Sunday, January 31, 2016

हृदय की शुद्धि...


दोहा – मम प्रिय गुरुदेव जी , निज मौज अनुसार ।
            मधुर सरस कहे श्री वचन, शौच तीन प्रकार ।।
            प्रथम तन की पवित्रता, होय द्वारा स्नान ।
            बुरे कर्म के त्याग से, शौच दूसरा जान ।।
            तृतीय चित से दग्धकर, शुभ अशुभ विचार ।
            संकल्पो से रहित मन, आत्म दीदार ।।
एक दिन श्री वचन हुये कि शौच तीन प्रकार का होता है । प्रथम स्नान आदि द्वारा होता है । दूसरा मन की इच्छओ को त्याग कर करने से होता है । तीसरा तमाम जो ईश्वर के अतिरिक्त अन्य विचारों के मन से निकाल देने से होता है ।
भाव कि प्रथम शुद्धि शरीर के स्नान द्वारा होती है । दूसरी मानसिक पवित्रता जो मन को अशुभ विचारों से खाली कर देने से होती है । यह शुद्धि सत्संग श्रवण करने और साधु महात्माओं की सेवा से प्राप्त होती है । तीसरी है आत्मिक शुद्धि यह तब होती है जब चित की गहराई मे इष्टदेव के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का भी विचार न रहने पाये । चाहे व शुभ हो या अशुभ । यह शुद्धि परिपूर्ण सतगुरु की शरण संगति और पवित्र सेवा करने से होती है । सन्त सद्गुरु द्वारा प्रदान शब्द की कमाई करने से चित निर्मल हो जाता है तो घट में प्रकाश होने से समस्त शुभ अशुभ विचार दूर हो जाते है और चित एकाग्र होकर ब्रह्म मे लीन हो जाता है। यह शुद्धि उत्तम श्रेणी की है ।
एक दिन श्री वचन हुये कि कोई ब्रह्माण तेरह वर्ष तक विद्या पढ कर जब बनारस मे वापिस आया को वाद विवाद के विचार से श्री कबीर साहिब के पास गया । कबीर जी ने उस की बड़ी भावभगत की और उसको सूखा सीधा देकर कहा महाराज जी पहले आप भोजन बना कर खा लीजिये । ब्राह्मण जी ने कबीर के चारों ओर घर की तरफ देखा कही ताना लगा है कपड़ा बुना जा रहा है कही मक्खियाँ भिनक रही है । इस लिए नदी के किनारे जा कर एक जगह भोजन बनाया और खाया । सन्तों का काम तो जीव को सन्मार्ग दिखाना होता है । कबीर जी ने वहाँ की जगह खोदकर यहाँ बाह्मण ने खाना बनाया था दिखाई वहाँ से ऊट की हड्डी निकली और ब्राह्मण को दिखाया आप ने इस स्थान को पवित्र समझा था पंड़ित जी अभी आप ने तेरह वर्ष बाहर की शुद्धता और पवित्रता ही पढ़ी है । अब वह विद्या पढ़नी चाहिये जिस से अन्तकरण की मैल साफ हो यानि अन्दर की पवित्रता का ज्ञान हो ज्ञान पुस्तके को पढ़ने से नही होता उस पर अमल करने से होता है अर्थात ज्ञान के भंडार मे प्रभु को नही पाया जा सकता । तू अपने ह्रदय की पुस्तक पढ़ ।इससे उत्तम कोई पुस्तक नही है ।

