।। दोहा ।।
निद्रा भोजन भोग भय, ये पशु पुरुष समान ।
नर्न ज्ञान निज अधिकता, ज्ञान बिना पशु जान ।।
फिर मानुष में विशेषता कौन सी हुई? काम,
क्रोध, मोह,
लोभ और
अहंकार----वह उनमें भी है और इन्सान में भी है। आत्मज्ञान ही इसकी विशेषता है। यदि
आत्म-ज्ञान नहीं तो पशु और मनुष्य में कोई अन्तर नहीं बल्कि पशु इससे अच्छा है।
क्योंकि----
पसू मिलहि चंगिआईआ खड़ु खावहि अंमृतु
देहि ।।
नाम विहूणे आदमी धृगु जीवण करम
करेहि ।।
गुरुवाणी
गाय, भैंस
भूसा और खली खाते हैं तथा अमृत के समान दूध देते हैं जो मानव के लिए अमृत-तुल्य
है। मनुष्य सब कुछ अच्छा खाता-पीता हुआ,
भोग भोगता हुआ, कुदरत की सभी वस्तुओं का उपभोग कर उसका आनन्द
लेता हुआ यदि मालिक की भक्ति नहीं करता तो पशु से भी बदतर (अधम) है। इस बात को कोई
सोचे या न सोचे,
अन्त में परिणाम
तो अवश्य निकलेगा। प्रकृति की ओर से नियम निर्धारित हैं, अन्त में निर्णय होगा ही। जिस हकीकत के लिए
मानुष को भेजा है वह काम तो कर। कभी एकान्त में बैठकर विचार कर। तुझे एक न एक दिन
जाना है और हिसाब भी देना होगा। हिसाब लेने वाला भी वही मालिक ही है। वह सौदा करके
जाओ जो मालिक को पसन्द हो और परलोक भी संवर जाय। वह सौदा कौनसा है? महापुरुष फ़रमाते हैं----
वणजु करहु वणजारिहो वखरु लेहु समालि
।।
तैसी वसतु विसाहीऐ जैसी निबहै नालि
।।
अगै साहु
सुजाणु है लैसी
वसतु समालि ।।
भाई रे रामु कहहु चितु लाइ ।।
हरि जसु वखरु लै चलहु सहु देखै
पतिआइ ।।
गुरुवाणी
गुरुमुखो! ऐसा सौदा करो, ऐसी कमाई करो कि मालिक प्रसन्न हो जायें। वह
केवल नाम और भक्ति की कमाई है। यदि मालिक को ह्मदय में बसा लिया तो मालिक प्रसन्न
हो जायेंगे और उन्हें कुछ ज़रूरत नहीं। उन्हें केवल नाम और भक्ति की कमाई ही पसन्द
है, दुनिया के पदार्थ नहीं। इसलिए जो
वस्तु मालिक को अच्छी लगे वही काम करो। यदि मालिक प्रसन्न हैं तो अन्य किसी को
प्रसन्न करने की आवश्यकता नहीं। बूँद समुद्र में मिल गई तो समुद्र रूप हो गई। यदि
मालिक को प्रसन्न कर लिया तो सब वस्तुएँ उसमें आ गर्इं, यह कितना लाभ .का सौदा है। समय बहुत व्यतीत हो
गया, शेष थोड़ा रहा, इन्सान को समझ लेना चाहिए। महापुरुषों से नाम की
प्राप्ति हो चुकी है,
उससे जीवन का
पूरा-पूरा लाभ उठावें। यहां भी ज़िन्दगी सुखपूर्वक गुज़रे और मालिक की दरगाह में भी
सुर्खरुई मिले।
Rab de gyan bina insaan pashu h.
ReplyDeleteजैसे चूड़ी कांच की वैसे नरकी देह
ReplyDeleteजतन करे जावसी हरी भज हाथा लेय
राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट अंत समय पछताएगा प्राण जाएंगे छूट राम नाम ने आलसी भोजन में होशियार तुलसी ऐसे जीव को मेरा बार-बार धिकार