भगवद् भक्ति के मन्दिर में प्रवेश करने की सर्वश्रेष्ठ और अनिवार्य सीढ़ी "नमन' है। नमन का अर्थ है झुकना। नम्र होना, खाकसार बनना। अपने अहंकार का समूल नाश कर देना। इसी भाव को सन्त वाणी में दीनता-गरीबी आदि नामों से अभिव्यक्त किया जाता है।
भक्ति के मार्ग में सबसे प्रबल शत्रु "अंहकार' है। यह दीनता से ऐसे ही कोसों दूर रहता है जैसे सर्प नकुल से। ये दोनों मानों सहज वैरी हैं। संसार का आभूषण जहां अहंकार है वहां भक्ति का सौन्दर्य दीन भाव में निखर उठता है। हो भक्त और चाहे आत्म सम्मान-आदर-सत्कार यह उसकी नितान्त भूल है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी के वचन हैंः-
इक बानो जो दीनता, सन्तन किया विचार।
यही भेंट गुरुदेव की, सब कुछ गुरु दरबार।।
परम सन्त श्री कबीर जी कथन करते हैं कि सच्चे परमार्थी का सबसे श्रेष्ठ भूषण क्या है "दीनता' जिसने अपने परम इष्टदेव जी के चरण कमलों में रहकर दीन भाव का बाना ओढ़ लिया है उसने मानों अपना सर्वस्व ही उन्हें अर्पित कर दिया। इसी का नाम है "नमन'- सदा ही अपने इष्टदेव जी के वचनों को शिरोधार्य करना, उनकी आज्ञा के अनुसार अपने जीवन को उसी ढंग से चलाना जिससे उनकी प्रसन्नता प्राप्त हो सके।
भक्ति के अमृत का पान करने वाला जिज्ञासु पुरुष इस संसार के प्रत्येक पदार्थ में अपने इष्टदेव जी को ही देखने लगता है। उसके लिये कण-कण नमस्कार के योग्य बन जाता है। उसके नयनों में यजुर्वेद के 40 वेंअध्याय का प्रथम मन्त्र हर समय अंकित रहता है-"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चिज्जगत्यां जगत्'अर्थात् सम्पूर्ण यह विश्व उस परमेश्वर से आच्छादित है। वह इसके अणु अणु में ओत प्रोत हैं। उसकी दृष्टि इस अभ्यास के करने से इतनी परिसूक्ष्म हो जाती है कि वह हरएक वस्तु में अपने उपास्यदेव को पहले देखता है और उस पदार्थ को पीछे-वह अपने प्रियतम के उसमे, विद्यमान होने करके अत्यन्त प्रफुल्लित रहता है। उसके लिये हर चीज़ ही अति पवित्र, अति सुन्दर और अति प्रिय हो जाती है। जैसा कि गोस्वामी तुलसी दास जी का कथन हैः-
सिया राममय सब जग जानी। करउं प्रणाम जोरि युग पानी।।
उसके ह्मदय में श्री कृष्ण चन्द्र जी महाराज जी के ये वचन प्रतिपल गूँजते रहते हैंः-
समोऽहं सर्वभूतेषु, न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्तया, मयि ते तेषु चाप्यहम्।।
श्री भगवान कथन करते हैं कि मैं सब भूतों में सम भाव से व्यापक हूँ। मेरा न कोई अप्रिय है और न प्रिय है। जो भक्त मुझे प्रेम से भजते हैं वे मेरे में और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट होता हूँ।
भाव यह कि जैसे सूक्ष्म रुप से व्याप्त अग्नि सब पदार्थों में गुप्त रुप से रहा करती है-किन्तु साधनों द्वारा उसे प्रत्यक्ष कर लिया जाता है वैसे ही परमेश्वर से खाली कोई भी स्थान नहीं,हर एक के ह्मदय में वह सर्वदा स्थित हैं परन्तु अनन्य और एकनिष्ठ भक्त ही उसे अपने उत्कट प्रेम भाव से प्रकट कर लेते हैं।
सन्त सत्पुरुष जो स्वयं परमेश्वर रुप ही होते हैं संसार के जीवों में रहकर यही उपकार करते हैं कि उनके और ब्राहृ के अन्तराल में जो तीनों गुणों(सत्त्व-रज-तम) के तारों से बुना हुआ यह विराट् प्रकृति का प्रपञ्च व्यवधान बनकर ठहरा है उसे प्रेममयी भक्ति के द्वारा दूर करते हैं और उनकी दृष्टि को अपनी कृपा भरी चितवन डार कर निर्मल कर देते हैं जिससे वे जीव भगवद् दर्शन करने में सफल हो जाते हैं। सन्त