Saturday, January 30, 2016

जैसा कर्म करेगा बंदे वैसा फल देगा भगवान।


किसी ने क्या ही अच्छा कहा है –
जो करोगे दुनिया में, पाओगे आखिर को वही ।
नेक है नेकी का बदला, बद का बदला है बदी ।।
बीज होगा जैसा, वैसा फल उगेगा खेत मे ।
बोए जौ और मिले गन्दुम (गेहूँ), यही नहीं होगा कभी ।।
            बुद्धिमानों का कहना है कि संसार एक प्रकार का कर्मक्षेत्र है । मनुष्य के जैसे कर्म होंगे, वैसा ही उसका जीवन बनेगा । अपने किये कर्मों का फल अनिवार्य रूप से सब को भुगतान पड़ता है । जौ बोने से जौ की फसल होगी गेहुँ बोने से गेहुँ की । इसी प्रकार मनुष्य द्वारा जैसे कर्म होंगे, वैसा ही उसे फल मिलेगा । इस विषय पर एक प्राचीन कथा है । जो रोचक होने के साथ साथ शिक्षाप्रद भी है ।
जगत – विख्यात हकीम लुकमान के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे अति गरीब परिवार मे उत्पन्न हुए थे । किन्तु इस स्वनाम धन्य विचारक को प्राकृति ने आलौकिक बुद्धि प्रदान की थी। माता पिता बचपन मे ही छोड़कर दुनिया से चले गये थे । प्रत्येक मनुष्य की बुद्धि और उसका मस्तिष्क भी उस के पूर्व कर्मों के अनुसार हुआ करता है । बचपन मे यह बिना माता-पिता का बालक गली कूचों मे भीख माँग कर निर्वाह करता था । उन दिनों में दास प्रथा प्रचलित थी । धनवान और जमींदार लोग गुलामों की मण्डी मे जाकर गुलाम खरीद लेते और जीवन पर्यंत्त पशुओं की तरह काम लेते। लुकमान भी ऐसे ही लोगो के हाथ आ गया। एक सौ दीनार के बदले लुकमान को एक जागीरदार ने खरीद लिया । यह जागीरदार बहुत ही विलासी और निर्दयी व्यक्ति था । उसके पास अनेकों दास थे जिन से डंडे के जोर पर काम लेता था। लेकिन लुकमान को परमात्मा ने उच्चकोटि की सूझ-बूझ भी दी थी । वह बाल्यकाल से ही ईश्वर का उपासक था । तथापि उसे अपने नए मालिक के साथ निर्वाह करना था । थोड़े दिनो मे ही लुकमान ने अपने मालिक पर अपनी बुद्धि का सिक्का बिठा दिया । मालिक ने उसे अपने गुलामों की टोली का सरदार नियुक्त कर दिया । अब लुकमान अपनी टोली से काम लेना था । पर वह बड़ा ही दयालु एवं स्नेह शील था । सब दासों के साथ भाईयों जैसा व्यवहार करता उनके सुख-दुख का ध्यान रखता । अलबत्ता उसके दिमाग मे एक बात सदा गूंजती रहती थी वह यह कि उसे ऐसा अवसर मिले जब वह अपने मालिक को दुष्कर्मों तथा विलासप्रियता से दूर रखने के लिए अच्छा पाठ पढ़ा सके । अन्तत: एक दिन उसे अवसर मिल ही गया । उस दिन मालिक ने लुकमान को बुलाकर कहा कि बीस दासों को लेकर जाओ और अमुक खेत में बढ़िया गेहुँ बो दो । गुलामों को लेकर लुकमान चला गया । संध्या समय जब वह काम से लौटा तो मालिक ने पूछा क्या खेतों मे बीज बो दिया ?  लुकमान ने उत्तर दिया , हाँ मलिक ।
मालिक ने पूछा पर बीज बढ़िया गेहुँ का डाला है ना’ ?
लुकमान बोला नहीं मालिक! हमने खेतो ने बढ़िया जौं बोया है ।
मालिक को आश्चर्य हुआ । वह तानिक गर्म होकर बोला, हम ने तो बढ़िया गेहुँ बोने को कहा था, फिर तुमने जौ क्यों बोया ।
लुकमान ने सरल भाव से उत्तर दिया, हे मालिक ! इससे क्या अन्तर पड़ता है । फसल काटने के समय हम लोग जौ के स्थान पर गेहुँ की फसल काटेंगे। मालिक का आश्चर्य और बढ़ा । आश्चर्यपूर्ण मुद्रा मे उसने कहा, परन्तु तुम तो कह रहे हो कि खेत मे जौ बोया गया है ।
लुकमान पूर्ववत गम्भीर था । उसने उत्तर दिया, हाँ मालिक । बोया तो हमने जौ ही है , किन्तु फसल तो हम गेहुँ की ही काटेंगे । इस पर जमीदार के नेत्र रोब से लाल हो गये आग उगलता वह बोला, मूर्ख ! जब बीज ही जौ का बोया है, तो फसल गेहुँ की कैसे हो सकती है? मालिक के रोब की तनिक भी परवाह न करते हुए निर्भीकता पूर्ण उत्तर दिया, सरकार ! हम लोग जौ के बीज से गेहुँ का फसल उसी प्रकार काटेंगे , जैसे कि आप रात दिन अन्याय, अत्याचार और विलासता के बीज बोकर भी यह आशा करते है कि परलोक मे सुख मिलगा ।
यह गूढ़ तथा बुद्धिमता पूर्ण उत्तर ने मालिक को निरूत्तर कर दिया । उस के नेत्रो पर बँधी हुई गफ़लत एवं अज्ञान की पट्टी खुल गई । जो जो उसने पाप किये थे सब के चित्र उस की आँखों मे घूमने लगे। एक समय आता है जब मनुष्य के अपने ही बुराई के विचार भूत बन कर उसे भयभीत करने लगते है । वही समय लुकमान के मालिक का भी आ गया । क्यों कि अब उसे विश्वास हो गया कि मै भी अन्त मे वही काटूँगा, जो बो रहा हूँ। इस विचार के आते ही उसकी दशा बदल गई । मालिक रोता हुआ लुकमान के पैरों पर गिर पड़ा । और नम्रता पूर्वक बोला । मै नही जानता था आप इतने बुद्धिमान व प्रभु भगत है । अज्ञान वश ही मै आपसे दासों का काम लेता रहा । परन्तु अब मै आप की बड़ाई को जान गया हूँ । आपने मुझे घोर गर्त मे गिरने से बचा लिया है ।
उस दिन के बाद लुकमान के मालिक की काया पलट गई । शनै:  शनै: वह बुरे स्वभाव को त्याग कर धर्मात्मा सत्य प्रिय एवं ईश्वर भक्त बन गया । कहने का अभिप्राय यह कि हमारे जीवन का भला अथवा बुरा परिणाम मात्र हमारे जीवन अपने विचारों व कर्मो पर निर्भर है । विचार ही हमारे जीवन को संवारते है और विचार ही बिगाड़ते है
हम जिस प्रकार के विचारों के बीज इस जन्म मे बोते है आगामी जीवन मे काटते है । जैसे कर्म होंगे उन का फल भोगने के लिए वैसी ही योनि मे जन्म लेना पड़ता है । इस प्रकार यह क्रम , यह आवागमन का चक्र चलता रहता है । इस चक्र से छुटकारा पा सकना जीवात्मा के लिए कठिन होता है
यही कारण है कि सन्तों के सत्संग मे यह शिक्षा बार बार दी जाती है । कि अपने मन वचन एवं कर्म को सदैव निर्मल बनाए रखो । क्योंकि निर्मल विचार होंगे तो अच्छे कर्म होंगे । जिस प्रकार मकान बनाने के लिए जैसा मसाला प्रयोग होगा मकान तो वैसा ही बनेगा । अतएव परमार्थ के तलबगार को सदा अपने विचारों को निर्मल बनाने की और पूरा ध्यान देने की आवश्यकता है । हमारा मन हमारे विचार तब ही निर्मल बन सकते है जब हम महापुरुषों की चरण-शरण मे जाकर तन से निष्काम सेवा मन को सुमिरण में लागाये और अपनी मनमुखता को छोड़कर गुरुमत धारण करेंगे । सतगुरु की प्रसन्नता पाकर हमारा जनम – मरण कट जायेगा ।

