इस संसार की रचना में काल माया और
दयाल दोनों शक्तियां काम कर रही हैं। माया की बलवती शक्ति जिसके साथ मन और मन के
साथी काम-क्रोध-मोह-लोभ और अहंकार,
ईष्र्या व
तृष्णा------ये सब परस्पर मिले हुए हैं। इन के द्वारा माया ने आम संसारियों को
अपने अधीन कर रखा है। इनके पंजे में आया हुआ जीव दुःखी और परेशान है। कोई भी
इन्सान यदि यह चाहे कि मैं अपने बाहुबल, बुद्धिमत्ता या अस्त्र-शस्त्र से मन और माया पर
विजय पा लूँ अथवा इन्हें अधीन कर लूँ तो यह ऐसा नहीं कर सकता। यदि मन माया पर विजय
पाना चाहे, इनके पंजे से आज़ाद होकर दुःख
परेशानियों से मुक्त होना चाहे तो उसे सन्त सद्गुरु की चरण-शरण ग्रहण करनी होगी, तभी त्राण पा सकता है।
प्राय: देखा यह जाता है कि आम
संसारियों का रुख़ माया की ओर है। चाहे वे दुःखी व परेशान हैं, कई चिन्ताओं में ग्रस्त हैं, परन्तु माया के ख़्यालों को नहीं छोड़ते। इससे
किनारा भी नहीं करना चाहते,
इसीलिए सदा दुःखी
व परेशान हैं। मन माया के अधीन होकर ऐसा अनमोल मानुष-जन्म का स्वर्णिम अवसर अपने
हाथों से गँवा देना चाहते हैं।
इस दशहरे के पर्व के विषय में सबको
ज्ञात है कि रावण कितना बलशाली,
विद्वान् और
बुद्धिमान था। उसके पास कितना अस्त्र-शस्त्र का बल था। इतना सब कुछ होते हुए भी वह
मन के अधीन था। क्योंकि वह सत्पुरुषों की चरण-शरण व संगति से वंचित था; इसलिए इतना बलशाली होते हुए भी मन पर विजय न पा
सका। उसका परिणाम क्या हुआ?
यह सबको विदित ही
है। मन के अधीन होने से उसे पराजित होना पड़ा अर्थात् असत्य से नीचा देखना पड़ा।
असत् पर सत् की विजय हुई। श्रीराम जी से उसे पराजित होना पड़ा। मन और माया जो भी
संसार का पसारा है,
सब झूठ है। राम की
भक्ति दयाल की शरण----यह सब सत् है। भक्ति ने माया अर्थात् सत्य ने असत्य पर विजय
पाई। रावण की हार हुई और राम की जीत हुई। रावण का पतन राम के हाथों हुआ।
अब विचार यह करना है कि विजय तो सत्
की ही हुई। वे संस्कारी एवं भाग्यशाली जीव हैं जो सत्पुरुषों की चरण-शरण में आ गये
और मालिक की भक्ति को अपना लिया। मालिक के सच्चे नाम को ह्मदय में बसा लिया। जिसने
मालिक की भक्ति और सच्चे नाम को दिल में बसा लिया उसके दिल से अहंकार ने डेरा उठा
लिया और मन माया का ज़ोर नष्ट हो गया। इसके द्वारा जीव झूठ व मन माया पर हावी हो
गया। इनसे छुटकारा पाकर तथा मालिक की भक्ति को दिल में बसाकर वे सुखी हो जाता है
और जीवन आनन्दमयी बना लेता है।
यह आप स्वयं ही अनुभव कर सकते हैं
कि वे जीव कितने भाग्यशाली हैं जिन्हें सत्पुरुषों की चरण-शरण मिल जाती है और
भक्ति का सच्चा मार्ग विदित हो जाता है। प्रत्येक प्राणी के ऐसे संस्कार एवं
भाग्योदय नहीं होते कि मन माया से किनारा कर सके। सत्पुरुषों की चरण-शरण ग्रहण
करने से सच्ची वस्तु मालिक की भक्ति मिल सकती है। यही सच्चा सुख देने वाली है और
जिसे प्रत्येक नहीं पा सकता। इसे भाग्यशाली ही प्राप्त करते हैं, चाहे वे संसार में थोड़े होते हैं। संसार में
प्रत्येक वस्तु के दो पहलू होते हैं। यही कारण है कि गुरुमुख संसार में थोड़े होते
