Friday, February 19, 2016

दुनिया की हकीकत


सत्पुरुषों का कथन है-------
।। दोहा ।।
मिटते स्यौं मत प्रीत कर, रहते स्यौं कर नेह ।
झूठे  को  तजि दीजिए, साचे  में  कर  गेह ।।
सत्पुरुषों के वचन जीव के लिए रोशनी का मीनार होते हैं जिसके द्वारा इन्सान उस रोशनी में चलकर अपनी जीवन-यात्रा को सही तरीके से तय कर सकता है। महापुरुषों ने फ़रमाया है कि "मिटते स्यौं मत प्रीत कर'------जो चीज़ मिट जाने वाली है उससे तू दिल न लगा। उससे प्रीत न कर। वह कौनसी वस्तु है जो न·ार और अनित्य है। वास्तव में देखा जाय तो यह संसार की सारी रचना ही अनित्य एवं न·ार है। जब इस संसार की सारी रचना मिथ्या और नाशवान् है तो फिर स्थिर, नित्य और सत्य कौनसी चीज़ है जिससे नेह लगाया जाय, जिसे दिल दिया जाय। यह सब महापुरुषों की संगति में विवेक मिलता है। इसकी समझ दुनियादारों की संगति में नहीं मिल सकती।
यह संसार मिथ्या है, सत् कुछ और है। परन्तु दुनियादारों को सत्, असत् सब कुछ संसार ही नज़र आता है। चाहे इन्सान अपनी आँखों से देखता है कि जो भी इस संसार में उत्पन्न हुआ है, एक दिन नष्ट हो जायेगा। जड़ से लेकर चेतन तक सभी न·ार हैं। परन्तु उन्हें वास्तविकता का बोध नहीं होता कि नित्त्य स्थायी कौन सी चीज़ है। महापुरुष फ़रमाते हैं------
।। दोहा ।।
कबीर आधी साखी यह, कोटि ग्रन्थ करि जान ।
नाम सत जग झूठ है, सुरत शब्द पहचान ।।
महापुरुषों ने अपने तजर्बा से करोड़ों ग्रन्थों का सार तत्त्व बतला दिया कि नाम सत् है। सच्ची चीज़ दुनिया में मालिक का नाम है जिसके आधार पर अण्ड-ब्राहृाण्ड और सारी सृष्टि रची गई है तथा शेष सब मिथ्या है। महापुरुषों का फ़रमान है कि इस मिथ्या संसार पर भरोसा न करो। इससे कुछ न प्राप्त होगा। जो भी संसार में आया है, कोई न कोई लक्ष्य लेकर आया है, किसी विशेष कार्य के लिए आया है। चाहे वह थोड़े समय के लिए ही है। कुदरत ने जो रचना रचाई है हर एक चीज़ का कोई न कोई अभिप्राय है। ज़र्रे से लेकर पहाड़ तक, चींउटी से लेकर हाथी तक जितने भी जड़ व चेतन हैं सब किसी विशेष अभिप्राय से बनाए गए हैं।
महापुरुष जतलाते हैं कि जीव संसार में किसी विशेष लक्ष्य को लेकर आया है क्योंकि यह सब योनियों में श्रेष्ठ है। चौरासी लाख योनियों में सबसे प्रधान है। जब शेष योनियों का कोई न कोई अभिप्राय है तो यह अवश्य ही विशेष प्रयोजन के लिए आया है। धराधाम पर परमात्मा ने इसे भेजा है तो इसका कोई विशेष काम है। वह कौन सा काम है? कि तू सच से प्रीत कर, झूठ से नहीं। मिथ्या संसार को दिल में बसाने के लिए नहीं आया बल्कि मालिक के सच्चे नाम को दिल में बसाने आया है। जन्म-जन्मान्तर से दुःखी आत्मा को संसार से आज़ाद कराने के लिए आया है। वह काम कर जिससे अन्तर में सच्चे नाम का वास हो। तेरे अन्दर जो जन्म-जन्मों से विकार भरे हुए हैं उनसे दिल को साफ कर और मालिक से मिलाप कर। झूठ को छोड़, सच को अपना। झूठ त्यागने और सच अपनाने के लिए यही जन्म मिला है। इससे पूर्व संसार की मिथ्या प्रीति में कितने ही जन्म व्यतीत किए हैं। अब मालिक के नाम से प्रीत जोड़कर उससे मिलाप करने का अवसर मिला है।

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