Friday, January 29, 2016

जीवन परिवर्तन शील है

 जीवन सतत परिवर्तन है, सतत बदलाहट है कुछ भी स्थायी नहीं है कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है ये बुनियादी सत्य है।जीवन तो प्रवाह है। जब तुम किसी परिवर्तनशील चीज़ से आसक्त हो तो उसके जाने पर तुम्हारा दुःख में पड़ना अनिवार्य है। क्योंकि वह सुख तो जाने वाला है। जीवन विरोधों से बना है। श्वास भीतर आता है स्वास बाहर जाता है। इन विरोधों के बीच, उनके कारण ही तुम जीवित हो। वैसे ही दुख है और सुख है। सुख आने वाली श्वास की भाँति है दुःख जाने वाली श्वास की भाँति है। इसलिये जीवन में सुख के क्षण भी आयेंगे दुःख के क्षण भी आयेंगे और दोनों को अंगीकार करना है। यह नहीं कह सकते कि मैं श्वासं लूंगा लेकिन छोड़ूंगा नहीं। मैं उसे बाहर नहीं जाने दूंगा। तो जीवित रहना असम्भव है। (नाव चलाने के लिये दोनों चप्पू कीआवश्यकता है।) इसलिये विवेकी पुरुष ज्ञानवान, गुरुमुख, दोनों की परिस्थितियों में समान रहता है। वह सुख पाकर इतराता नहीं, और दुःख पाकर घबराता नहीं। क्योंकि वह जानता है कि दोनों ही परिस्थितियां सदैव रहने वाली नहीं हैं। सदा न सुख रहता है ना ही दुःख रहता है। (दृष्टान्त एक नगर सेठ--) कारागार में टूट चुके सेठ में नई शक्ति का संचार किया। अन्त वह फिर समान्य जीवन व्यतीत करने लगा। ऐसे ही कठिन समय में हमें सोचना चाहिये कि जो भी विपरीत परिस्थितियां चल रही हैं या जिन कठिनाईयों के दौर से हम गुज़र रहे हैं ये हमेशा नहीं रहेंगी। दिन-रात की भाँति सुख-दुःख का चक्र हर व्यक्ति के जीवन में आता रहता है चाहे वह कितना ही धनवान है या दो जून की रोटी को तरसता गरीब।  इसलिये न तो सुख को पाकर इतराएं और ना ही दुःख को पाकर घबरायें।