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सद्गुरु ही जीव की बिखरी हुई वृत्तियों को सेेवा-पूजा-भजनाभ्यास के साधन सिखा कर अपने में समाहित कर लेते हैं। और उस भक्त की सुरति अपने कृपालु सद्गुरुदेव जी में ही उस निराकार ब्राहृ का दर्शन कर लेती है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी के चन हैंः-
निराकार की आरसी, सन्तन ही की देहि।
लखा जो चाहे अलख को, इन ही में लखि लेहि।।
यह सब कुछ तभी सम्भव है जब साधक में अत्यन्त दीनता के भाव घर कर चुके होंगे और उसमें मालिक के दर्शनों के लिये उग्र उत्कण्ठा होगी जैसे किः-
अनन्यचेताः सततं, यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ, नित्ययुक्तस्य योगिनः।। 8/14
हे अर्जुन! जो पुरुष मुझ में अनन्य चित्त से स्थित हुआ हुआ मुझे ही सर्वदा स्मरण करता है-मैं उस निरन्तर मुझ में लीन योगी के लिये सुलभ हो जाता हूँ अर्थात् यदि वे मेरे लिये अति व्याकुल हो रहा है तो मैं उसके लिये उससे भी अधिक आतुर रहता हूँ कि वह मुझे मिले ही मिले। इस एकाकार हो जाने की वृत्ति को सुगम करने का यदि कोई साधन है तो वह "प्रेम और नमन' है -झुकना।
बड़े बड़े तूफान आते हैं-भयंकर उपद्रव करते हैं उन्नत सिर किये हुए ऊँचे ऊँचे वृक्षों को जो उस प्रचण्ड पवन का मार्ग रोकने की चेष्टा करते हैं, जड़ से उखाड़ देते हैं। परन्तु नन्हें कोमल हरे भरे छोटे छोटे पौधेअन्धेरी के सामने तुरन्त झुक जाते हैं। वह तूफान बड़ी शान्ति से उन्हें दुलराता हुआ निकल जाता है। इसी प्रकार अभिमान रहित, विनम्र स्वभाव के जो मनुष्य होते हैं परन्तु अपने आत्मबल के धनी-वे भी माया और महाकाल की कितनी भयंकर चोटें भी क्यों न सहनी पड़ेंअपनी सहज मुस्कान से उन्हें झेल लेते हैं। वे "कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाय' वाली उक्ति को अचरितार्थ कर देते हैं उनमें सच्चरित्रता की अदम्य शक्ति होती है। उनके नयनों में अपने इष्टदेव जी की श्री छवि का निवास होता है। उनके ह्मदय में इष्टदेव जी के चरण कमलों का अनन्य प्यार भरा होता है। वे आत्म संयम के धनी होते हैं।
बंगाल के परम कृष्ण भक्त श्री गौरांग महाप्रभु जी के जीवन में एक घटना आती है कि वे प्रभात में गंगा तट पर प्रतिदिन स्नान करने जाते थे। मार्ग में एक छात्रावास था जहां कुछ विधर्मी बालक निवास करते थे। एक दिन पता नहीं क्यों उनमें से जो चार लड़कों को चैतन्य जी से शरारत करने की सूझी। वे ज्योंं ही चार बजे स्नान करके छात्रावास के सामने से गुज़रे लड़कों ने उनपर जूठा पानी उछाल दिया। गौरांग शान्त रहे-उन्होंने उन्हें अपने मुख से एक शब्द भी न कहा-चुपके से लौट गये और भागीरथी में पुनः स्नान कर आये। उन चपल लड़कों ने फिर वही कुचेष्टा की-चैतन्य उलटे कदम लौट गये और स्नान कर लिया। उन धूत्र्त विद्यार्थियों ने भी आज चित्त में न जाने क्या ठान रखा था-भक्त जी के समीप आने पर फिर वही कुल्ले कर दिये-उनका जूठा पानी फैंकना और भक्त चैतन्य का बार बार नहा लेना- यह क्रम 108 बार तक चलता रहा-धन्य है उस विनय मूर्ति गौरांग की धीरता-सहिष्णुता और उनका अदम्य संयम वे तनिक भी न