।। शेअर ।।
आकबत चीज़े
कि दारी नज़र ।
फ़ानी अन्द फ़ानी शवद र्इं सर बसर ।।
जहाँ तक भी संसार की ओर दृष्टि जाती
है, वह सब नश्वर है, न·ार होगा और नश्वर ही रहेगा। इन्सान
किस को सत् और किसको असत् कहे-----यह उसकी समझ से बाहर है।
जब तक इन्सान सत्पुरुषों की संगति
में नहीं आया, इसका विचार आ सकना कठिन है। जब जीव
को भाग्य से सत्पुरुषों की संगति मिल जाती है, तभी
यह विचार उत्पन्न होता है। बुद्धि से माया का पर्दा दूर हो जाता है और अज्ञानता की
निद्रा से जाग जाता है। जब सत् असत् का निर्णय विदित होता है तो इन्सान अपने काम
में लग जाता है। प्राय: संसार का रुझान असत् की ओर है। यदि इन्सान इसीप्रकार असत्
की ओर लगा रहा तो क्या प्राप्त होगा?
सारा जीवन इसी
प्रयत्न पुरुषार्थ में ख़र्च हो जायेगा परन्तु हाथ कुछ भी न आयेगा। बड़े बड़े
विद्वान्, उच्च स्तरीय धनवान और कितने ही
शान-शौकत वाले हों,
परन्तु महापुरुषों
की दृष्टि में उनके पल्ले कुछ भी नहीं। दुनिया की दशा को देखकर महापुरुष फ़रमाते
हैं------
रतनु तिआगि
कउडी संगि रचै ।।
साचु छोडि
झूठ संगि मचै।।
जो
छडना सु असतिरु
करि मानै।।
जो होवनु
सो दूरि परानै।।
छोडि जाइ
तिसका रुामु करै।।
संगि सहाई
तिसु परहरै।।
चंदन लेपु
उतारै धोइ।।
गरधप प्रीति
भसम संगि होइ।।
अंध कूप
महि पतित बिकराल।
नानक काढि
लेहु प्रभ दइआल।।
गुरुवाणी
महापुरुषों ने फ़रमाया है कि जो
वस्तु हीरे रत्नों सम कीमती है अर्थात् मालिक की भक्ति, मालिक का सच्चा नाम-----जोकि कीमती वस्तु है
उसको इन्सान छोड़कर झूठे संसार के सामानों में दिल लगा बैठा है। जो वस्तु यहाँ रह
जानी है, अवश्यमेव छोड़नी है, उसके लिए परिश्रम करता है और मालिक का सच्चा नाम
जो साथ जायेगा-----उसकी चिन्ता ही नहीं;
ऐसा उलटा मार्ग
इन्सान ने अपनाया है। अज्ञानता के अन्धेरे में पड़े हुए ऐसे जीव का कल्याण क्योंकर
होगा।
अब गुरुमुख स्वयं अनुभव करें कि
आपके कितने ऊँचे भाग्य हैं जिनकी झूठ की ओर पीठ और सच की ओर मुख है अर्थात् सत्यता
के मार्ग पर अग्रसर हैं। सत्पुरुषों की संगति में आकर असत् का त्याग कर सत् ग्रहण
किया है। संसार की संगति में न झूठ छूट सकता है और न सच ग्रहण किया जा सकता है।
सारी दुनिया झूठ में ग्रस्त है। सत्य मार्ग फिर कौन बतलाये? सत्य से मिलाप कराना, सत् की कमाई करवाना------यह सत्पुरुषों की संगति
में ही उपलब्ध हो सकती है। वही भाग्यशाली जीव हैं जिन्हें सत्पुरुषों की
संगति प्राप्त है तथा वही सत् की कमाई
करते हैं। सत्पुरुषों की संगति में ही सत् असत् की परख होती है। अपने पराये की
सूझ-बूझ मिलती है। निजी काम का पता लग जाता है जिससे इन्सान अपने जन्म का
पूरा-पूरा लाभ उठा लेता है। मानुष-जन्म की पूरी कदर--कीमत प्राप्त कर लेता है।
No comments:
Post a Comment