Wednesday, January 27, 2016

सच्चा सुख


संसार में जीवन व्यतीत करते हुये हर व्यक्ति की हार्दिक कामना या दिली ख्वाहिश क्या होती है? उसके लिये सतपुरुषअपनी वाणी में वर्णन करते हैं:-
  है ख्वाहिश हर इन्सान के दिल में मिले खुशी  आनन्द  अपार हरदम।
  पड़े  कभी  न दुःख की  छाँव काली रहें दूर  सब गम अज़ार हरदम।
  कहें सन्त  सुख  की चाह  अच्छी बेशक  रखो ऊँचे  विचार  हरदम।
  मगर सुख केसाधन भी करना है वाज़िब पूर्ण पूरुष कहें बारबार हरदम।
  बिना मालिक की भजन बन्दगी के रहे आत्मा दुःखीऔर खुआर हरदम।
  मिले सुख कैसे  मिटें दुःख क्योंकर जब तक न सिमरे करतार हरदम।।
संसार के हर एक व्यक्ति की ये कामना या ख्वाहिश हुआ करती है कि मुझे हमेशा खुशी और आनन्द प्राप्त हो मेरा जीवन सुख और शान्ति से व्यतीत हो मेरे जीवन पर कभी भी दुःख की काली छाँव न पड़े मैं हमेशा कल्पनाओं चिन्ताओं व परेशानियों से मुक्त रहूं। शाश्वतआनन्द को प्राप्त करने के लिये दिन रात दौड़ धूप करता है हमेंशा इस बात की तलाश में रहता है कि जीवन में ऐसा क्षण आ जाये विराम आ जाये जिसके बाद कुछ भी पाने को शेष न हो क्योंकि जब तक कुछ भी पाने को शेष है तब तक दुःख चिन्ता कल्पना से छुटकारा पाना असम्भव है।आनन्द उसीअवस्था का नाम है जब कोई व्यक्ति वहाँ पहुँच जाये जहाँ से आगे जाने के लिये कुछ भी शेष न रहे तनाव न रहे। सन्त महापुरुष कहते हैं कि खुशी और आनन्द की चाह रखना अच्छा है बुरा नहीं। शाश्वत आनन्द को प्राप्त करना जीव का जन्म सिद्ध अधिकार है बल्कि ऐसा कहना चाहिये कि जीवन काअसली मकसद उस सच्ची खुशी और शाश्वत आनन्द को प्राप्त करना ही है। लेकिन उसके लिये ये वाज़िब है,ये भी ज़रूरी है कि जीव उन्हीं साधनों को अपनाये जिनसे सच्ची खुशी और आनन्द प्राप्त हो सके।आम संसारी जीवों की हालत की ओर देखें तो मालूम होता है कि कई प्रकार के यत्न और पुरुषार्थ करने पर भी जीव को आनन्द प्राप्त नहीं हुआ अगर प्राप्त हो गया होता तो सभी भागदौड़ समाप्त हो गई होती। उल्टा जीव को दुःख ही दुःख प्राप्त हुआ है।
             यत्न बहुत सुख के किये दुःख का किया न कोय।
             तुलसी यह आश्चर्य है अधिक अधिक दुःख होय।।
    जीव अपनी बुद्धि अनुसार जन्म जन्मान्तरों से खुशी प्राप्त करने के लिये हज़ारो तरह के यत्न और उपाय करता रहा है आनन्द मिलना तो दूर उल्टा अधिकाधिक दुःखों का शिकार हुआ है। उसे दुःख ही प्राप्त हुआ है।कारण क्या है इतना परिश्रम करने पर भी आनन्द प्राप्त नहीं होता? इसका सीधा सा उत्तर है कि जिन साधनों से जीव को खुशी प्राप्त हो सकती थी उन साधनों के तो उसने अपनाया नहीं और दूसरे दूसरे ही उपाय करता रहा है। क्योंकि जिस किसी कार्य को सिद्धकरना हो उसके लिये ये ज़रूरी हो जाता है कि उसी कार्य से सम्बन्धित सामग्री और साधन जुटायें जायें तभी वह कार्य पूर्ण हो सकेगा।जैसे किसी को भूख लगी हो तो उस के लिये अनाज, फल,दूध और कोई खाद्य पदार्थ  एकत्र करना होगा अगर वह खाने वाले खाद्य पदार्थ एकत्र करने बजाय र्इंटें सिमेन्ट गिट्टीआदि एकत्र करता रहे तो उसकी भूख कैसे मिटेगी अगर किसी को मकान बनाना हो तो वह ईटों गिट्टी सिमेन्ट आदि सामग्री की बजाय खाद्य पदार्थ एकत्र करता रहे तो कैसे वह मकान बना पायेगा। इसलिये ऐसा ही लगता है कि जीव को अगर कई जन्मों से प्रयत्न करने पर भी आनन्द प्राप्त नहीं हुआ तो ज़रूर कहीं भूल हो रही है।

