मन और माया का परस्पर इसप्रकार
गठबन्धन है कि परस्पर मिलकर इन्सान की असली चीज़ जो आत्मा है, उसको भटकाने का प्रयत्न करते हैं। वे यह नहीं
चाहते कि आत्मा----जो कई जन्मों से काल और माया के चक्र में आकर दुःख उठा रही है, उनके पंजे से निकल जाय। इसलिए इन्सान मन की
प्रसन्नता के लिए मायावी शरीर जो मिथ्या एवं क्षणभंगुर है उसके लिए सुख-साधन
जुटाता रहता है। उमदा भोजन,
वस्त्र, मकान,
शरीर और
इन्द्रियों के सुख-उपभोगों से प्रसन्न करना,
परन्तु इन वस्तुओं
से इन्सान की अन्तरात्मा की तृप्ति नहीं होती।
ज्यों-ज्यों इन्सान मन की खुशी और
शरीर तथा इन्द्रियों के सुख-भोग के सामान जुटाता है, जीवात्मा
पर आवरण चढ़ता जाता है,
उसे खुशी प्राप्त
नहीं होती। उसे अपनी निजी वस्तु नहीं मिलती। अज्ञानता एवं भूल से इन्सान मन के
बहकावे में आकर सारा समय शारीरिक एवं ऐन्द्रियक सुखों की पूर्ति में ही खर्च कर
देता है। शरीर चूँकि क्षणभंगुर है इसलिए इनकी सारी खुशियां भी क्षणभंगुर हैं। इससे
इन्सान को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। शरीर जीवात्मा को किसी विशेष कारण से मिला
है। शरीर के पालन-पोषण और इसकी आवश्यकताओं के सामान इसको देता और साथ में अपना काम
भी करता तो इसे खुशी मिल जाती।
जब तक इन्सान को सत्पुरुषों की
संगति न मिले, इसप्रकार का विचार और ज्ञान नहीं
मिल सकता, न ही असलियत प्रतीत हो सकती है और न
ही सच झूठ की परख हो सकती है। झूठे प्रलोभन में ज़िन्दगी का सरमाया खर्च करके अन्त
में हाथ-पल्ले कुछ नहीं आता। सारी आयु इन्द्रियों के रस भोगों में लगाने से खुशी
नहीं मिल सकती। यह माया का बना हुआ शरीर मिथ्या है, कभी
दुःखी है तो कभी सुखी;
एक रस नहीं रहता।
मन भी एक रस नहीं,
यह भी चंचल है। ये
सब न·ार चीज़ें हैं। स्थायी चीज़ की पहचान
के बिना इन्सान दुःखी है। नित्य वस्तु अन्तरात्मा है। महापुरुष इसकी पहचान कराने
के लिए चेतावनी देते हैं कि अपनी वस्तु की पहचान कर लोगे तो स्वयमेव विदित हो
जायेगा कि अपना काम क्या है?
मन के धोखे से बच
जाओगे। यदि सारा समय मन के लिए लगा दिया तो समझो कि समय व्यर्थ नष्ट हो गया। यह
मानव-जन्म किसलिए मिला था और किस काम में लगाना है। महापुरुष फ़रमाते हैं------
दुलभ देह
पाई वडभागी ।।
नामु न
जपहि ते आतमघाती ।।
मरि न
जाही जिना बिसरत
राम ।।
नाम बिहून जीवन कउन काम ।। 1 ।।
रहाउ।।
खात पीत
खेलत हसत बिसथार ।।
कवन अरथ
मिरतक सीगार ।।
जो
न सुनहि जसु
परमानंदा ।।
पसु पंखी
तृगद जोनि ते मंदा ।।
कहु नानक
गुरि मंत्रु दृड़ाइआ ।।
केवल नामु
रिद माहि समाइआ ।।
गुरुवाणी
महापुरुषों ने जीव को चेतावनी
दी है और अपने अनुभवी वचन लिखे हैं। यह मानुष-देही दुर्लभ और क्षणभंगुर है। इससे
दुर्लभ काम लेना है। इस शरीर को आत्मा के काम में लगा देना-----यह दुर्लभ काम है।
अब अपने अन्तर्मानस में झांककर देखो कि इस शरीर को किस काम में लगा रखा है।
खाना-पीना, ऐश-इशरत और शारीरिक रसभोगों का काम क्या अपना काम है? इस
शरीर को शरीर के लिए ही समाप्त कर देना क्या बुद्धिमानी है? यदि
इन्सान नाम नहीं जपता, भक्ति नहीं करता, आत्म-कल्याण का मार्ग कैसे प्रशस्त हो। आत्मा की
उन्नति कैसे होगी? आत्मा जन्म-मरण के चक्र से कैसे आज़ाद होगी? यह तो
आत्मा के साथ घात है। जिस लक्ष्य के लिए शरीर मिला था, उससे
वह काम न लिया तो चौरासी के चक्र में एक बार नहीं कई बार जाना पड़ेगा। पहले भी
चौरासी भोगकर आया है। जीव को पता हो या न हो परन्तु महापुरुषों के अनुभवों से
स्पष्ट प्रतीत होता है।
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