यदि किसी मनुष्य को दुनिया के सब भोग्य-पदार्थ और शारीरिक सुख सामग्री उपलब्ध हो जाये, संसार की प्रत्येक वस्तु, माया का हर एक वैभव उसके पास हो; इतना कुछ होते हुए भी वह विश्वास और दावा से नहीं कह सकता कि उनको पाकर मैं सुखी हो गया हूँ, मुझे शाश्वत् सुख मिल गया है; इसके बाद कभी दुःख नहीं आयेगा। ऐसा देखने में नहीं आया कि दुनिया के सब पदार्थ एकत्र कर इन्सान को सच्चा सुख और शान्ति मिल जाए अथवा दुःखों से छुटकारा हो जाए------ऐसा कोई प्रमाण अथवा उदाहरण नहीं। पुरातन इतिहास से और आधुनिक समय में इन्सान स्वयं अनुमान लगा सकता है कि पहले राजा-महाराजा, अमीर व प्रतिष्ठित----जो भी हुए हैं, उनके पास सुख-वैभव के प्रचुर सामान थे। किसी बादशाह के पास सुख सामग्री के सामानों की कोई कमी नहीं थी। परन्तु उनकी आन्तरिक दशा पर ध्यान दिया जाए तो वे दुःखी प्रतीत होते हैं। महापुरुषों ने सोध सोधकर वचन लिखे हैं।
सगल सृसटि को राजा दुखीआ ।।
हरि का नामु जपत होइ सुखीआ ।।
गुरुवाणी
सारी सृष्टि का राजा------जिसके पास हर प्रकार के सुख ऐश्वर्यों के सामान उपलब्ध हैं, फिर भी वह दुःखी है। इससे विदित होता है कि दुनियावी पदार्थों में सुख नाममात्र भी नहीं। वह सुखदायी वस्तु कौनसी है जिसे पाकर इन्सान सुखी हो जाए। जिस सुख शान्ति की प्राप्ति के बाद दुःख न उठाना पड़े, कष्ट-क्लेश न सतायें। सत्पुरुषों के अनुभव एवं आचरणमय जीवन के अनुसार वेदों-शास्त्रों व ग्रन्थों में प्रमाण मिलते हैं, जिसे पढ़ सुनकर आचरण करते हुए इन्सान सही अर्थों में सुखी हो सकता है और दुःखों से छुटकारा मिल सकता है। वह कौन सी चीज़ है? वह है मालिक की भक्ति, प्रभु का भजन-----जिसकी कमाई करने से जीव को कोई दुःख--क्लेश नहीं व्याप सकते। महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। चौपाई ।।
भगति तात अनुपम सुख मूला ।
मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ।।
राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेस न सपनेहुँ ताके ।।
चतुर सिरोमनि तेई जग माहीं ।
जे मनि लागि सुजतन कराहीं ।।
श्री रामचरितमानस
भक्ति ऐसी बेमिसाल है जिसकी तुलना इन्सान पदार्थों से करना चाहे तो कर नहीं सकता। कहे कि अमुक वस्तु में इतना सुख है और भक्ति में इतना-----यह तुलना हो ही नहीं सकती। भक्ति की प्राप्ति पर निरन्तर सुख, आनन्द व शान्ति इन्सान प्राप्त कर सकता है। परन्तु यह मिलती कैसे है? सत्पुरुषों की संगति एवं उन की आज्ञा व मौज अनुसार जीवन बनाने से ही जीव को प्राप्त होती है। जिसके ह्मदय में भक्ति का वास हो जाए उसे स्वप्न में भी दुःख, क्लेश, चिन्ता नहीं व्याप सकते। यह मिलती किसको है अर्थात् इसके ग्राहक कौन हैं? इस को पाने की अभिलाषा किसे होती है? वे भी केवल विशेष-विशेष प्रेमी संस्कारी रूहें आप जैसे भाग्यशाली गुरुमुख होते हैं, जिन्हें सत्पुरुषों की संगति मिल जाती है। जिनके दिल में सच्ची लगन व जिज्ञासा होती है। जिनके पूर्बले संस्कार ऐसे होते हैं और सांसारिक पदार्थों से उपरामता होती है------उन्हें ही सत्पुरुषों की सुसंगति का ऐसा संयोग मिलता है जिसके द्वारा वे भक्ति को सहज स्वभाव ही पा लेते हैं।
No comments:
Post a Comment