Monday, January 25, 2016

मृत्यु में प्रेवशः मृत्यु के सिवाय सब-कुछ अनिश्चित है


शिव ने कहाः-अपने शरीर के पंजों से ऊपर उठती हुई अग्नि पर अपने होश को केंद्रित करो जब तक कि शरीर जलकर राख न हो जाए, लेकिन तुम नहीं।
     बुद्ध को यह विधि बहुत प्रीतिकर थी। उन्होने अपने शिष्यों को इस विधि में दीक्षित किया। जब भी कोई व्यक्ति बुद्ध द्वारा दीक्षित होता, तो पहली बात यही होती थी। वे उसे कहते कि श्मशान जाकर किसी जलते हुए शरीर को, जलती हुई लाश को देखो। तीन महीने तक उसे कुछ भी नहीं करना होता। बस वहां बैठना और देखना होता। बुद्ध कहते, उसके विषय में विचार मत करना, उसे बस देखना। और यह कठिन है कि मन में यह विचार न उठे कि देर-सबेर तुम्हारा शरीर भी जला दिया जाएगा। तीन महीना एक लंबा समय है, और साधक को रात-दिन निरंतर जब भी कोई चिता जलती, उस पर ध्यान करना था। देर-सबेर उसे अपना ही शरीर चिता पर दिखाई देने लगता। वह स्वयं को ही जलता हुआ देखने लगता।
     यदि तुम मृत्यु से बहुत भयभीत हो तो इस विधि को तुम नहीं कर सकते, क्योंकि भय ही तुम्हारा बचाव करेगा। तुम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते या तुम सतह पर ही उसकी कल्पना कर सकते हो, लेकिन तुम्हारे गहन प्राण उसमें नहीं होंगे। फिर तुम्हें कुछ भी नहीं घटेगा। स्मरण रखो, तुम भयभीत हो कि नहीं, मृत्यु ही एकमात्र निश्चित घटना है। जीवन में मृत्यु के सिवाय और कुछ भी नहीं है, सब कुछ अनिश्चित है, केवल मृत्यु ही एक निश्चितता है बाकी सब-कुछ सांयोगिक है-हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता-केवल मृत्यु सांयोगिक नहीं है, और मानवीय मन की ओर देखो। हम मृत्यु के संबंध में सदा ऐसे ही बात करते हैं जैसे वह कोई दुर्घटना हो जब भी कोई मरता है तो हम कहते हैं कि उसकी मृत्यु असामयिक थी। जब भी कोई मरता है, हम इस प्रकार बात करने लगते हैं जैसे यह कोई दुर्घटना नहीं है, बाकी सब घटनावश है। मृत्यु पूर्णतः निश्चित है। तुम्हें मरना ही है।
     और जब मैं कहता हूं कि तुम्हें मरना है,, तो लगता है मृत्यु भविष्य में, कहीं बहुत दूर है। ऐसा नहीं है-तुम मर ही चुके हो, जिस क्षण तुम पैदा हुए, तुम मरने लगे थे। जन्म के साथ ही मृत्यु एक निर्धारित घटना नहीं हो गई। उसका एक भाग-जन्म-तो घट ही गया, अब केवल दूसरे भाग का घटना रह गया है। तो तुम पहले ही मर चुके, आधे मर चुके, क्योंकि एक बार व्यक्ति पैदा हो गया, तो वह मृत्यु के घेरे में आ गया, प्रवेश कर गया। अब कुछ भी उसे बदल नहीं सकता। अब उसके बदलने का कोई उपाय नहीं है। तुम उसमें प्रवेश कर चुके। जन्म के साथ ही तुम आधे मर गये। दूसरे; मृत्यु अंत में नहीं होने वाली, वह पहले ही हो चुकी है। वह एक प्रक्रिया है। जिस प्रकार जीवन एक प्रक्रिया है, मृत्यु भी एक प्रक्रिया है। हम द्वैत पैदा करते हैं-लेकिन जीवन और मृत्यु तुम्हारे दो पैरों की तरह, जीवन और मृत्यु दोनों एक ही प्रक्रिया हैं। तुम हर क्षण मर रहे हो, यह मैं इस तरह कहूं, जब भी तुम श्वास भीतर लेते हो, तो वह जीवन है, और जब भी तुम श्वास छोड़ते हो, तो वह मृत्यु है। पहला काम जो बच्चा करता है, वह है श्वास भीतर लेना, बच्चा श्वास बाहर नहीं छोड़ सकता। क्योंकि उसकी छाती में हवा नहीं है; उसे श्वास भीतर लेनी होगी, पहला काम है श्वास भीतर लेना, और वृद्ध व्यक्ति मरते समय जो अंतिम काम करेगा, वह है श्वास बाहर छोड़ना मरते समय तुम भीतर नहीं ले सकते। जब तुम मर रहे हो, तुम श्वास भीतर ले नहीं सकते। अंतिम कृत्य श्वास भीतर लेना नहीं हो सकता। अंतिम कृत्य श्वास का बाहर छोड़ना होगा। पहला कृत्य श्वास लेना है, और अंतिम कृत्य श्वास छोड़ना है, श्वास भीतर लेना जन्म है और श्वास बाहर छोड़ना मृत्यु है, लेकिन हर क्षण तुम दोनों ही कार्य कर रहे हो-स्वास लेना भी और छोड़ना भी। श्वास लेना जीवन है, श्वास छोड़ना मृत्यु है। शायद तुमने देखा नहीं, पर इसे देखने का प्रयास करो। जब भी तुुम श्वास छोड़ते हो, तुम अधिकशांत होते हो, गहरी श्वास छोड़ो, और तुम भीतर एक विशेष शांति का अनुभव करोगे। जब भी तुम स्वास लेते हो, तुम सघन हो जाते हो, तन जाते हो। श्वास लेने की सघनता ही एक तनाव निर्मित कर देती है और सामान्यतः साधारणतः श्वास लेने पर ही जोर दिया जाता है, यदि मैं तुम्हें गहरी श्वास के लिए कहूं तोे तुम सदा श्वास लेने से ही शुरु करोगे।

प्रत्येक आती-जाती स्वांस मृत्यु व जीवन

हज़ारवें अंश के लिए श्वास प्रक्रिया ठहर जाती है, एक श्वास भीतर आती है, फिर एक बिंदु है जहां श्वास ठहर जाती है, फिर श्वास बाहर आती है। जब श्वास बाहर जा चुकती है तो फिर वहां एक क्षण के लिए, या क्षणांश के लिए ठहर जाती है, फिर श्वास भीतर आती है, स्वास के भीतर या बाहर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण है जब तुम श्वास नहीं लेते। उसी क्षण में ध्यान की घटना संभव है, क्योंकि जब तुम श्वास नहीं लेते तो संसार में नहीं होते, इसे समझो, जब तुम श्वास नहीं ले रहे तो मृत हो, तुम हो तो, लेकिन मृत। लेकिन यह क्षण इतना छोटा है कि तुम उसे कभी देख नहीं पाते। भीतर आती श्वास एक नया जन्म है; बाहर जाती श्वास मृत्यु है। बाहर जाती श्वास मृत्यु की पर्याय है। भीतर आती स्वास जीवन की। तो हर श्वास के साथ तुम मरते और पुनर्जीवित होते हो दोनों के बीच का अंतराल बहुत छोटा है, परंतु तीक्ष्ण तथा निष्ठापूर्ण अवलोकन और सजगता से तुम उस अंतराल को अनुभव कर पाओगे। फिर कुछ और नहीं चाहिए। तुम धन्य हुए। तुमने जान लिया; घटना घट गई। तुम्हें श्वास को प्रशिक्षित नहीं करना है। उसे जैसी है वैसी छोड़ दो। इतनी सरल विधि क्यों? यह बहुत सरल लगती है।

Saturday, January 23, 2016

उज्जल पहिरे कापड़े....

