Monday, February 8, 2016

जब चिढ़ियाँ चुग गई खेत...

पाव पलक की सुधि नहीं, करै काल्ह का साज।
काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज़।।
पाव पलक तो दूर है, मो मै कह्रा न जाय।
ना जानौं का होइगा, पल कै दसवैं भाय।।
आज कहै मैं काल्ह भजूंगा काल्ह कहै फिर काल्ह।
आज काल्ह के करत ही, औसर जासी चाल।।
काल्ह करै सो आज करु, आज करै सो अब्ब।
पल में परलै होयगी, बहुरि करैगा कब्ब।
कबीर यह तन जात है, सकै तो ठौर लगाव।
कै सेवा कर साध की, कै गुरु के गुन गाव।।
आछे दिन पाछे गये, गुरु से किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै, जब चिड़ियाँ चुग गई खेत।।
अर्थः-""श्री कबीर साहिब जी का कथन है कि इस संसार में तो पलक झपकने की देर का भी भरोसा नहीं पलक झपकाने की देर तो दूर की बात रही, उसके चौथे अंश का भी भरोसा कहां? तब भी ऐ इनसान! तू ऐसी अनिश्चित अवस्था में कल के लिये साज तैयार कर रहा है? तू नहीं जानता कि मौत अचानक ही उसी प्रकार आकर दबोच लेगी, जैसे कि उड़ते हुए तीतर को बाज़ अचानक आकर झपट लेता है।'' ""पल का चौथा भाग भी अधिक होता है। जीवन तब तक रहेगा अथवा न रह सकेगा, यह हम कुछ नहीं कह सकते। प्रत्युत् हम तो यह भी नहीं जानते कि पल के दशम अंश, में क्या होने वाला है? मनुष्य का जीवन तो इतना क्षणभंगुर है और सोचता यह है कि जगत की समस्त भोग सामग्रियाँ समेट लूँ। क्या यह आश्चर्य तथा दुःख की बात नहीं?'' ""आज तो तू यह कह कर टाल देता है कि मैं कल भजन-बंदगी कर लूँगा। किन्तु यह टालमटोल और ढीलमढाल का क्रम जब एक बार चल निकला तो फिर कहीं भी थमने वाला नहीं। आज यह कहकर टाल दिया कि कल करूँगा। जब कल का दिन आया, तो मन ने फिर कोई नया बहाना घड़कर टाल दिया। उदाहरणार्थ छोड़ो जी, आज भी किसे फुर्सत है? कल खूब फुर्सत देखकर भजन कर लिया जावेगा अथवा आज अमुक अड़चन आन पड़ी है, अमुक बात चित्त के प्रतिकूल हो गयी। आज रहने दो, कल मौका भी ठीक रहेगा और परिस्थितियाँ भी अनुकूल रहेंगी; तब इतमीनान से भजन और सत्संग करते रहेंगे। इसी प्रकार आज कल करते करते ही अवसर निकल जायेगा।'' ""तब क्या करोगे? इसलिये जो काम कल पर छोड़ने चले हो, उसे आज ही कर डालने का दृढ़ संकल्प कर लो; तथा जो कुछ आज के दिन करने का विचार है, उसे अभी तुरन्त इसी क्षण कर डालो, तो अच्छा। घड़ी भर पीछे न जाने क्या हो? तुम कहोगे अजी! कौन सा घड़ी भर में भूँचाल आया जाता है या सृष्टि ऊपर नीचे हुई जाती है? भजन-बंदगी के खूब अवसर मिलते रहेंगे और हम कर भी लेंगे। परन्तु नहीं, यह तर्क भी तुम्हारा असंगत है। तुम कहते हो घड़ी पलक में सृष्टि नीचे ऊपर नहीं हो जायेगी। परन्तु श्री कबीर साहिब जी कहते हैं कि हो जायेगी। तुम मानो न मानो, तुम्हें अधिकार है। किन्तु इसका क्या भरोसा कि मौत कब आकर गर्दन दबोच ले? बहुधा तो ऐसा भी होता है कि मुख का ग्रास मुख में ही रह जाता है, आदमी उसे गले से नीचे तक नहीं उतार पाता कि संसार से कूच कर जाना पड़ता है। ऐसी कितनी ही घटनाएँ दैनिक जीवन में हमारे सम्मुख प्रस्तुत होती रहती हैं। परन्तु महाखेद है मनुष्य की गफलत पर कि तब भी चेतता नहीं और अपना जीवन स्थिर एवं स्थायी मानता है। श्री कबीर साहिब जी का पुनः कथन है कि तुम्हारा यह शरीर शीघ्र ही बिछुड़नेवाला है। तुमसे हो सके तो इसे किसी अर्थ लगाओ, इससे लाभ प्राप्त करो। अर्थात् सन्तों-साधुओं की सेवा करो और गुरु के गुण गाओ। अन्यथा जब यह शरीर जाता रहेगा तब कुछ भी न कर पाओगे। यह बहुमूल्य अवसर तथा ये स्वर्ण-तुल्य दिन जो शुभ-कर्म, भक्ति की कमाई के लिये अब प्राप्त हैं, अति दुर्लभ हैं। जब यह अच्छे दिन योंही बीत गये अर्थात् भजन-बंदगी किये बिना और गुरु से प्रेम प्यार बढ़ाये बिना जब ये दिन बीत जावेंगे, तब फिर पछताते रहोगे कि हमने यह न किया, वह न किया। परन्तु अब क्या लाभ? चिड़ियाँ खेत को चुग खायें, इससे पूर्व ही रखवाले को सचेत रहना आवश्यक था। अब जबकि चिड़ियों ने खेत को चट कर लिया; तो अब रखवाला लाख ढोल पीटे और हो-हल्ला मचाये, कुछ भी बनने करने का नहीं। इसलिये हे भाई! निर्रथक ख्याली पुलाव पकाते रहने से लाभ भी क्या है कि मैं यह करुँगा, वह करूँगा, कल करुँगा परसों करुँगा स्मरण रहे कि मौत की नंगी तलवार हर क्षण सर पर झूल रही है।

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