तिलमिलाये-माथे पर एक भी सिकुड़न न आई- मुखमण्डल शान्त और कान्त विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन चुके थे वे। कुदरत ने भी बड़ी उग्र परीक्षा ली उस प्रभुभक्त की-वे उद्दण्ड छात्र भी उस समय अपनी उच्छृंखला पर तुले रहे-जब अति हो गई-भगवान की भेजी हुई उस अग्नि परीक्षा में भक्त जी उत्तीर्ण हो गये तब 109 वीं बार जब गौरांग स्नान करके लौटे उन शठ लड़कों ने उनके चरण पकड़ लिये और अपनी ढिठाई की क्षमा माँगी और भविष्य के लिये उद्दण्डता न करने का व्रत ले लिया। यह है नमन का प्रताप और फल। चैतन्य केवल मुस्करा दिये उनकी करतूत पर और अपने इष्टदेव भगवान श्री कृष्ण जी
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की उस अद्भुत लीला के ध्यान में ही मग्न हुए अपने स्थान पर लौट आये।
अपने मालिक से प्रार्थना करना-परमात्मा की स्तुति और उपासना इसी "नमन' सोपान के ही अंग हैं जो दम्भ-दर्प-अभिमान से भरा है उसे प्रार्थना करने का विचार ही नहीं आ सकता। उस में अज्ञान, अविद्या कूट कूट कर भरे हैं। उसके मुख से प्रभु प्रार्थना के स्थान पर ये शब्द सुने जाते हैं किः-""मैं बड़ा धनवान हूं, बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान इस धरती पर दूसरा कौन है मैं यज्ञ करुँगा,दान दूंगा गुलछर्रे उड़ाऊँगा इस प्रकार की डींगें ऐसे अज्ञानी लोग मारा करते हैं। ऐसे मद्मत्त लोग हिरण्यकशिपु के समान अपने को ही भगवान मानने लगते हैं। दुर्योधन की न्यार्इं धन-ऐश्वर्य और अधिकारों के मोह में अन्ध हुए अपने मानुष जन्म को व्यर्थ में गँवा देते हैं। परन्तु जो उत्तम संस्कारी हैं उनका जीवन ही किसी और साँचे में ढला होता है वे अपने अन्तर्मानस में इन दिव्य गुणों को पनपाया करते हैंः-
भक्ति के मार्ग में सबसे प्रबल शत्रु "अंहकार' है। यह दीनता से ऐसे ही कोसों दूर रहता है जैसे सर्प नकुल से। ये दोनों मानों सहज वैरी हैं। संसार का आभूषण जहां अहंकार है वहां भक्ति का सौन्दर्य दीन भाव में निखर उठता है। हो भक्त और चाहे आत्म सम्मान-आदर-सत्कार यह उसकी नितान्त भूल है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी के वचन हैंः-
इक बानो जो दीनता, सन्तन किया विचार।
यही भेंट गुरुदेव की, सब कुछ गुरु दरबार।।
परम सन्त श्री कबीर जी कथन करते हैं कि सच्चे परमार्थी का सबसे श्रेष्ठ भूषण क्या है "दीनता' जिसने अपने परम इष्टदेव जी के चरण कमलों में रहकर दीन भाव का बाना ओढ़ लिया है उसने मानों अपना सर्वस्व ही उन्हें अर्पित कर दिया। इसी का नाम है "नमन'- सदा ही अपने इष्टदेव जी के वचनों को शिरोधार्य करना, उनकी आज्ञा के अनुसार अपने जीवन को उसी ढंग से चलाना जिससे उनकी प्रसन्नता प्राप्त हो सके।
भक्ति के अमृत का पान करने वाला जिज्ञासु पुरुष इस संसार के प्रत्येक पदार्थ में अपने इष्टदेव जी को ही देखने लगता है। उसके लिये कण-कण नमस्कार के योग्य बन जाता है। उसके नयनों में यजुर्वेद के 40 वेंअध्याय का प्रथम मन्त्र हर समय अंकित रहता है-"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चिज्जगत्यां जगत्'अर्थात् सम्पूर्ण यह विश्व उस परमेश्वर से आच्छादित है। वह इसके अणु अणु में ओत प्रोत हैं। उसकी दृष्टि इस अभ्यास के करने से इतनी परिसूक्ष्म हो जाती है कि वह हरएक वस्तु में अपने उपास्यदेव को पहले देखता है और उस पदार्थ को पीछे-वह अपने प्रियतम के उसमे, विद्यमान होने करके अत्यन्त प्रफुल्लित रहता है। उसके लिये हर चीज़ ही अति पवित्र, अति सुन्दर और अति प्रिय हो जाती है। जैसा कि गोस्वामी तुलसी दास जी का कथन हैः-
