एक बार एक महात्मा का एक सर्प से मिलाप हुआ। महात्मा ने सर्प से कहा कि तू किसी को डंक न मारा कर। इससे क्योंकि दूसरों को कष्ट पहुंचता है। सर्प ने महात्मा की आज्ञा मानकर डसना छोड़ दिया। वह चुपचाप सड़क के किनारे पर पड़ रहा। परिणाम यह हुआ कि जो कोई वहां से गुज़रे वह उसे देखकर रोड़ा या पत्थर मार दे किन्तु वह बेचारा किसी को कुछ न कहे।उसकी दशा यह हो गई कि बच्चे उसे खेल खेल में घसीटने लग पड़े और वह घायल हो गया। वह महात्मा फिर कभी उधर आ निकले और सर्प की ऐसी दुर्दशा देखकर वे बड़े दुःखी हुए। सर्प ने महात्मा जी से कहा कि महाराज! आपकी आज्ञा पालन करने से मेरी यह दुर्दशा हो गई है। इस पर महात्मा जी बोले- "ऐ नादान! हमने तो तुम्हें यह कहा था कि तूने किसी को डसना नहीं' परन्तु यह तो नहीं कहा था कि तू अपनी फुंकार करना भी छोड़ दे। उसी दिन से उसने फुंकार मारना शुरु किया जिससे लोग उसे छेड़ते न थे और वह सुख पूर्वक रहने लगा। इसी तरह संसार में रहते हुए भक्तों को भी अपनी सर्पवाली फुँकार नहीं छोड़नी।
इतिहास बताता है कि दसवीं पातशाही श्री गुरु गोबिन्दसिंह जी महाराज ने भी लड़ाइयां लड़ीं। परन्तु क्या वे किसी के दिल से शत्रु थे? कदापि नहीं-वे तो धर्म और न्याय की रक्षा के लिये लड़े थे। कहते हैं कि युद्ध भूमि में एक भाई कन्हैया विरोधी पक्ष के घायलों के मुँह में पानी डाला करता था। कुछ सिखों ने यह देखकर श्री गुरु महाराज जी के आगे उसकी शिकायत की कि महाराज! वह तो हमारे शत्रुओं के मुँह में पानी डाल कर उन्हें जीवित कर देता है। वे फिर लड़ने को तैयार हो जाते हैं। श्री गुरु महाराज जी ने कन्हैया को बुलवाया और इस बात की सत्यता जाननी चाही। भाई कन्हैया हाथ जोड़कर चरणों पर गिर पड़ा और विनय की कि "हे गुरुमहाराज! मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप रणभूमि में लेटे पड़े हैं और आपको पानी की प्यास लगी है। मैं आपको पानी पिला रहा हूँ। मैं तो हरएक में आपका ही रुप देखता हूँ। श्री गुरुमहाराज जी ने जब ये शब्द कन्हैया के मुख से सुने तो वे बड़े प्रसन्न हुएऔर कहा कि भाई कन्हैया! सचमुच तू ऐसी अवस्था पर पहुंच गया है? तब तो तू बड़ा भाग्यशाली है। अब तक तो तू इन्हें पानी पिलाता था आगे से तू इनकी मरहम पट्टी भी किया कर। यह हमारी आज्ञा है।'' यह कितनी ऊँची अवस्था है। यह काम मन को वश में किये बिना नहीं हो सकता। महापुरुष फरमाते हैं कि ऐ जीव! मन ही तेरा शत्रु है। इस मन को वश में कर लेना भक्ति की अन्तिम मंज़िल है। किसी ने कहा हैः-
वैरी तेरा को नहीं, वैरी तेरा मन । इस मन नूं तूं वस करें, ते पावें मुक्ति धन।।
इतिहास बताता है कि दसवीं पातशाही श्री गुरु गोबिन्दसिंह जी महाराज ने भी लड़ाइयां लड़ीं। परन्तु क्या वे किसी के दिल से शत्रु थे? कदापि नहीं-वे तो धर्म और न्याय की रक्षा के लिये लड़े थे। कहते हैं कि युद्ध भूमि में एक भाई कन्हैया विरोधी पक्ष के घायलों के मुँह में पानी डाला करता था। कुछ सिखों ने यह देखकर श्री गुरु महाराज जी के आगे उसकी शिकायत की कि महाराज! वह तो हमारे शत्रुओं के मुँह में पानी डाल कर उन्हें जीवित कर देता है। वे फिर लड़ने को तैयार हो जाते हैं। श्री गुरु महाराज जी ने कन्हैया को बुलवाया और इस बात की सत्यता जाननी चाही। भाई कन्हैया हाथ जोड़कर चरणों पर गिर पड़ा और विनय की कि "हे गुरुमहाराज! मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप रणभूमि में लेटे पड़े हैं और आपको पानी की प्यास लगी है। मैं आपको पानी पिला रहा हूँ। मैं तो हरएक में आपका ही रुप देखता हूँ। श्री गुरुमहाराज जी ने जब ये शब्द कन्हैया के मुख से सुने तो वे बड़े प्रसन्न हुएऔर कहा कि भाई कन्हैया! सचमुच तू ऐसी अवस्था पर पहुंच गया है? तब तो तू बड़ा भाग्यशाली है। अब तक तो तू इन्हें पानी पिलाता था आगे से तू इनकी मरहम पट्टी भी किया कर। यह हमारी आज्ञा है।'' यह कितनी ऊँची अवस्था है। यह काम मन को वश में किये बिना नहीं हो सकता। महापुरुष फरमाते हैं कि ऐ जीव! मन ही तेरा शत्रु है। इस मन को वश में कर लेना भक्ति की अन्तिम मंज़िल है। किसी ने कहा हैः-
वैरी तेरा को नहीं, वैरी तेरा मन । इस मन नूं तूं वस करें, ते पावें मुक्ति धन।।
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