  सांसारिक सम्बन्धी अपना-अपना प्यार एवं सहानुभूति जतलाते हुये साफ-सुथरे और चमकीले वस्त्र तो पहनाते हैं, शारीरिक शुद्धता और पवित्रता के साधन भी उपलब्ध कर देते हैं, परन्तु शारीरिक पवित्रता और सुन्दर वस्त्रों के पहनने से दुःख और कष्टों के आधार का अन्त नहीं होता, क्योंकि आत्मा पर मोह-माया और ममता के दाग़-धब्बों की जो मैल चढ़ी हुई है जब तक वह मैल दूर न होगी,दुःखों का अन्त होना असम्भव है। सत्पुरुषों ने स्पष्ट फरमाया हैः-
                उज्जल  पहिरे  कापड़े ,  पान  सुपारी  खाहिं ।
                सो इक गुरु की भक्ति बिनु, बाँधे जमपुर जाहिं।।
     नाम की कमाई किये बिना आत्मिक पवित्रता प्राप्त नहीं होती। जब तक आत्मा पवित्र निर्मल न होगी, वह कुल मालिक से मिल नहीं सकती अर्थात् आत्मा-परमात्मा का मेल नहीं हो सकता। परमात्मा में मिलकर एक हुये बिना जीवात्मा चौरासी के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता और जीव के दुःखों की निवृत्ति नहीं हो सकती। यदि गुरु की भक्ति और नाम की कमाई करने से मन निर्मल हो जाये तो जीवात्मा को वह आनन्द प्राप्त होता है जिसका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि मालिक स्वयं उसके पीछे-पीछे फिरते हैंः-
                कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु।
                पाछे लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर।।
     कितनी ऊंची दात है सद्गुरुदेव जी की; जिनके बख़्शे हुये नाम के प्रताप से अर्थात् गुरु-शब्द के प्रताप से जब गुरुमुख सेवक का मन निर्मल हो जाता है तो स्वयं मालिक उसकी रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेते हैं। विचार करने की बात है कि जिसका रखवाला और रक्षक स्वयं कुल मालिक हो, उसको कैसा भय अथवा कैसा अभाव? वह तो महाराजा हो गया। सन्त सद्गुरु बिना स्वार्थ ऐसा उपकार करते हैं। सेवक के साथ सद्गुरु के प्यार का कितना सच्चा प्रमाण है। उसे कुछ से कुछ बना देते हैं।
                साध संगि मलु लाथी। पारब्राहृु भइओ साथी।।
सन्त सद्गुरु की नेक और पवित्र संगति की कृपा से जब मनुष्य का मन और चित्त अर्थात् अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तब परब्राहृ परमेश्वर अर्थात् कुल मालिक उसके संगी-साथी बन जाते हैं।
     भाई गुरुदास जी श्रेष्ठ सेवकों में से थे। जब श्रीगुरुमहाराज जी ने उनकी सुरति में अर्थात् अन्तःकरण में थोड़ा सा अहंकार का धब्बा देखा तो उसके धोने का तत्काल ही प्रबन्ध किया। यद्यपि उन्हें घोड़ों की आवश्यकता थी या नहीं थी, परन्तु उनकी सुरति की पवित्रता के लिये घोड़े खरीदने की रचना रचाई। "सूरजप्रकाश' नाम के ग्रन्थ में यह पूर्ण इतिहास लिखा हुआ है। भाई गुरुदास जी की सुरति को पवित्र निर्मल करने के लिये घोड़े खरी़द करने की रचना पर लाखों रुपये व्यय कर दिये। अन्त में भाई गुरुदास जी के मन का अभिमान चकनाचूर हो गया तो उन्होंने सद्गुरु देव जी के चरणों में गिर कर क्षमा मांगी और भविष्य में दीनभाव अपनाया।

