ग्रहण करते हैं और दुःखी हो जाते हैं।
जब सत्पुरुषों की संगति से उसे यह परख हो जाती है तो फिर वह झूठे पदार्थों को नहीं लेता बल्कि सच का ग्राहक बन जाता है और सच्ची वस्तु को प्राप्त करने का इच्छुक होता है। जैसाकि पहले कहा गया है------"हीरा लेवे जौहरी, जो मांगे सो देय'। हीरा रूपी भक्ति लेने के लिए पुन: वे तन-मन-धन समर्पण करने में संकोच नहीं करते। जैसे दुनिया की मार्केट में सौदा करना हो तो दाम चुकाना पड़ता है। सच्ची वस्तु के ग्राहक को बदले में कुछ देना होगा। जीव के पास तन-मन-धन और माया के झूठे पदार्थों के अतिरिक्त है ही क्या? यदि सच के बदले में देने भी पड़ें तो लाभ ही लाभ है, इसमें हानि ही क्या है? जैसे महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। दोहा ।।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।
                    परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
यह शरीर पांच तत्त्व का पुतला है। इसमें गन्दग़ी भरी हुई है। यदि इसका उपयोग सही ढंग से किया जाय और सत्पुरुषों की संगति ग्रहण कर सच्ची वस्तु लेने में संकोच न करे क्योंकि इसमें हानि नहीं। झूठी वस्तु के बदले सच्ची वस्तु मिले, यहां भी साथ रहे और परलोक में भी साथ दे, इससे ज़्यादा लाभप्रद सौदा फिर कौनसा होगा?
आप अपने दिल में अनुमान लगायें कि आम संसारी इस शरीर के बदले क्या प्राप्त कर रहा है और गुरुमुखों को क्या प्राप्त हो रहा है? गुरुमुखों को सच्चे नाम का सरमाया मिला है जो लोक परलोक में काम देता है और आम संसारी झूठी माया एकत्र कर रहे हैं, जो यहां भी दुःख का कारण है और परलोक भी उनका बिगड़ जाता है। महापुरुषों का कथन है-----
सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि सासि समाले।।
इह लोक परलोकि संगि सहाई जत कत मोहि रखवाले।।
गुर का बचनु बसै जीअ नाले ।।
जलि नही डूबै तसकरु नही लेवै भाहि न साकैजाले ।। 1 ।। रहाउ
                                     गुरुवाणी
सद्गुरु का शब्द ऐसी सच्ची वस्तु है, ऐसा सच्चा सरमाया है जिसे कोई ख़तरा नहीं। दुनिया की प्रत्येक चीज़ को भय है। सद्गुरु का शब्द व नाम ऐसा सच्चा सरमाया है कि जिसके ह्मदय में इसका वास हो जाये तो यहां भी हर जगह पर सहायक और परलोक में भी संगी।
आखिरकार इन्सान को यहां से कूच करना ही है, इस दुनिया को छोड़ना ही छोड़ना है। आगे इसके साथ क्या जायेगा? यदि सच्ची चीज़ खरीदी होगी तो सच्ची चीज़ जायेगी और यदि झूठे ख्याल होंगे तो झूठ संग जायेगा। झूठ के बदले चौरासी लाख योनियां और सच के बदले दरगाह में मान-प्रतिष्ठा मिलेगी।
यह बात अच्छी तरह से जान लो कि जीवन चार दिन का है। जीवन में कौनसी सच्ची वस्तु एकत्र करे जो अंग-संग रहे। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि असत् को दिल में स्थान न देकर सत् को ही ह्मदय मन्दिर में बसाना है। महापुरुषों ने जो नियम निर्धारित किये हैं, यह सच्चे नाम को ह्मदय में बसाने के साधन हैं। इनका नित्य प्रति सेवन कर माया की मलिनता को निकालना है। गुरुमुखजन सच्ची वस्तु मालिक के नाम को दिल में बसा कर जीवन को धन्य बनाकर इसे सफल कर लेते हैं।

