गुरुमुखों को ऐसा
स्वर्णिम संयोग मिल गया है। इस समय को गनीमत जानते हुए इसकी कदर करनी चाहिए। अब
जहाँ गुरुमुख बैठे हैं, स्वयं
अनुभव कर सकते हैं कि यहाँ क्या चीज़ मिल रही है। संसार में जो गुरुमुख रहते हैं
उनको सत्पुरुषों की संगति से यह विदित हो गया है कि संसार के पदार्थ, शारीरिक सम्बन्ध अथवा
जितने भी आडम्बर हैं इनमें से कोई भी वस्तु परलोक में जाने वाली नहीं और न ही कोई
सहायता दे सकती है। इनमें सुख भी नहीं मिलता। दरबार में नित्यप्रति जो साधन करवाये
जाते हैं उनपर गुरुमुख आचरण करके सच्चा सुख, सच्ची
खुशी प्राप्त करते हैं। उन्हें यह परख हो गई है कि यह सच्चा सुख है, सच्ची वस्तु है और अन्त
में साथ जाने वाली है। गुरुमुख का दिल ही साक्षी है।
जब इन्सान प्रकाश में आता
है तो वहाँ पड़ी सभी वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। अन्धेरे में किसी भी वस्तु को
नहीं देख सकता और न ही जांच कर सकता है। प्रकाश में ही सब कुछ दिखाई देता है।
सत्पुरुषों की संगति का यह प्रभाव है कि इन्सान के दिल में प्रकाश हो जाता है। उसे
विदित होता है कि भक्ति और नाम की कमाई कितनी लाभदायक वस्तु है, जो इस समय मिल रही है। महापुरुषों
ने भी ऐसे नियम निर्धारित किये हैं जो भक्ति द्वारा भक्त को भगवान से मिलाने के
साधन हैं। इन साधनों की जो कमाई करता है, वह
लक्ष्य को पा लेता है।
भजनाभ्यास, सेवा, सत्संग, सुमिरण और ध्यान-----इन
नियमों को ह्मदयंगम कर नित्यप्रति नियमपूर्वक आचरण करने से जो पूर्व के झूठे और
बुरे ख्याल दिल में भरे हुए होते हैं, वे
निकल जाते हैं। मालिक का सच्चा नाम और
ध्यान ह्मदय में बस जाता है तथा अन्तरात्मा में प्रकाश हो जाता है। ऐसा
प्रकाश होने पर फिर क्यों न खुशी अनुभव हो। इन्सान दुःखी कब होता है? जब उसकी प्रिय वस्तु बिछुड़
जाती है। यदि इन्सान का असत् वस्तुओं से नेह न हो, सच्ची वस्तु से प्यार हो, जो शा·ात् एवं सदा साथ देने
वाली हो एवं खुशी प्रदाता हो तो क्यों न वह खुशी और आनन्द में मग्न रहे। गुरुमुखजन
ऐसी चीज़ को अपनाते हैं जो सर्वदा उनके संग रहे। शेष दुनियावी वस्तुएँ साथ छोड़ जाती
हैं। अन्तिम श्वास तक साथ जानेवाला तथा सदा संग साथ रहनेवाला केवल मालिक का सच्चा
नाम है। महापुरुषों का कथन है-----
सिमरउ सिमरि सिमरि सुख
पावउ सासि सासि समाले ।।
इह लोकि परलोकि संगि सहाई
जत कत मोहि रखवाले ।।1।।
गुरु का बचनु बसै जीअ
नाले ।।
जलि नही डूबै तसकरु नही
लेवै भाहि न साकै जालै ।।
गुरुवाणी
स्वांस स्वांस में मालिक
का नाम जपो और स्वांस स्वांस में सुख पा लो। जो जीव सतगुरु का शब्द स्वांस स्वांस
में जपता है, उसको
सुख मिलता है। यह इस लोक में भी संगी साथी है और परलोक में भी सहायी है। जब हर समय
इन्सान के दिल में मालिक का नाम बसा रहेगा तो फिर उसे किस बात का भय और किस बात की
कमी?
जब उसने
नेह ही उस चीज़ से लगा लिया है जो सर्वव्यापक है। जब ऐसा सहायक मिल गया तो अन्य
किसी सहायता की क्या आवश्यकता है। जब जीव के पास खुशियों का भण्डार हो तो और चीज़ों
की क्या ज़रूरत? सब
कुछ उसके पास आ गया।
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