Thursday, January 21, 2016

जीवन स्वपन वत

एक भिखारी जो दर दर की भीख माँगने वाला सपने में अगर राजा भी हो जाये और सपने में प्राप्त सुख वैभव को देख कर प्रसन्न होता रहे या कोई राजा सपने में हाथ में भिक्षा पात्र लिये दर दर की भीख माँगता हुआ दुःखी हो रहा हो लेकिन दोनों के नींद से जाग जाने पर कोई अन्तर नहीं पड़ता भिखारी भिखारी ही रहता है राजा राजा ही रहता है उन्हें कुछ भी हानि लाभ नहीं होता है। एक गरीब व्यक्ति सपने में अमीर हो गया और सपने में ही अपनी कार बेचना चाहता है उस कार का मोल भाव करने लगा खरीदार कह रहा है कि में इसके एक लाख दृूँगा लेकिन वह कहता है कि डेढ़ लाख लूँगा इसी तकरार में उसकी नींद खुल जाती है देखता है,न कार है,न खरीदार,न लाख है न डेढ़ लाख। उसने सोचा मैंने बड़ी गल्ती की लाख मिल ही रहा था वह भी गया। दोबारा आँखें बन्द करके कहता है ला एक लाख ही दे दे। न उसे एक लाख ही मिलना है न दो लाख क्योंकि ये तो सपना है। महापुरुष फरमाते हैं कि जो रचना देखने में आती है ये सब सपना है।
     मोह निशा जग सोवन हारा। देखहिं स्वपन विविध प्रकारा।।
ये सारा संसार ही मोह की नींद में सो रहा है और विभिन्न प्रकार के स्वपन देख रहा है कोई मान प्रतिष्ठा प्राप्त करने के,कोई सुख ऐश्वर्य के स्वपन देख रहा है कोई धनी बनने के  स्वपन देख रहा है कोई राज्य पदवी को प्राप्त करने के स्वपन देख रहा है। महापुरुष फरमाते हैं कि चाहे कोई झुग्गी झोंपड़ी में रह रहा है या भव्य महलों में, चाहे कोई पैसे पैसे के लिये तरस रहा है या किसी ने धन केअम्बार लगा रखे हों। चाहे कोई कर्ज़दार बना हुआ है या साहूकार बना हुआ है। हैं ये सब सपने के दृश्य ही। रोज़ाना जो हम नींद करते हैं ये ज़रा सपना छोटा है पाँच छः घन्टे का है आठ नौ घन्टे का है और जो जीवन का सपना है ज़रा लम्बा है पचास साठ वर्ष,अस्सी नब्बे वर्ष का है फर्क इतना ही है बस। हैं दोनों सपने ही। असत्य हैं क्योंकि रोज़ाना की नींद में व्यक्ति जब स्वपन की रचना को देख रहा होता है प्रसन्न या अप्रसन्न हो रहा होता है उस समय ये रचना उसे सत्य प्रतीत होती है और संसार की तरफ से बेखबर होने के कारण दुनियाँ का उसके लिये कोई अस्तित्व नहीं होता वह उसके लिये असत्य होती है और जब इस नींद से जाग कर इन बाहरी नेत्रों से संसार के दृश्य देख रहा है और संसार के कार्य व्यवहार में लग जाता है तो सपने की रचना उसके लिये असत्य हो जाती है लेकिन अन्दर के नेत्र बन्द होने के कारण ये संसार के दृश्य भी सपने ही हैं। जीव के पिछले जन्म जो बीत गये हैं क्या वो सपना नही हो गये? इस जन्म के जो वर्ष बीत चुके हैं क्या वो सपना नहीं हो गया? कल जो बीत गया आज वो सपना हो गया है आज जो बीत जायेगा कल सपना हो जायेगा। इसी तरह ये सारे जीवन की कार्यवाही सपना हो जाती है। कहाँ हैं वे मित्र जो पिछले जन्म में थे? कहाँ हैं वे मकान? कहाँ हैं वे बच्चे, परिवार? कहां गई वो
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दुनियाँ जो पिछले जन्म में थी? कहाँ गया वह सब, जिसको हमने इतना सत्य मान रखा था कि वह है? कहाँ गर्इं वे चिन्ताएँ जिनके लिए हम रात भर सोए नहीं थे? कहां गये वे सुख जिनके लिये हमने आकाँक्षायें की थीं? कहां गया वह सब जिसके लिए हम दुःखी, पीड़ित, परेशान हुए थे? अगर पिछला जन्म याद आ जाये और सत्तर वर्ष आप जिए हों, तो उन सत्तर वर्षों में जो देखा गया था वह एक सपना मालूम पड़ेगा या सत्य? एक सपना ही मालूम पड़ेगा, आया और गया।

प्रभु से मिलाप कैसे हो?