हैं परन्तु भक्ति और सच्चे नाम की कमाई से सुखी एवं आनन्दमग्न होते हैं।
आप अपने दिल में अनुभव कर सकते हैं
कि मन और माया की लपेट में आया हुआ सारा संसार दुःखी और परेशान है। दुःखों से
छुटकारा पाने का कोई मार्ग ही नहीं मिल पाता। उनके लिए सब कुछ संसार है। माया की
इस रचना में उन्हें कोई आश्रय नहीं मिल पाता। जीवन को इसी में खतम कर रहे हैं।
चाहे यह जीवन अनमोल व आनन्दमयी है,
इसके बदले में
क्या क्या प्राप्त कर सकता है परन्तु उनके ऐसे सौभाग्य कहाँ? क्योंकि उन्हें सत्पुरुषों की सुसंगति उपलब्ध
नहीं होती जिससे वे अनमोल जीवन से अनमोल दात प्राप्त कर सकें।
गुरुमुखों के इतने ऊँचे भाग्य हैं
जिसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। प्रत्येक को ऐसा अवसर और संयोग नहीं मिलता जिसे
पाकर जीवन को कृतार्थ और सफल बना सकें। भक्ति का रंग चढ़ाकर भगवान से मिल सकें।
विरली-विरली रूहों को ऐसा सुअवसर मिलता है। जो माया को तुच्छ समझते हैं, यह भी साधारण बात नहीं। एक ओर माया की दलदल में
फँसकर जीव नीच योनियों का शिकार हो जाता है,
चौरासी में भटकता
और युगों तक कष्ट उठाता है;
दूसरी ओर सत्संग
के प्रकाश में आकर संसार में रहता हुआ संसार से न्यारा रहे----कितने आनन्द की बात
है। घोर कलियुग में माया की दलदल से निकल कर सुखी हो जाय-----यह केवल गुरुमुख ही
अनुभव कर सकते हैं। मगर कब?
जब सत्पुरुषों की
संगति मिल जाती है। सत्पुरुषों का कथन है-----
।। दोहा ।।
कबीर वैरी सबल है, जीव एक रिपु पांच ।
अपने अपने स्वाद को, सभी नचावैं नाच ।।
जीव स्वयं निर्बल है। मन शत्रु और
बलवान है क्योंकि उसके साथ काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार साथी हैं। जीव के शत्रु हैं।
इनके द्वारा सारी दुनिया को अपने अधीन कर रखा है। अपने इन रसों एवं
विषय-इन्द्रियों के द्वारा सबको नाच नचा रहा है। इनके पंजे से छूटना कठिन नहीं
बल्कि असम्भव हो गया है। जिन सौभाग्यशाली गुरुमुखों को सत्पुरुषों की संगति मिल
जाती है उन्हें इनसे आज़ाद होने का मार्ग मिल गया, साधन
मिल गया। महापुरुषों की सहायता से उन साधनों पर आचरण कर इन शत्रुओं से आज़ाद हो
जाते हैं। महापुरुष ही माया के पंजे से आज़ाद करने का साधन बतलाते हैं। वे केवल
साधन ही नहीं बतलाते अपितु उनपर आचरण करवाते हैं। केवल पढ़ने सुनने में न रह जायें
बल्कि आचरण में लाकर मुक्ति प्राप्त कर लें।
भक्ति मार्ग में जितने भी नियम साधन
हैं केवल इसी हेतु कि इन्सान मन के पंजे से आज़ाद हो जाय। कथनी सरल और आचरण कठिन
है। यह कार्य चाहे कठिन है परन्तु इसके हल करने के भी साधन हैं। इन साधनों से वह
आनन्द, सुख मिलता है जो वाणी कथन नहीं कर
सकती और जीह्वा अशक्त है। जब इन्सान को इसका रस आ जाता है तो झूठा मायावी रस छूट
जाता है। जबतक सच्चे आनन्द का रस नहीं आता,
मिथ्या इन्द्रियों
का रस अच्छा लगता है। विषयों के तुच्छ रसों के लिए जीव जन्म-जन्मों तक नीच योनियों
का शिकार हो जाता है और दुःख उठाता है।
S good one.
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