Friday, February 26, 2016

सच झूठ की परख


इस द्वन्द्वमयी संसार में कुदरत ने दोनों चीज़ें उत्पन्न कर दी हैं------सत् और नित्य पदार्थ, असत् व अनित्य पदार्थ। दोनों चीज़ें संसार में उपलब्ध हैं, दोनों की तासीर भी अलग-अलग है। जो सत् और नित्य वस्तु है, उसको ग्रहण करने से इन्सान को सुख, शान्ति मिलती है। असत् और अनित्य पदार्थ मिल जाने पर दुःख और अशान्ति का सामना करना पड़ता है। दोनों पदार्थ तो मौजूद हैं परन्तु देखना यह है कि सुख और खुशी देनेवाले सत् व नित्य पदार्थों को कौन चाहता है और असत् व अनित्य पदार्थों का ग्राहक कौन है? आम दुनिया का रुख़ और मांग झूठे पदार्थों तथा न·ार सामानों की ओर है। उनको चाहने वाले लोग अधिक हैं। जैसेकि महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। दोहा ।।
सब जग वणजे खार खल, हीरा कोई न लेय ।
हीरा  लेवे  जौहरी, जो  मांगे  सो  देय ।।
दुनिया के तुच्छ पदार्थ खार खल हैं अर्थात् सार वस्तु के निकल जाने पर जो छिलका शेष रह जाता है उस के बराबर हैं। इसीलिए सांसारिक पदार्थों की तुलना खार खल से की गई है। इसको चाहने वाले सारे संसारी लोग हैं। हीरा रूपी भक्ति, नाम जो सत् वस्तु हैं; उसको चाहनेवाले विरले-विरले संस्कारी जीव हैं। इस बात की समझ किसको आती है कि सत् वस्तु में सुख भरा हुआ है, केवल संस्कारी गुरुमुखों को। इसको सब क्यों नहीं चाहते? क्योंकि उनकी इसतरह की समझ ही नहीं और न ही उनको ऐसा सत्संग मिला है।
इन्सान चाहता है कि मुझे सुख व शान्ति मिले, परन्तु जब सुख शान्ति का सवाल पैदा होता है, इन्सान की समझ काम नहीं करती। बाहरी स्थूल चीज़ों की चमक-दमक व उसमें थोड़े समय के सुख की झलक देख कर इन्सान उनपर मोहित हो जाता है। चूँकि सत् पदार्थ की उसको समझ ही नहीं है। कारण क्या है? कारण यह है कि असत् पदार्थ सब माया की रचना हैं। ये सब दृश्यमान हैं। इन बाह्र चीज़ों को देखकर इन्सान भूल जाता है। जो सत् वस्तु है वह इसे नज़र नहीं आती, न ही उसका इसे ज्ञान और विचार है। इसीलिए भ्रम में झूठी चीज़ों की चाहना कर धोखा खा जाता है।
इन्सान चाहता तो है कि मुझे सुख मिले, परन्तु ऐसा कोई बाज़ार नहीं, नगर नहीं, प्रदेश नहीं जहां मायावी पदार्थ पाकर सच्चा आनन्द और सुख मिले। इनमें क्यों सुख नहीं? दृष्टमान जितने भी मायावी पदार्थ हैं, इनमें दुःख भरा हुआ है। इनकी तासीर ही दुःखदायक है। मालिक के नाम और भक्ति में सुख ही सुख भरा हुआ है। यदि कोई इन्सान कहे कि नाम और भक्ति मुझे बाज़ार से या शहर से नहीं मिल सकती ? सत्पुरुष फ़रमाते हैं कि वह हर स्थान पर मौजूद है; इस घट के अन्दर भी है। जिज्ञासु पुरुष जिनके ऐसे संस्कार हैं, जिन्हें जागृति आ गई हो, उत्कंठा उत्पन्न हो गई हो, उनको यह सुखवाली नाम और भक्ति मिल जाती है।

