संसार में जब सुख-दुःख दोनों हैं तो
सुखदायक वस्तु भी मिलनी चाहिए। उनकी मांग के अनुसार कुदरत उस का प्रबन्ध कर देती
है। उन्हें ऐसा साधन मिल जाता है जिससे वे घट में ही सच्ची वस्तु को पा लेते हैं।
परन्तु वह साधन कहां से मिलता है?
जब जिज्ञासु की
तीव्र मांग होती है तो सत्पुरुषों का मिलाप हो जाता है, उनकी संगति उपलब्ध होती है। क्योंकि यह सौदा, यह सच्ची वस्तु सत्पुरुषों के दरबार से ही मिल
सकती है। अन्यत्र नहीं मिलती। अन्य कहीं से प्राप्त करने का प्रयत्न विफल होता है।
अब मानव--तन जीव को प्राप्त हुआ है।
अल्पायु में वह चीज़ प्राप्त करनी है जो इसकी अपनी मांग है। जब तक इस जीवन में उसे
प्राप्त नहीं करेगा,
इसका लक्ष्य पूरा
नहीं हो सकता। मानव-जन्म को धारण कर उस सच्ची वस्तु को प्राप्त कर ले जो सुखदायी
हो और मानव-जन्म भी सफल हो सके। कुदरत ने तो पहले ही दोनों चीज़ें उपलब्ध कर दी हैं, दोनों साधन प्रदान किए हैं। दुनिया में मिथ्या
पदार्थ भी मिल जाते हैं और जिज्ञासु को सत्पुरुषों से सच्ची वस्तु नाम और भक्ति की
सम्पदा भी मिल जाती है।
प्रत्येक इन्सान अनुमान लगा सकता है
कि यदि सच्ची और सुखदायक,
झूठी और
दुःखदायक------दोनों चीज़ें उपलब्ध हैं तो कौन ऐसा प्राणी होगा जो झूठी व दुःखदायी
चीज़ को लेकर सुखदायक वस्तु को छोड़ देगा। फिर क्यों आम दुनिया दुःखदायी वस्तु ग्रहण
करती है? क्योंकि उन्हें सुखदायी वस्तु की
परख नहीं, झूठी वस्तु को सत्य समझकर ग्रहण
करते हैं और दुःखी हो जाते हैं।
जब सत्पुरुषों की संगति से उसे यह
परख हो जाती है तो फिर वह झूठे पदार्थों को नहीं लेता बल्कि सच का ग्राहक बन जाता
है और सच्ची वस्तु को प्राप्त करने का इच्छुक होता है। जैसाकि पहले कहा गया
है------"हीरा लेवे जौहरी,
जो मांगे सो देय'। हीरा रूपी भक्ति लेने के लिए पुन: वे तन-मन-धन
समर्पण करने में संकोच नहीं करते। जैसे दुनिया की मार्केट में सौदा करना हो तो दाम
चुकाना पड़ता है। सच्ची वस्तु के ग्राहक को बदले में कुछ देना होगा। जीव के पास
तन-मन-धन और माया के झूठे पदार्थों के अतिरिक्त है ही क्या? यदि सच के बदले में देने भी पड़ें तो लाभ ही लाभ
है, इसमें हानि ही क्या है? जैसे महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। दोहा ।।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।
परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
यह शरीर पांच तत्त्व का पुतला है।
इसमें गन्दग़ी भरी हुई है। यदि इसका उपयोग सही ढंग से किया जाय और सत्पुरुषों की
संगति ग्रहण कर सच्ची वस्तु लेने में संकोच न करे क्योंकि इसमें हानि नहीं। झूठी
वस्तु के बदले सच्ची वस्तु मिले,
यहां भी साथ रहे
और परलोक में भी साथ दे,
इससे ज़्यादा
लाभप्रद सौदा फिर कौनसा होगा?
आप अपने दिल में अनुमान लगायें कि
आम संसारी इस शरीर के बदले क्या प्राप्त कर रहा है और गुरुमुखों को क्या प्राप्त
हो रहा है? गुरुमुखों को सच्चे नाम का सरमाया
मिला है जो लोक परलोक में काम देता है और आम संसारी झूठी माया एकत्र कर रहे हैं, जो यहां भी दुःख का कारण है और परलोक भी उनका
बिगड़ जाता है। महापुरुषों का कथन है-----
सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि
सासि समाले।।
इह लोक परलोकि संगि सहाई जत कत मोहि
रखवाले।।
गुर का बचनु बसै जीअ नाले ।।
जलि नही डूबै तसकरु नही लेवै भाहि न
साकैजाले ।। 1 ।। रहाउ
गुरुवाणी
सद्गुरु का शब्द ऐसी सच्ची वस्तु है, ऐसा सच्चा सरमाया है जिसे कोई ख़तरा नहीं। दुनिया
की प्रत्येक चीज़ को भय है। सद्गुरु का शब्द व नाम ऐसा सच्चा सरमाया है कि जिसके
ह्मदय में इसका वास हो जाये तो यहां भी हर जगह पर सहायक और परलोक में भी संगी।
आखिरकार इन्सान को यहां से कूच करना
ही है, इस दुनिया को छोड़ना ही छोड़ना है।
आगे इसके साथ क्या जायेगा?
यदि सच्ची चीज़
खरीदी होगी तो सच्ची चीज़ जायेगी और यदि झूठे ख्याल होंगे तो झूठ संग जायेगा। झूठ
के बदले चौरासी लाख योनियां और सच के बदले दरगाह में मान-प्रतिष्ठा मिलेगी।
यह बात अच्छी तरह से जान लो कि जीवन
चार दिन का है। जीवन में कौनसी सच्ची वस्तु एकत्र करे जो अंग-संग रहे। यह ध्यान
रखना आवश्यक है कि असत् को दिल में स्थान न देकर सत् को ही ह्मदय मन्दिर में बसाना
है। महापुरुषों ने जो नियम निर्धारित किये हैं, यह
सच्चे नाम को ह्मदय में बसाने के साधन हैं। इनका नित्य प्रति सेवन कर माया की
मलिनता को निकालना है। गुरुमुखजन सच्ची वस्तु मालिक के नाम को दिल में बसा कर जीवन
को धन्य बनाकर इसे सफल कर लेते हैं।
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