दोहा
– मम प्रिय गुरुदेव जी , निज मौज अनुसार ।
मधुर सरस कहे श्री वचन, शौच तीन
प्रकार ।।
प्रथम तन की पवित्रता, होय द्वारा
स्नान ।
बुरे कर्म के त्याग से, शौच दूसरा जान
।।
तृतीय चित से दग्धकर, शुभ अशुभ विचार
।
संकल्पो से रहित मन, आत्म दीदार ।।
एक
दिन श्री वचन हुये कि शौच तीन प्रकार का होता है । प्रथम स्नान आदि द्वारा होता है
। दूसरा मन की इच्छओ को त्याग कर करने से होता है । तीसरा तमाम जो ईश्वर के
अतिरिक्त अन्य विचारों के मन से निकाल देने से होता है ।
भाव
कि प्रथम शुद्धि शरीर के स्नान द्वारा होती है । दूसरी मानसिक पवित्रता जो मन को
अशुभ विचारों से खाली कर देने से होती है । यह शुद्धि सत्संग श्रवण करने और साधु
महात्माओं की सेवा से प्राप्त होती है । तीसरी है आत्मिक शुद्धि यह तब होती है जब
चित की गहराई मे इष्टदेव के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का भी विचार न रहने पाये ।
चाहे व शुभ हो या अशुभ । यह शुद्धि परिपूर्ण सतगुरु की शरण संगति और पवित्र सेवा
करने से होती है । सन्त सद्गुरु द्वारा प्रदान शब्द की कमाई करने से चित निर्मल हो
जाता है तो घट में प्रकाश होने से समस्त शुभ अशुभ विचार दूर हो जाते है और चित
एकाग्र होकर ब्रह्म मे लीन हो जाता है। यह शुद्धि उत्तम श्रेणी की है ।
एक
दिन श्री वचन हुये कि कोई ब्रह्माण तेरह वर्ष तक विद्या पढ कर जब बनारस मे वापिस
आया को वाद विवाद के विचार से श्री कबीर साहिब के पास गया । कबीर जी ने उस की बड़ी
भावभगत की और उसको सूखा सीधा देकर कहा महाराज जी पहले आप भोजन बना कर खा लीजिये ।
ब्राह्मण जी ने कबीर के चारों ओर घर की तरफ देखा कही ताना लगा है कपड़ा बुना जा
रहा है कही मक्खियाँ भिनक रही है । इस लिए नदी के किनारे जा कर एक जगह भोजन बनाया
और खाया । सन्तों का काम तो जीव को सन्मार्ग दिखाना होता है । कबीर जी ने वहाँ की
जगह खोदकर यहाँ बाह्मण ने खाना बनाया था दिखाई वहाँ से ऊट की हड्डी निकली और
ब्राह्मण को दिखाया आप ने इस स्थान को पवित्र समझा था पंड़ित जी अभी आप ने तेरह
वर्ष बाहर की शुद्धता और पवित्रता ही पढ़ी है । अब वह विद्या पढ़नी चाहिये जिस से
अन्तकरण की मैल साफ हो यानि अन्दर की पवित्रता का ज्ञान हो ज्ञान पुस्तके को पढ़ने
से नही होता उस पर अमल करने से होता है अर्थात ज्ञान के भंडार मे प्रभु को नही
पाया जा सकता । तू अपने ह्रदय की पुस्तक पढ़ ।इससे उत्तम कोई पुस्तक नही है ।
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