Wednesday, February 24, 2016

दयाल की काल पर विजय


इस संसार की रचना में काल माया और दयाल दोनों शक्तियां काम कर रही हैं। माया की बलवती शक्ति जिसके साथ मन और मन के साथी काम-क्रोध-मोह-लोभ और अहंकार, ईष्र्या व तृष्णा------ये सब परस्पर मिले हुए हैं। इन के द्वारा माया ने आम संसारियों को अपने अधीन कर रखा है। इनके पंजे में आया हुआ जीव दुःखी और परेशान है। कोई भी इन्सान  यदि यह चाहे कि मैं अपने बाहुबल, बुद्धिमत्ता या अस्त्र-शस्त्र से मन और माया पर विजय पा लूँ अथवा इन्हें अधीन कर लूँ तो यह ऐसा नहीं कर सकता। यदि मन माया पर विजय पाना चाहे, इनके पंजे से आज़ाद होकर दुःख परेशानियों से मुक्त होना चाहे तो उसे सन्त सद्गुरु की चरण-शरण ग्रहण करनी होगी, तभी त्राण पा सकता है।
प्राय: देखा यह जाता है कि आम संसारियों का रुख़ माया की ओर है। चाहे वे दुःखी व परेशान हैं, कई चिन्ताओं में ग्रस्त हैं, परन्तु माया के ख़्यालों को नहीं छोड़ते। इससे किनारा भी नहीं करना चाहते, इसीलिए सदा दुःखी व परेशान हैं। मन माया के अधीन होकर ऐसा अनमोल मानुष-जन्म का स्वर्णिम अवसर अपने हाथों से गँवा देना चाहते हैं।
इस दशहरे के पर्व के विषय में सबको ज्ञात है कि रावण कितना बलशाली, विद्वान् और बुद्धिमान था। उसके पास कितना अस्त्र-शस्त्र का बल था। इतना सब कुछ होते हुए भी वह मन के अधीन था। क्योंकि वह सत्पुरुषों की चरण-शरण व संगति से वंचित था; इसलिए इतना बलशाली होते हुए भी मन पर विजय न पा सका। उसका परिणाम क्या हुआ? यह सबको विदित ही है। मन के अधीन होने से उसे पराजित होना पड़ा अर्थात् असत्य से नीचा देखना पड़ा। असत् पर सत् की विजय हुई। श्रीराम जी से उसे पराजित होना पड़ा। मन और माया जो भी संसार का पसारा है, सब झूठ है। राम की भक्ति दयाल की शरण----यह सब सत् है। भक्ति ने माया अर्थात् सत्य ने असत्य पर विजय पाई। रावण की हार हुई और राम की जीत हुई। रावण का पतन राम के हाथों हुआ।
अब विचार यह करना है कि विजय तो सत् की ही हुई। वे संस्कारी एवं भाग्यशाली जीव हैं जो सत्पुरुषों की चरण-शरण में आ गये और मालिक की भक्ति को अपना लिया। मालिक के सच्चे नाम को ह्मदय में बसा लिया। जिसने मालिक की भक्ति और सच्चे नाम को दिल में बसा लिया उसके दिल से अहंकार ने डेरा उठा लिया और मन माया का ज़ोर नष्ट हो गया। इसके द्वारा जीव झूठ व मन माया पर हावी हो गया। इनसे छुटकारा पाकर तथा मालिक की भक्ति को दिल में बसाकर वे सुखी हो जाता है और जीवन आनन्दमयी बना लेता है।
