Thursday, February 18, 2016

सुख पाने का सिद्धान्त

इन्सान सुख है और चिन्तन माया के सामानों का करता है। करोड़ों क्लेश सम्मुख उपस्थित हो जाते हैं।
सुख की प्राप्ति का यह सिद्धान्त है कि मालिक की भक्ति और नाम की कमाई करो तो जीवन सुखी हो जायेगा। संसार में रहते हुए दुनियावी पदार्थों एवं मायावी सामान को दिल में न बसाओ। याद हो तो केवल मालिक की। शेष काम स्वयमेव होते जायेंगे। दुनिया के काम-धंधे हाथ-पांव से करो और दिल को मालिक की याद में जोड़ दो। कार्य-कलाप को त्यागना नहीं अपितु मन के रुख़ को बदलना है। सब तरफ़ से दिल हटाकर मालिक के नाम में जोड़ना है।
।। शेअर ।।
ग़ैरियत को छोड़कर जिसको लगन है ज़ात की।
इल्म बातन में उसे मिलती है लाफ़ानी खुशी ।।
                             मख़जने इसरार
एक भगवान के नाम के बिना शेष सब चीज़ें बेगानी हैं। इसीलिए बाकी सब चीज़ों को छोड़कर मालिक के नाम की लगन दिल में पैदा करो। यह ऐसा उत्तम ज्ञान है जिसे प्राप्तकर विचारवान गुरुमुख शा·ात खुशी को प्राप्त कर लेता है। इस सुख के लिए दुनिया भटक रही है परन्तु मिलता नहीं है। मिले भी तो कहां से? जब इन्सान विचार करता है तभी सत्संग में इसका बोध होता है। फिर इन्सान उसपर अमल करने लग जाय तो सुख चैन मिलेगा। गुरुमुख भी दुनिया में रहते हैं और दुनियादार भी। इन दोनों का परस्पर अन्तर है। उनकी अन्तर्भावना का अन्तर है। दुनियादारों के पास सुखवाली चीज़ नहीं है और गुरुमुखों के पास सुख प्रदाता मालिक का नाम है। वे नाम का चिन्तन करते हैं और संसारी माया का चिन्तन करते हैं।
।। दोहा ।।
गुरुमुख के मन सदा खुशी, नित सेवा भक्ति कीप्यास।
मनमुख रहे नित झूरता, मन विषयन की आस ।।
गुरुमुख सर्वदा सत्संगति और भक्ति की अभिलाषा रखते हैं और सदा प्रसन्न रहते हैं। परन्तु उनकी अपेक्षा दुनियादार सदा विषय विकारों की कामना करते हैं, जो कभी पूरी नहीं होती, इसीलिए वे सदा दुःखी रहते हैं। दोनों चीज़ें जब सामने आ जायें, इसमें सुख है और इस में दुःख------फिर इन्सान क्यों दुःख ग्रहण करे। सुख-शान्तिदायक चीज़ नाम को क्यों न दिल में बसाये। यह जीवन भी सुखमय व्यतीत हो और परलोक में भी मुख उज्ज्वल हो।
इसीप्रकार गुरुमुख अपने जीवन के लक्ष्य को भी पूरा कर लेते हैं और मालिक की दरगाह में सुर्खरु होकर जाते हैं।

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