एक जिज्ञासु महापुरुषों से प्रश्न करता है। मन के साथ प्रभु का क्या सम्बन्ध है और उनका परस्पर मिलाप कैसे होता है?
महापुरुष फ़रमाते हैं कि इस बात में तो कोई शंका ही नहीं रही कि आत्मा का दर्शन इन चर्म नेत्रों से कदापि नहीं हो हो सकता। क्योंकि जो वस्तु चर्म आँखों से नजर आती हैं वह संसारिक पदार्थों की तरह नाशवान है। दिमाग संसारिक विचार वाली वृति है और दिल परमार्थिक विचार वाली वृति है। दिमाग चतुराई की ओर ले जाता है और अपनी योग्यता के चमत्कार दिखा दिखाकर अहंकार दृढ़ करता है। परन्तु दिल प्रेम अनुभव का घर है। भक्ति इसी के अन्दर उत्पन्न होती है। इसलिए परमार्थ से दिल अधिक उत्पन्न होती है। इसलिए परमार्थ में दिल अधिक आवश्यक है, दिमाग प्रकाश का कारण है। परन्तु दिल के अन्दर आत्मिक बल उत्पन्न होता है । यहाँ अकल और प्रेम के झगड़े का शेयर वर्णन है –
अकल कहे सिआना हो, प्रेम कहे दीवना हो ।
अकल कहे कुछ महल पवाईये, प्रेम कहे सब खाक रुलाइये ।।
प्रेम सच्ची प्रीति का नाम है और मोह से बिल्कुल भिन्न है क्योंकि प्रेम में संसारी बंधन नहीं। इसलिए हे जिज्ञासु परमार्थ के लिए हमारा सम्बन्ध अधिकतर दिल से है और दिल भी वह जो शुद्ध निर्मल भाव को प्राप्त हो चुका हो। जैसे लोहे के ऊपर से मिट्टी आदि उतर चुकी है तो चुम्बक उसे शीघ्र खींच लेगा। जब तक मिट्टी लोहे के चारों ओर लिपटी हुई है तो समीप होने पर भी चुम्बक नहीं खींच सकता। ऐसे ही जब दिल शुद्ध हो जायेगा तो दिलवर उसे शीघ्र खेंच लेगा। यदि प्रभु हमारा दिलवर है तो वह हमारी तरफ जरुर आकर्षित होगा। अगर दिल संसार के संबन्धों की ओर तो प्रभु कैसे मिल सकते है। दृढ़ माया में जकड़ा हुआ दिल कैसे परमार्थ की प्राप्ति करेगा। जो दिल में अपने शरीर की चिन्ता संबन्धों का प्रेम रुपये का लोभ और स्वर्गदिक की इच्छा कैद हो वह प्रियतम के मिलाप के लिए कभी पग नही उठा सकता। इन माया के जंजीरों से मुक्त होकर नाम से चित जोड़ कर आत्मा में तदाकार करना ही पग उठाना है। चौबीस घंटे दिल मायिक पदार्थों का ध्यान है और फिर इच्छा करता है कि परमात्मा की प्राप्ति हो जिस प्रकार एक 20 किलो मिर्चा के अन्दर अगर एक छटाँक चीनी डालने से मिर्च का कड़वा पन नही जा सकता। सारा दिन संसारी कामों में रहकर घड़ी आधी घड़ी भजन करने से परमात्मा के दर्शन असम्भव है। हाँ हर कर्म करते हर पल चित में उसकी याद बनी रहे तो वो प्रभु हमारे अंग संग है। इसलिए उत्तम विचारों का बारम्बर अभ्यास करके दिल बलवान बनाना है। निष्काम कर्मों से इसे शुद्ध बनाना है और माया के बन्धन से मुक्त करना है। फिर प्रभु मिलाप में जरा देरी नही। याद रखो प्रियतम की खोज में इधर उधर न भटको, वह तुम्हारे अति समीप है, केवल दिल को शुद्ध करो। परमात्मा का नाम दिलवर है अर्थात वह स्वंय दिल को अपनी ओर खेंच लेता है।

Wednesday, January 20, 2016

पाप का मूल कारण




प्रमाण के तौर पर जब एक मनुष्य दफ्तर में काम करता है तथा परिणाम यदि उसके हक में न हो तो वह कहता है कि  इस कामका उत्तरदायी ईश्वर है। इसीप्रकार जब वह मनुष्य दफ्तर में अच्छा काम करता है या अगर अच्छा काम होता है तो मनुष्य बढ़चढ़ कर कहता है कि मैने किया है और बुरे कर्मों का कर्ता ईश्वर को बनाता है। यही मनुष्य की मूर्खता है। प्रमाण के तौर पर एक कमरे में लैम्प रखा है। लैम्प की रोशनी पूरे कमरे में फैली है। उस प्रकाश में चाहे तो व्यक्ति अच्छी किताबे पड़े या अच्छा काम करे अथवा बुरी किताबें पढ़े या बुरा काम करें यह तो जीव की अपनी बुद्धि पर निर्भर है। लैम्प की रोशनी असंग है। मनुष्य उस रोशनी में जैसा काम करेगा वैसा ही फल पायेगा। ऐसे ही ईश्वर सत्ता देने वाला है जो पुरुष उस सत्ता को पाकर अच्छे कर्म करेंगे वे अच्छा फल पायेंगे तथा जो बुरे कर्म करेंगे बुरा फल पायेंगे । हाँ यह बात और है कि मृत्युलोक में आकर ईश्वर को भूलकर काल माया के चक्कर में पड़ जाता है। लेकिन ईश्वर का एक दूसरा रूप है साकार रूप-संतो का रूप। जब जीव यह निर्णय नहीं कर पाता कौन सा कर्म अच्छा है कौन सा बुरा तो जो जीव संत सतगुरु की शरण में आ जाते हैं सतगुरु उसको उसके अन्दर छुपे धन का ज्ञान करवाते हैं, आत्मा परमात्मा का विचार देते है। वो प्रेमी साधक अपनी मंजिल आसानी से ढूंढ़ लेते हैं। लेकिन अज्ञानी मनुष्य कर्म तो आप करता है अपनी वासनाओं को पूरा करने के लिए और दोष ईश्वर को देता है। पाप का मूल कारण भोगों के भोगने की इच्छा है यह इच्छा ही पापों का मूलकारण हैं। इसलिए पापों से बचने के लिए संसारिक विषय भोग की इच्छा को अन्तःकरण में स्थान नही देना चाहिए।