।। दोहा ।।
जन्म जन्म भटकत रह्रो, जेहि अवसर के हेत ।
सो अवसर तैं पाइयो, अब क्यों भयो अचेत ।।
पहले भी कई जन्म मन माया के चक्र
में, असत् में सुरति लगाकर भटकता रहा है।
अब बारी आई है मालिक की भक्ति करने की और अपनी आत्मा का कल्याण करने की। यह
स्वर्णिम अवसर है। महापुरुष फ़रमाते हैं------ऐ इन्सान! गाफ़िल न रह, सुजाग हो। जीव कब सचेत होता है? जब महापुरुषों की संगति में ज्ञान का प्रकाश
मिलता है।
इसकी आत्मा पर आवरण आ गया है। मन और
माया ने इसे स्याह कर दिया है,
आत्मा की ज्योति
और प्रकाश दब गया है। जब तक इन्सान मन और माया के अधीन है, विकारों के अधीन है, तबतक अचेत और गाफ़िल है। जब महापुरुषों की संगति
में उनके उपदेशानुसार चल कर मन से विकार निकल जायें तभी आत्मा निर्मल होगी और हो
सकती है। इसके निर्मल करने का यही एक साधन है। सत्पुरुषों की चरण-शरण मिल जाना
भाग्यों की निशानी है और मालिक की कृपा है। कारण क्या कि जीव का काम सत्पुरुषों की
संगति के बिना सिद्ध नहीं हो सकता। शेष दुनिया के काम सब हो जाते हैं और लोग कर
रहे हैं; परन्तु आत्म-कल्याण का कार्य, रूह को जन्म-जन्म के बन्धन से मुक्त कराने का
काम महापुरुषों की संगति से ही हो सकता है। उनसे ज्ञान की रोशनी लेकर यह कार्य
सिद्ध हो सकता है। इसलिए उन जीवों के उत्तम भाग्य हैं व उत्तम संस्कार हैं जो
सत्पुरुषों की संगति में आ गये हैं। महापुरुषों का उपदेश है------
कोटि जनम
भ्रमि भ्रमि भ्रमि
आइओ ।।
बडै भागि
साध संगु पाइओ ।।
करोड़ों जन्मों से यह जीवात्मा कई
योनियों में भरमता रहा,
कई युग बीत गये
चौरासी में भटकता रहा। अब भाग्यों से सत्पुरुषों की संगति मिली है। इन्सान स्वयं
विचार करे यह कैसा स्वर्णिम अवसर मिला है। किसी को कोई वस्तु कुछ समय पश्चात् मिले
तो उसकी कितनी कदर होती है। दस या बीस साल के पश्चात् मिले तो और भी अधिक कदर करता
है, अधिक प्यार करता है। मानव-तन जो कई
जन्मों और युगों के बाद मिला है उस की कितनी कदर होनी चाहिए। वह कितना मूल्यवान
हुआ और उससे कितना काम लेना चाहिए। इस बात का ज्ञान विवेकशील पुरुषों को होता है।
ऐसी अनमोल वस्तु जो कई जन्मों के बाद मिली उसकी कीमत पहचानना इन्सान का कत्र्तव्य
है। इस स्वर्णिम अवसर को हाथों से खो देना बुद्धिमानी नहीं। इसलिए महापुरुष
चेतावनी देते हैं------समय अत्यन्त कीमती है। इस कीमती समय में मालिक के नाम की
कमाई करके उसे दिल में बसाया जाय और असत् का त्याग कर सत् की ओर रुख किया जाय।
असत् क्या है? जो बाह्र मिथ्या वस्तुओं से लगाव है
वही असत् है। इन मिथ्या वस्तुओं से प्रीत लगाना जीवन व्यर्थ गंवाना है। इनकी
आसक्ति से जीवन बरबाद हो गया और नयी चौरासी खरीद ली। जब सत्पुरुषों की चरण-शरण में
आ कर मालिक के सच्चे नाम से प्रीत लगा ली तो चौरासी कट गई। यही जीवात्मा की मंज़िल
है। यह कार्य इसी अवसर में हो सकता है।
सौभाग्य से मानव-तन व सत्पुरुषों की
सुसंगति प्राप्त हुई। इन्सान उनके उपदेशानुसार नाम की कमाई करके आत्मा को निर्मल
बना सकता है। जन्म-जन्मान्तरों से माया में लिप्त विकारों का मल इसी साधन से ही
पावन होगा।
यही इस जन्म का लाभ है। आम
दुनियादारों को भी मानव-तन मिला है। यदि उनको विदित भी हो तो उनके पास समय ही नहीं
कि भक्ति के नियमों पर चलकर जन्म सफल बना सकें। परन्तु गुरुमुख के लिए यह स्वर्णिम
सुअवसर है। वे चौबीस घण्टे भक्ति के साधनों को अपना कर, नियमों पर चलकर सोते-जागते, खाते-पीते,
चलते-फिरते मालिक
की याद करते हैं। उनकी सब कार्यवाही सफल है। उनका सारा समय सेवा में व्यतीत होता
है। वे समय की कीमत डालते हैं। वे भक्ति के नियमों का पालन कर एक एक स्वांस की कदर
करते हैं, समय व्यर्थ नहीं गंवाते। अपने समय
को भक्ति में लगाकर जीवन की सफलता प्राप्त करते हैं। जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर
इसे पूर्ण रूप से सफल बना लेते हैं।
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