जो सुख-शान्ति का इच्छुक है, जिसे दुःख नहीं चाहिए उसका यह कर्तव्य हो जाता
है कि वह सुखवाली चीज़ मालिक के नाम को अन्दर बसाये। व्यर्थ में ही ग़म चिन्ता क्यों
खरीदे? उसे जब तक मार्ग नहीं मिला था, सत्पुरुषों की संगति प्राप्त नहीं हुई थी; तबतक भटक रहा था और समझ रहा था कि धन इकट्ठा करो
तो सुख मिलेगा। माया,
मित्र, सम्बन्धी बहुत होंगे तो सुख मिल जायेगा। शरीर
ह्मष्ट-पुष्ट होगा तो सुखी हो जाऊँगा------परन्तु ऐसा नहीं है। आपने अपने अनुभव से
देखा होगा कि बहुत धन-परिवार हो,
मित्र-सम्बन्धी भी
हों, शरीर ह्मष्ट-पुष्ट हो और सब सुख
सुविधा के सामान उपलब्ध हों तो ऐसा इन्सान सुखी होगा------यह नहीं देखा। वह सुखी
तभी होगा जब सुखवाली चीज़ अन्दर बसी होगी और उसके लिये परिश्रम करेगा। फ़रमान है----
।। दोहा ।।
सुख के साधन बहुत किये, दुःख और चिन्ताबढ़ी।
सहजे ही सुख मिल गया, जब सतगुरु शरणगही।।
महापुरुष फ़रमाते हैं कि इन्सान अपने
ख्यालों से दुनियावी सुख प्राप्त करने के लिए अनेक उपाय करता है। परन्तु देखा जाता
है कि प्राय: दुःख और चिन्तायें बढ़ जाती हैं। जब इन्सान को सत्पुरुषों की संगति
मिल जाती है और उनकी चरण शरण में ज्ञान प्राप्त होता है, सुखवाली चीज़ मालिक का नाम अन्दर बस जाता है, जब भक्ति को अपनाता है तो सहज में ही सब कुछ मिल
जाता है, सभी ग़म, दुःख-दर्द दूर हो जाते हैं।
यही विचार करना है कि यदि माया के
धन्धों में जीवन चला गया तो सुख न मिलेगा। यदि सत्संग की एक घड़ी भी मिल जाय तो फिर
अपनी हालत को देखो कि क्या चीज़ मिलती है। सुख चैन मिलता है कि नहीं; इन्सान यह स्वयं अनुभव कर सकता है। सत्पुरुषों
की संगति में सुख-शान्ति और आनन्द भरा हुआ है। सत्पुरुषों के वचन सुनकर कोई उनपर
अमल तो करके देखे,
फिर क्यों न सुख
प्राप्त हो। ऐसा नहीं हो सकता कि सत्पुरुषों के वचन मानकर उनपर आचरण करे और सुख न
मिले। यह अटल सत्य है कि जिसको सत्पुरुषों की संगति मिल गई मानो उसको आत्म-कल्याण
का मार्ग मिल गया और सच्चे सुख की खान मिल गई। दुनिया में इंसान भटक भटक कर दुःख
उठा रहा था; सत्संग में आने से सुख की प्राप्ति
हो गई।
।। दोहा ।।
कबीर कलह अरु कलपना, सतसंगति से जाय ।
दुःख वा से भागा फिरे, सुख में रहे समाय ।।
परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
सत्पुरुषों की संगति में आ जाने से
कलह-कलपना समाप्त हो जाते हैं;
दुःख वहां से
कोसों दूर भागता है। क्योंकि सत्संगति में दुःख के लिए स्थान ही नहीं है। जब दुःख
नहीं रहेगा तो स्वयमेव इन्सान सुखी हो जायेगा। सुखी वह हो गया जिसकी सुरति नाम में
लग गई। सौभाग्यवश उसे सुखवाली चीज़ मिल गई। महापुरुषों की वाणियां जीव को चेतावनी
देती हैं कि सुख पाने का एक ही साधन है।
किलविख सभे उतरनि नीत नीत गुण गाउ
।।
कोटि कलेसा ऊपजहि नानक बिसरै नाउ ।।
गुरुवाणी
मालिक के नाम का सुमिरण करोगे, सुखी हो जाओगे। उसकी याद में कभी दुःख नहीं आ
सकता। माया की याद में कई प्रकार के दुःख उत्पन्न होते हैं। मालिक के नाम-सुमिरण
से सुख उपलब्ध होता है। क्या यह सौदा घाटे का है? इसी
समय में मालिक की भक्ति और नाम का सुमिरण करो-----सुख मिलता है। दूसरी ओर
माया-धन-दौलत के चिन्तन करने से दुःख मिलता है। चाहता तो इन्सान सुख है और चिन्तन
माया के सामानों का करता है। करोड़ों क्लेश सम्मुख उपस्थित हो जाते हैं।
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