यदि कोई प्रामाणिक औषधि हो उसे रोगी
नहीं जान सकता कि यह किस काम आती है। जिसने उसका प्रयोग किया होगा, वही उसको जानता होगा। प्रत्येक इसे नहीं समझ
सकता। यदि मनुष्य चाहे कि मैं स्वयं इसका ज्ञान प्राप्त कर लूँ, यह असम्भव है। महापुरुषों ने अनुभव करके ही लिखा
है। मानव को यह शरीर चौरासी लाख योनियों के बाद मिला है। यदि चौरासी से मुक्त होने
के लिए आत्म-कल्याण का कार्य न किया गया तो पुन: वही चौरासी मिल जायेगी।
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ
।।
नानक नामु समालि तूँ सो दिन नेड़ा
आइओइ ।।
गुरुवाणी
अर्थात् इस जीवात्मा को मानुष-देही
मिली चौरासी लाख योनियों के बाद। इसने प्रार्थना की कि मुझे इन योनियों से मुक्ति
दिला दो। कुदरत ने इसकी याचना पर इसे मानव-देही प्रदान की और इसी में जीवात्मा का
कल्याण हो सकता है। यह कत्र्ता भी है और भोक्ता भी। दोनों काम कर सकता है। शेष
जितनी योनियां हैं सब भोक्ता हैं। पशु-पंछी,
कीट-पतंग आदि सब
भोक्ता हैं। उन को यह ज्ञान नहीं कि वे किस काम के लिए आए हैं। उनको तो केवल
खाना-पीना और जन्म बिताना है। मानुष-जन्म की यह विशेषता है कि सत्पुरुषों की संगति
में जाकर यह ज्ञान प्राप्त करे,
नाम और भक्ति की
कमाई करे। पूर्व जन्मों के संस्कार जो अन्दर भरे पड़े हैं, उनके अनुसार मन बार-बार विषयों की ओर जाता है।
सत्पुरुषों की संगति में नाम एवं भक्ति की कमाई करके जिस इन्सान की सुरति इच्छाओं
से रिक्त हो, वही निर्मल आत्मा ही बलवान होगी और
आत्मा परमात्मा से जा मिलेगी। यह मानुष देही केवल मालिक की भक्ति के लिए ही मिली
है परन्तु मनुष्य ने अन्य कामों में उलझा दिया है। ये सब काम अपने नहीं हैं।
सत्पुरुष फ़रमाते हैं-------
अवरि काज
तेरै कितै न काम
।।
मिलु साध संगति
भजु केवल नाम ।।
मालिक की दरगाह में यदि लेखा नहीं
है तो वहां क्या मिलेगा। यदि यहां कुछ भजन भक्ति की कमाई करेगा तो वहां भी मिलेगा।
किसी इन्सान का यदि बैंक में धन जमा होगा तो वहां से ले सकता है। यदि बैंक में कुछ
जमा ही नहीं तो क्या मिलेगा। इसी तरह जिस इन्सान ने भक्ति व नाम की कमाई मालिक के
बैंक में जमा करवा दी तो दरगाह में भी यही कमाई मिल सकेगी। यदि यहां एक पाई भी जमा
न कराई तो वहां क्या मिलेगा?
जैसे यहां शरीर के
निर्वाह के लिए धन की ज़रूरत है,
वहां मालिक की
दरगाह में भी तो ज़रूरत है। संसार की धन-दौलत तो वहां साथ नहीं जा सकती। वहां तो
केवल मालिक के नाम और भक्ति की दौलत ही काम आ सकती है। यदि वह साथ नहीं होगी तो
फिर वहां क्या करेगा। महापुरुष फ़रमाते हैं------
साथि न चालै बिनु भजन बिखिया सगली
छारु।।
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु
सारु ।।
गुरुवाणी
भक्ति के अतिरिक्त कोई भी वस्तु साथ
नहीं जा सकती। भक्ति की सम्पत्ति प्राप्त कर यहां भी इन्सान सुखी जीवन व्यतीत
करेगा और परलोक में भी मुख उज्ज्वल होगा। आत्मा भी बंधन में नहीं आयेगी। यहां भी
मुक्त और वहां भी मुक्त। यहां भी सुख और वहां भी सुख।
जिनि नामु
धिआइआ गए मसकति
घालि ।।
नानक ते
मुख उजले केती
छुटी नालि ।।
गुरुवाणी
जिन्होंने दूसरे ख्यालों को त्यागकर
सच्चे नाम की कमाई के लिए प्रयत्न पुरुषार्थ किया, वे
जन्म-मरण से मुक्त हो गए और मालिक की दरगाह में भी मुख उज्ज्वल होगा। आप स्वयं
विचार करो कि इन्सान के ख्यालों का रुख़ दुनिया के धन्धों में तथा माया के सामान
एकत्र करने में लगा हुआ है तो क्या उसको सच्चा सुख मिल रहा है या भविष्य उसका क्या
होगा? कुछ प्रतीत होता है? आत्मा के दर्शन होते हैं? साथ क्या जायेगा, कुछ
मालूम है? खाना-पीना, भोग-विलास और सोना आदि तो अन्य जानदार जीवों में
भी है।
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