यह आप स्वयं ही अनुभव कर सकते हैं कि वे जीव कितने भाग्यशाली हैं जिन्हें सत्पुरुषों की चरण-शरण मिल जाती है और भक्ति का सच्चा मार्ग विदित हो जाता है। प्रत्येक प्राणी के ऐसे संस्कार एवं भाग्योदय नहीं होते कि मन माया से किनारा कर सके। सत्पुरुषों की चरण-शरण ग्रहण करने से सच्ची वस्तु मालिक की भक्ति मिल सकती है। यही सच्चा सुख देने वाली है और जिसे प्रत्येक नहीं पा सकता। इसे भाग्यशाली ही प्राप्त करते हैं, चाहे वे संसार में थोड़े होते हैं। संसार में प्रत्येक वस्तु के दो पहलू होते हैं। यही कारण है कि गुरुमुख संसार में थोड़े होते हैं परन्तु भक्ति और सच्चे नाम की कमाई से सुखी एवं आनन्दमग्न होते हैं।
आप अपने दिल में अनुभव कर सकते हैं कि मन और माया की लपेट में आया हुआ सारा संसार दुःखी और परेशान है। दुःखों से छुटकारा पाने का कोई मार्ग ही नहीं मिल पाता। उनके लिए सब कुछ संसार है। माया की इस रचना में उन्हें कोई आश्रय नहीं मिल पाता। जीवन को इसी में खतम कर रहे हैं। चाहे यह जीवन अनमोल व आनन्दमयी है, इसके बदले में क्या क्या प्राप्त कर सकता है परन्तु उनके ऐसे सौभाग्य कहाँ? क्योंकि उन्हें सत्पुरुषों की सुसंगति उपलब्ध नहीं होती जिससे वे अनमोल जीवन से अनमोल दात प्राप्त कर सकें।
गुरुमुखों के इतने ऊँचे भाग्य हैं जिसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। प्रत्येक को ऐसा अवसर और संयोग नहीं मिलता जिसे पाकर जीवन को कृतार्थ और सफल बना सकें। भक्ति का रंग चढ़ाकर भगवान से मिल सकें। विरली-विरली रूहों को ऐसा सुअवसर मिलता है। जो माया को तुच्छ समझते हैं, यह भी साधारण बात नहीं। एक ओर माया की दलदल में फँसकर जीव नीच योनियों का शिकार हो जाता है, चौरासी में भटकता और युगों तक कष्ट उठाता है; दूसरी ओर सत्संग के प्रकाश में आकर संसार में रहता हुआ संसार से न्यारा रहे----कितने आनन्द की बात है। घोर कलियुग में माया की दलदल से निकल कर सुखी हो जाय-----यह केवल गुरुमुख ही अनुभव कर सकते हैं। मगर कब? जब सत्पुरुषों की संगति मिल जाती है। सत्पुरुषों का कथन है-----
।। दोहा ।।
कबीर वैरी सबल है, जीव एक रिपु पांच ।
अपने अपने स्वाद को, सभी नचावैं नाच ।।
जीव स्वयं निर्बल है। मन शत्रु और बलवान है क्योंकि उसके साथ काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार साथी हैं। जीव के शत्रु हैं। इनके द्वारा सारी दुनिया को अपने अधीन कर रखा है। अपने इन रसों एवं विषय-इन्द्रियों के द्वारा सबको नाच नचा रहा है। इनके पंजे से छूटना कठिन नहीं बल्कि असम्भव हो गया है। जिन सौभाग्यशाली गुरुमुखों को सत्पुरुषों की संगति मिल जाती है उन्हें इनसे आज़ाद होने का मार्ग मिल गया, साधन मिल गया। महापुरुषों की सहायता से उन साधनों पर आचरण कर इन शत्रुओं से आज़ाद हो जाते हैं। महापुरुष ही माया के पंजे से आज़ाद करने का साधन बतलाते हैं। वे केवल साधन ही नहीं बतलाते अपितु उनपर आचरण करवाते हैं। केवल पढ़ने सुनने में न रह जायें बल्कि आचरण में लाकर मुक्ति प्राप्त कर लें।