सिया राममय सब जग जानी। करउं प्रणाम जोरि युग पानी।।
उसके ह्मदय में श्री कृष्ण चन्द्र जी महाराज जी के ये वचन प्रतिपल गूँजते रहते हैंः-
समोऽहं सर्वभूतेषु, न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्तया, मयि ते तेषु चाप्यहम्।।
श्री भगवान कथन करते हैं कि मैं सब भूतों में सम भाव से व्यापक हूँ। मेरा न कोई अप्रिय है और न प्रिय है। जो भक्त मुझे प्रेम से भजते हैं वे मेरे में और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट होता हूँ।
भाव यह कि जैसे सूक्ष्म रुप से व्याप्त अग्नि सब पदार्थों में गुप्त रुप से रहा करती है-किन्तु साधनों द्वारा उसे प्रत्यक्ष कर लिया जाता है वैसे ही परमेश्वर से खाली कोई भी स्थान नहीं,हर एक के ह्मदय में वह सर्वदा स्थित हैं परन्तु अनन्य और एकनिष्ठ भक्त ही उसे अपने उत्कट प्रेम भाव से प्रकट कर लेते हैं।
सन्त सत्पुरुष जो स्वयं परमेश्वर रुप ही होते हैं संसार के जीवों में रहकर यही उपकार करते हैं कि उनके और ब्राहृ के अन्तराल में जो तीनों गुणों(सत्त्व-रज-तम) के तारों से बुना हुआ यह विराट् प्रकृति का प्रपञ्च व्यवधान बनकर ठहरा है उसे प्रेममयी भक्ति के द्वारा दूर करते हैं और उनकी दृष्टि को अपनी कृपा भरी चितवन डार कर निर्मल कर देते हैं जिससे वे जीव भगवद् दर्शन करने में सफल हो जाते हैं। सन्त
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सद्गुरु ही जीव की बिखरी हुई वृत्तियों को सेेवा-पूजा-भजनाभ्यास के साधन सिखा कर अपने में समाहित कर लेते हैं। और उस भक्त की सुरति अपने कृपालु सद्गुरुदेव जी में ही उस निराकार ब्राहृ का दर्शन कर लेती है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी के चन हैंः-
निराकार की आरसी, सन्तन ही की देहि।
लखा जो चाहे अलख को, इन ही में लखि लेहि।।
यह सब कुछ तभी सम्भव है जब साधक में अत्यन्त दीनता के भाव घर कर चुके होंगे और उसमें मालिक के दर्शनों के लिये उग्र उत्कण्ठा होगी जैसे किः-
अनन्यचेताः सततं, यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ, नित्ययुक्तस्य योगिनः।। 8/14
हे अर्जुन! जो पुरुष मुझ में अनन्य चित्त से स्थित हुआ हुआ मुझे ही सर्वदा स्मरण करता है-मैं उस निरन्तर मुझ में लीन योगी के लिये सुलभ हो जाता हूँ अर्थात् यदि वे मेरे लिये अति व्याकुल हो रहा है तो मैं उसके लिये उससे भी अधिक आतुर रहता हूँ कि वह मुझे मिले ही मिले। इस एकाकार हो जाने की वृत्ति को सुगम करने का यदि कोई साधन है तो वह "प्रेम और नमन' है -झुकना।
बड़े बड़े तूफान आते हैं-भयंकर उपद्रव करते हैं उन्नत सिर किये हुए ऊँचे ऊँचे वृक्षों को जो उस प्रचण्ड पवन का मार्ग रोकने की चेष्टा करते हैं, जड़ से उखाड़ देते हैं। परन्तु नन्हें कोमल हरे भरे छोटे छोटे पौधेअन्धेरी के सामने तुरन्त झुक जाते हैं। वह तूफान बड़ी शान्ति से उन्हें दुलराता हुआ निकल जाता है। इसी प्रकार अभिमान रहित, विनम्र स्वभाव के जो मनुष्य होते हैं परन्तु अपने आत्मबल के धनी-वे भी माया और महाकाल की कितनी भयंकर चोटें भी क्यों न सहनी पड़ेंअपनी सहज मुस्कान से उन्हें झेल लेते हैं। वे "कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाय' वाली उक्ति को अचरितार्थ कर देते हैं उनमें सच्चरित्रता की अदम्य शक्ति होती है। उनके नयनों में अपने इष्टदेव जी की श्री छवि का निवास होता है। उनके ह्मदय में इष्टदेव जी के चरण कमलों का अनन्य प्यार भरा होता है। वे आत्म संयम के धनी होते हैं।
