संसार में प्रत्येक प्राणी चाहता है
कि मेरा जीवन चिन्ता-रहित,
भय-रहित, क्लेश-कलपना से मुक्त, सुख व शान्ति से भरपूर हो। ऐसा कोई भी इन्सान
नहीं जो चाहता हो कि मेरे जीवन में दुःख भरा हो और चिन्तायें, ग़म और फ़िक्र जीवन में बने रहें। ऐसा कोई भी
इन्सान न होगा जो ग़म,
चिन्ता, दुःख का इच्छुक हो और सुख से वंचित रहना चाहता
हो।
प्रत्येक मनुष्य सुख शान्ति का
इच्छुक है और दुःखों से छुटकारा पाने की लालसा रखता है। परन्तु प्रत्येक अपनी
अन्तरात्मा में झांककर देखे कि क्या उसके जीवन में कोई भय, दर्द,
दुःख और चिन्ता
नहीं है? ऐसा होना असम्भव है। प्राय: देखा
जाता है कि कोई न कोई ग़म,
भय, दुःख-दर्द इसे लगा ही रहता है। शरीर को ही कुछ न
कुछ दुःख दर्द सताता रहता है। इससे बढ़कर भय अन्दर का है। यदि इन्सान का आन्तरिक भय, दुःख दर्द मिट जाय तो शरीर का कष्ट भासता ही
नहीं। शरीर के जितने कष्ट-रोग हैं वे इतने भयानक नहीं जितने आन्तरिक हैं। काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार
के कारण यह इन्सान दुःखी और भयभीत है।
उदाहरणतया आपने देखा होगा कि किसी
का पुत्र अथवा प्रिय सम्बन्धी विदेश में कहीं अत्यधिक दूर रहता है, उसकी मृत्यु का सुनकर उसके नज़दीकी मित्रों का
हार्ट फेल हो जाता है। इसका क्या अर्थ निकला। वे हज़ारों कोसों पर बैठे हुए हैं।
कारण स्पष्ट है कि मोह की तार जागी और उसकी जान ले ली।
एक इन्सान यहां बैठा है, कलकत्ता या बम्बई में छापा पड़ जाता है, यहां तार आ जाती है, वह यहीं बैठे जान दे देता है। किस कारण से? शारीरिक रोग इतना दुःखदायी नहीं होता जितना कि
आन्तरिक रोग दुःखी करते हैं। वह कौनसा फार्मूला है जिससे ग़म, चिन्ता व दुःख से मुक्ति मिल जाय। ऐसा कौन सा
अनुभवी ज्ञान है जिसपर आचरण करने से त्राण मिल जाए और सुख की प्राप्ति हो।
महापुरुषों के उपदेशों पर मनन करने से भयानक शत्रु काम, क्रोध,
लोभ, मोह और अहंकार नष्ट हो जायेंगे। सुख व शान्ति
प्रदाता नाम है जिसे दिल में बसा लेने से इनसे छुटकारा हो सकता है। और इन्सान सुख
शान्ति पा सकता है।
तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि
हरि राइ ।।
एक आस हरि मनि रखहु नानक दूखु भरमु
भउजाइ।।
प्रेमियो! अच्छी तरह विचार करके सुन
लो कि अपनी बुद्धि चतुराई को त्याग दो जिससे इन्सान स्वयं सुख पाना चाहता है, दुःख दर्द मिटाना चाहता है----वे सब अपनी बुद्धि
व चतुराई से दूर न होंगे। वह क्या फार्मूला अथवा नियम है? कि दिल में दुनिया व माया की आशा तथा
सम्बन्धियों एवं मित्रों की प्रीति बसा रखी है उसका त्याग करके एक मालिक का आश्रय
लो, उसका नाम ह्मदय में बसाओ। दुनिया के
पदार्थ, रिश्ते-सम्बन्धी, माया-धन-दौलत, मान-मर्तबा-----जिन्हें
ह्मदय में स्थान दे रखा है इसके स्थान पर एक मालिक का नाम दिल में बसा लोगे तो सब
दुःख, दर्द, भ्रम
और भय दूर हो जायेंगे। कारण यह कि दुःख वाली चीज़ का नाश हो गया और सुखवाली चीज़
अन्दर बस जायेगी तो इन्सान को स्वयमेव परख हो जायेगी।
No comments:
Post a Comment