भक्ति मार्ग में जितने भी नियम साधन हैं केवल इसी हेतु कि इन्सान मन के पंजे से आज़ाद हो जाय। कथनी सरल और आचरण कठिन है। यह कार्य चाहे कठिन है परन्तु इसके हल करने के भी साधन हैं। इन साधनों से वह आनन्द, सुख मिलता है जो वाणी कथन नहीं कर सकती और जीह्वा अशक्त है। जब इन्सान को इसका रस आ जाता है तो झूठा मायावी रस छूट जाता है। जबतक सच्चे आनन्द का रस नहीं आता, मिथ्या इन्द्रियों का रस अच्छा लगता है। विषयों के तुच्छ रसों के लिए जीव जन्म-जन्मों तक नीच योनियों का शिकार हो जाता है और दुःख उठाता है।

Tuesday, February 23, 2016

मनुष्य जन्म

।। दोहा ।।
जन्म जन्म भटकत रह्रो, जेहि अवसर के हेत ।
सो अवसर तैं पाइयो, अब क्यों भयो अचेत ।।
पहले भी कई जन्म मन माया के चक्र में, असत् में सुरति लगाकर भटकता रहा है। अब बारी आई है मालिक की भक्ति करने की और अपनी आत्मा का कल्याण करने की। यह स्वर्णिम अवसर है। महापुरुष फ़रमाते हैं------ऐ इन्सान! गाफ़िल न रह, सुजाग हो। जीव कब सचेत होता है? जब महापुरुषों की संगति में ज्ञान का प्रकाश मिलता है।
इसकी आत्मा पर आवरण आ गया है। मन और माया ने इसे स्याह कर दिया है, आत्मा की ज्योति और प्रकाश दब गया है। जब तक इन्सान मन और माया के अधीन है, विकारों के अधीन है, तबतक अचेत और गाफ़िल है। जब महापुरुषों की संगति में उनके उपदेशानुसार चल कर मन से विकार निकल जायें तभी आत्मा निर्मल होगी और हो सकती है। इसके निर्मल करने का यही एक साधन है। सत्पुरुषों की चरण-शरण मिल जाना भाग्यों की निशानी है और मालिक की कृपा है। कारण क्या कि जीव का काम सत्पुरुषों की संगति के बिना सिद्ध नहीं हो सकता। शेष दुनिया के काम सब हो जाते हैं और लोग कर रहे हैं; परन्तु आत्म-कल्याण का कार्य, रूह को जन्म-जन्म के बन्धन से मुक्त कराने का काम महापुरुषों की संगति से ही हो सकता है। उनसे ज्ञान की रोशनी लेकर यह कार्य सिद्ध हो सकता है। इसलिए उन जीवों के उत्तम भाग्य हैं व उत्तम संस्कार हैं जो सत्पुरुषों की संगति में आ गये हैं। महापुरुषों का उपदेश है------
कोटि  जनम  भ्रमि  भ्रमि  भ्रमि  आइओ ।।
बडै   भागि   साध   संगु  पाइओ ।।
करोड़ों जन्मों से यह जीवात्मा कई योनियों में भरमता रहा, कई युग बीत गये चौरासी में भटकता रहा। अब भाग्यों से सत्पुरुषों की संगति मिली है। इन्सान स्वयं विचार करे यह कैसा स्वर्णिम अवसर मिला है। किसी को कोई वस्तु कुछ समय पश्चात् मिले तो उसकी कितनी कदर होती है। दस या बीस साल के पश्चात् मिले तो और भी अधिक कदर करता है, अधिक प्यार करता है। मानव-तन जो कई जन्मों और युगों के बाद मिला है उस की कितनी कदर होनी चाहिए। वह कितना मूल्यवान हुआ और उससे कितना काम लेना चाहिए। इस बात का ज्ञान विवेकशील पुरुषों को होता है। ऐसी अनमोल वस्तु जो कई जन्मों के बाद मिली उसकी कीमत पहचानना इन्सान का कत्र्तव्य है। इस स्वर्णिम अवसर को हाथों से खो देना बुद्धिमानी नहीं। इसलिए महापुरुष चेतावनी देते हैं------समय अत्यन्त कीमती है। इस कीमती समय में मालिक के नाम की कमाई करके उसे दिल में बसाया जाय और असत् का त्याग कर सत् की ओर रुख किया जाय। असत् क्या है? जो बाह्र मिथ्या वस्तुओं से लगाव है वही असत् है। इन मिथ्या वस्तुओं से प्रीत लगाना जीवन व्यर्थ गंवाना है। इनकी आसक्ति से जीवन बरबाद हो गया और नयी चौरासी खरीद ली। जब सत्पुरुषों की चरण-शरण में आ कर मालिक के सच्चे नाम से प्रीत लगा ली तो चौरासी कट गई। यही जीवात्मा की मंज़िल है। यह कार्य इसी अवसर में हो सकता है।
सौभाग्य से मानव-तन व सत्पुरुषों की सुसंगति प्राप्त हुई। इन्सान उनके उपदेशानुसार नाम की कमाई करके आत्मा को निर्मल बना सकता है। जन्म-जन्मान्तरों से माया में लिप्त विकारों का मल इसी साधन से ही पावन होगा।
यही इस जन्म का लाभ है। आम दुनियादारों को भी मानव-तन मिला है। यदि उनको विदित भी हो तो उनके पास समय ही नहीं कि भक्ति के नियमों पर चलकर जन्म सफल बना सकें। परन्तु गुरुमुख के लिए यह स्वर्णिम सुअवसर है। वे चौबीस घण्टे भक्ति के साधनों को अपना कर, नियमों पर चलकर सोते-जागते, खाते-पीते, चलते-फिरते मालिक की याद करते हैं। उनकी सब कार्यवाही सफल है। उनका सारा समय सेवा में व्यतीत होता है। वे समय की कीमत डालते हैं। वे भक्ति के नियमों का पालन कर एक एक स्वांस की कदर करते हैं, समय व्यर्थ नहीं गंवाते। अपने समय को भक्ति में लगाकर जीवन की सफलता प्राप्त करते हैं। जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर इसे पूर्ण रूप से सफल बना लेते हैं।