बंगाल के परम कृष्ण भक्त श्री गौरांग महाप्रभु जी के जीवन में एक घटना आती है कि वे प्रभात में गंगा तट पर प्रतिदिन स्नान करने जाते थे। मार्ग में एक छात्रावास था जहां कुछ विधर्मी बालक निवास करते थे। एक दिन पता नहीं क्यों उनमें से जो चार लड़कों को चैतन्य जी से शरारत करने की सूझी। वे ज्योंं ही चार बजे स्नान करके छात्रावास के सामने से गुज़रे लड़कों ने उनपर जूठा पानी उछाल दिया। गौरांग शान्त रहे-उन्होंने उन्हें अपने मुख से एक शब्द भी न कहा-चुपके से लौट गये और भागीरथी में पुनः स्नान कर आये। उन चपल लड़कों ने फिर वही कुचेष्टा की-चैतन्य उलटे कदम लौट गये और स्नान कर लिया। उन धूत्र्त विद्यार्थियों ने भी आज चित्त में न जाने क्या ठान रखा था-भक्त जी के समीप आने पर फिर वही कुल्ले कर दिये-उनका जूठा पानी फैंकना और भक्त चैतन्य का बार बार नहा लेना- यह क्रम 108 बार तक चलता रहा-धन्य है उस विनय मूर्ति गौरांग की धीरता-सहिष्णुता और उनका अदम्य संयम वे तनिक भी न तिलमिलाये-माथे पर एक भी सिकुड़न न आई- मुखमण्डल शान्त और कान्त विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन चुके थे वे। कुदरत ने भी बड़ी उग्र परीक्षा ली उस प्रभुभक्त की-वे उद्दण्ड छात्र भी उस समय अपनी उच्छृंखला पर तुले रहे-जब अति हो गई-भगवान की भेजी हुई उस अग्नि परीक्षा में भक्त जी उत्तीर्ण हो गये तब 109 वीं बार जब गौरांग स्नान करके लौटे उन शठ लड़कों ने उनके चरण पकड़ लिये और अपनी ढिठाई की क्षमा माँगी और भविष्य के लिये उद्दण्डता न करने का व्रत ले लिया। यह है नमन का प्रताप और फल। चैतन्य केवल मुस्करा दिये उनकी करतूत पर और अपने इष्टदेव भगवान श्री कृष्ण जी
13
की उस अद्भुत लीला के ध्यान में ही मग्न हुए अपने स्थान पर लौट आये।
अपने मालिक से प्रार्थना करना-परमात्मा की स्तुति और उपासना इसी "नमन' सोपान के ही अंग हैं जो दम्भ-दर्प-अभिमान से भरा है उसे प्रार्थना करने का विचार ही नहीं आ सकता। उस में अज्ञान, अविद्या कूट कूट कर भरे हैं। उसके मुख से प्रभु प्रार्थना के स्थान पर ये शब्द सुने जाते हैं किः-""मैं बड़ा धनवान हूं, बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान इस धरती पर दूसरा कौन है मैं यज्ञ करुँगा,दान दूंगा गुलछर्रे उड़ाऊँगा इस प्रकार की डींगें ऐसे अज्ञानी लोग मारा करते हैं। ऐसे मद्मत्त लोग हिरण्यकशिपु के समान अपने को ही भगवान मानने लगते हैं। दुर्योधन की न्यार्इं धन-ऐश्वर्य और अधिकारों के मोह में अन्ध हुए अपने मानुष जन्म को व्यर्थ में गँवा देते हैं। परन्तु जो उत्तम संस्कारी हैं उनका जीवन ही किसी और साँचे में ढला होता है वे अपने अन्तर्मानस में इन दिव्य गुणों को पनपाया करते हैंः-
Jai ho haran wale, sab ke pran pyare.....
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