इस द्वन्द्वमयी संसार में कुदरत ने
दोनों चीज़ें उत्पन्न कर दी हैं------सत् और नित्य पदार्थ, असत् व अनित्य पदार्थ। दोनों चीज़ें संसार में
उपलब्ध हैं, दोनों की तासीर भी अलग-अलग है। जो
सत् और नित्य वस्तु है,
उसको ग्रहण करने
से इन्सान को सुख,
शान्ति मिलती है।
असत् और अनित्य पदार्थ मिल जाने पर दुःख और अशान्ति का सामना करना पड़ता है। दोनों
पदार्थ तो मौजूद हैं परन्तु देखना यह है कि सुख और खुशी देनेवाले सत् व नित्य
पदार्थों को कौन चाहता है और असत् व अनित्य पदार्थों का ग्राहक कौन है? आम दुनिया का रुख़ और मांग झूठे पदार्थों तथा न·ार सामानों की ओर है। उनको चाहने वाले लोग अधिक
हैं। जैसेकि महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। दोहा ।।
सब जग वणजे खार खल, हीरा कोई न लेय ।
हीरा लेवे
जौहरी, जो
मांगे सो देय ।।
दुनिया के तुच्छ पदार्थ खार खल हैं
अर्थात् सार वस्तु के निकल जाने पर जो छिलका शेष रह जाता है उस के बराबर हैं।
इसीलिए सांसारिक पदार्थों की तुलना खार खल से की गई है। इसको चाहने वाले सारे
संसारी लोग हैं। हीरा रूपी भक्ति,
नाम जो सत् वस्तु
हैं; उसको चाहनेवाले विरले-विरले
संस्कारी जीव हैं। इस बात की समझ किसको आती है कि सत् वस्तु में सुख भरा हुआ है, केवल संस्कारी गुरुमुखों को। इसको सब क्यों नहीं
चाहते? क्योंकि उनकी इसतरह की समझ ही नहीं
और न ही उनको ऐसा सत्संग मिला है।
इन्सान चाहता है कि मुझे सुख व
शान्ति मिले, परन्तु जब सुख शान्ति का सवाल पैदा
होता है, इन्सान की समझ काम नहीं करती। बाहरी
स्थूल चीज़ों की चमक-दमक व उसमें थोड़े समय के सुख की झलक देख कर इन्सान उनपर मोहित
हो जाता है। चूँकि सत् पदार्थ की उसको समझ ही नहीं है। कारण क्या है? कारण यह है कि असत् पदार्थ सब माया की रचना हैं।
ये सब दृश्यमान हैं। इन बाह्र चीज़ों को देखकर इन्सान भूल जाता है। जो सत् वस्तु है
वह इसे नज़र नहीं आती,
न ही उसका इसे
ज्ञान और विचार है। इसीलिए भ्रम में झूठी चीज़ों की चाहना कर धोखा खा जाता है।
इन्सान चाहता तो है कि मुझे सुख
मिले, परन्तु ऐसा कोई बाज़ार नहीं, नगर नहीं,
प्रदेश नहीं जहां
मायावी पदार्थ पाकर सच्चा आनन्द और सुख मिले। इनमें क्यों सुख नहीं? दृष्टमान जितने भी मायावी पदार्थ हैं, इनमें दुःख भरा हुआ है। इनकी तासीर ही दुःखदायक
है। मालिक के नाम और भक्ति में सुख ही सुख भरा हुआ है। यदि कोई इन्सान कहे कि नाम
और भक्ति मुझे बाज़ार से या शहर से नहीं मिल सकती ? सत्पुरुष
फ़रमाते हैं कि वह हर स्थान पर मौजूद है;
इस घट के अन्दर भी
है। जिज्ञासु पुरुष जिनके ऐसे संस्कार हैं,
जिन्हें जागृति आ
गई हो, उत्कंठा उत्पन्न हो गई हो, उनको यह सुखवाली नाम और भक्ति मिल जाती है।
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