Wednesday, February 3, 2016

सत्य को अपनाओ


जिसप्रकार एक घड़ी का अलार्म सोये हुए इन्सान को जगा देता है, इसीतरह महापुरुषों के वचन अज्ञान की नींद में सोये हुए जीवों को जागृति प्रदान करते हैं। वह अज्ञानता क्या है? कि इन्सान मिथ्या संसार और संसार के मिथ्या पदार्थों को सत् समझ बैठा है। जो चीज़ सच्ची है उसका उसे पता ही नहीं बल्कि सच को झूठ मान बैठा है। यही भारी अज्ञानता है। इसी अज्ञानता को दूर करने के लिए महापुरुष जीवों को उपदेश करते हैं।
।। दोहा ।।
मिटते स्यौं मत प्रीत कर, रहते स्यौं कर नेह ।
झूठे को तज दीजिये, साचे में कर गेह ।।
महापुरुषों ने फ़रमाया है कि जो वस्तु नाश हो जाने वाली है, मिथ्या एवं असत् है, ऐ जीव! उससे प्रीत मत कर अर्थात् उससे अपना नेह न लगा। जो सदा स्थिर रहने वाली सत् वस्तु है उससे प्यार कर एवं नेह बढ़ा। अन्तर के अज्ञान तम को दूर करने का यही एक साधन है। यदि महापुरुषों के इन वचनों पर आचरण करेगा तो निश्चय ही मानुष-जन्म के लक्ष्य को पूरा कर लेगा। जन्म-जन्मान्तरों से चौरासी लाख योनियों में भटकती हुई रूह का कल्याण हो जायेगा। रूह मुक्त हो जायेगी और अपने बिछुड़े हुए मालिक से मिल जायेगी।
इन्सान को यह विचार करना चाहिए कि दिल में दुनियावी ख्याल, मिथ्या पदार्थ एवं असत् वस्तुओं के प्रति किस स्तर तक प्रीति है तथा इनमें कितना दिल दिया हुआ है और सत्य वस्तु मालिक का नाम और भक्ति है, उसमें कितना दिल दिया है, उससे कितना प्यार एवं नेह बढ़ाया है। अपने अनुभव से स्वयं ही हानि लाभ का पता चल जाता है। यदि इन्सान दुनिया की ओर दृष्टिपात करे और चाहे कि अपनी बुद्धि व चतुराई से यह जान सके कि कौन सी वस्तु सत् है और कौनसी असत् है; तो वह निर्णय नहीं कर सकता। महापुरुषों ने अटल निर्णय बतला दिया कि सारा संसार असत् है, शरीर भी असत् है। इन्सान अपनी बुद्धि व चतुराई से सत् असत् की पहचान कैसे कर सकता है।

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