सच्ची खुशी
संसार में अगर किसी से पूछा जाये कि तुम्हें सबसे अधिक ख्वाहिश किस चीज़ की है तो वह कहेगा मुझेअपार धन चाहिए, कोई कहेगा कि मेरी संसार में खूब मानइज़्ज़त हो,कोई कहेगा कि मेरे पास सब तरह के ऐशो इशरत के सामान हों, किसी को अपने शरीर के तन्दरूस्त,सुन्दर व निरोग होने की ख्वाहिश होगी और कोई ये भी कहेगा कि मुझे ईश्वर या परमात्मा की तलाश है। अब अगर इनसे पूछा जाये कि तुम्हें धन दौलत चाहिए तो किसलिये? मान और इज़्ज़त प्राप्त करने की ख्वाहिश है तो किसलिये? ऐशो इशरत के सामानों की इच्छा और शरीर के सुन्दर और निरोग होने की चाहना है तो क्योंकर? और अगर प्रभु को पाने की दिल में तमन्ना है तो आखिर क्यों? बहुत से व्यक्तियों से तो इसका जवाब शायद ही बन पाये। लेकिन इसका जवाब है, वो जवाब है खुशी। इन्सान अगर धन दौलत चाहता है तो खुशी के लिये,जायदाद मकान बनाता है तो खुशी को लिये,मान सम्मान चाहता है तो खुशी के लिये,ऐशो इशरत के सामानों की खाहिश है तो खुशी के लिये, अगर इन्सान भक्ति भी करता है तो खुशी के लिये। गौर करने से मालूम होता है दुनियां में खुशी से बढ़कर कोई भी चीज़ नहीं है।धन दौलत हो खुशी न हो तो कुछ भी नहीं, मान इज़्ज़त हो शरीर तन्दरुस्त और सुन्दर हो,ऐशो इशरत के सब सामान मौजूद हों सब कुछ हो पर खुशी न हो तो कुछ भी नहीं मिला। मान लो, अगर किसी को परमात्मा भी मिल जाये पर खुशी न हो तो कुछ भी नहीं मिला।कहने का तात्पर्य ये है कि जीव संसार में जो कुछ भी कार्यव्यवहार करता है,खाना पीना,उठना बैठना, नौकरी, खेती व्यापार आदि धन कमाने के लिये करता हैअर्थात जो भी कार्य करता है केवल खुशी के लिये ही। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक मनुष्य की ज़िन्दगी का मकसद खुशी को हासिल करना है। जाने या अन्जाने में हर इन्सान अपनी अपनी समझ अनुसार खुशी को हासिल करने के लिये प्रयत्नशील है। लेकिन अब ये देखना है कि कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें खुशी नसीब है।
आमतौर पर संसार में दुःख की ही शिकायत हुआ करती है। बड़े बड़े विद्वानों ने, सन्तों महापुरुषों ने, सदग्रन्थों की वाणियों ने इस संसार को दुःखसागर का नाम दिया है। एक भी आदमी ऐसा नहीं है जो इसे वैकुण्ठ सागर या सुखसागर कहता
77
हो। क्योंकि अगर हम संसार की तरफ गौर करके देखें तो मालूम होगा बल्कि हर इन्सान देखता भी है कि सभी को, बीमारी, बुढ़ापा दुर्घटनाओं और मौत के शिकार होने का डर हमेशा सिर पर बना रहता है। कोई बीमारी के हाथों तंग है कोई गरीबी का मारा परेशान है। बड़े बड़े व्यापारी, राजा महाराजा,धनवान सब अपनी अपनी चिन्ताओं की चक्की में पिसे चले जा रहे हैं।जब धनवानों का ये हाल है तो गरीबों की तो बात ही क्या है। हस्पतालों में जाकर देखो कैसे लोग तड़फ रहे हैं। जेलों में सख्त सजाएं हो रही हैं। मतलब क्या कि संसार में धनवान,बलवान प्रतिष्ठावान, किसी से भी पूछा जाये कि क्या उसे खुशी प्राप्त है,क्या वह सुखी है? तो वहअपने दुःखों की कहानी शुरु कर देगा। आप कहेंगे कि उसके पास अपार धन है,कुटुम्ब परिवार है नौकर चाकर हैं उसे और क्या चाहिये उसके पास सब कुछ है वह ज़रूर सुखी होगा। उसे ज़रूर खुशी प्राप्त होगी। उससे पूछने पर आप उसके दिल में भी एक निराशा, चिन्ता उदासी या खिन्नता के भाव ही पायेंगे। सन्त सहजो बाई जी का कथन है-: धनवन्ते सब ही दुःखी निर्धन दुःख का रूप।
फरमाती हैं कि धनवानों और अमीरों को मैने दुःखी और पीड़ा में कराहते हुये पाया है और निर्धन तो दुःख का रूप ही हैं। संसार का प्रत्येक प्राणी संसारिक पदार्थों में खुशी की तलाश करता है लेकिन गौर करने से, विचार करने से ये ही मालूम होता है कि खुशी न दौलत में है,न इज़्ज़त में,ना ही किसी और सांसारिक पदार्थों में खुशी है। किसी पंजाबी सन्त ने कहा है।
विषय वासना विच गल्तान बन्दा दीन दुःखी आजीज़ सुबह शाम रहंदा।
नित लोड़दा सुखां ते खुशियाँ नूं अफसोस मगर नाकाम रंहदा।
सुख मूल नहीं विषयाँ विच दासा ना ही सुख दा नाम निशान हरगिज़।
जिन्हां चीज़ां विच खुशी लभदा तूँ खुशी वाले ऐ नाहीं सामान हरगिज़।
अब प्रश्न होता है कि जब सांसारिक पदार्थों में खुशी नहीं है तो आखिर वह कहाँ से और किस प्रकार प्राप्त हो सकती है। महापुरुष फरमाते हैं कि जीव को सच्चा सुख व सच्ची खुशी तब ही मिल सकती है जब वह अपना रूख परमात्मा की तरफ मोड़े क्योंकि जिस चीज़ का जहाँ भण्डार हो वहीं से मिल सकती है किसी को कपड़ों की आवश्यकता है और वह बर्तनों की या मिठाई की दुकान पर तलाश
78
करे तो उसे कैसे मिल सकते हैं। कपड़े खरीदने के लिये उसे कपड़ों की दुकान पर ही जाना होगा।अगर उसे सोना चाँदी की ज़रूरत है तो वह सुनार की दुकान पर ही उपलब्ध होगा न कि गाजर मूली या सब्ज़ी की दुकान पर।
संसार में अगर किसी से पूछा जाये कि तुम्हें सबसे अधिक ख्वाहिश किस चीज़ की है तो वह कहेगा मुझेअपार धन चाहिए, कोई कहेगा कि मेरी संसार में खूब मानइज़्ज़त हो,कोई कहेगा कि मेरे पास सब तरह के ऐशो इशरत के सामान हों, किसी को अपने शरीर के तन्दरूस्त,सुन्दर व निरोग होने की ख्वाहिश होगी और कोई ये भी कहेगा कि मुझे ईश्वर या परमात्मा की तलाश है। अब अगर इनसे पूछा जाये कि तुम्हें धन दौलत चाहिए तो किसलिये? मान और इज़्ज़त प्राप्त करने की ख्वाहिश है तो किसलिये? ऐशो इशरत के सामानों की इच्छा और शरीर के सुन्दर और निरोग होने की चाहना है तो क्योंकर? और अगर प्रभु को पाने की दिल में तमन्ना है तो आखिर क्यों? बहुत से व्यक्तियों से तो इसका जवाब शायद ही बन पाये। लेकिन इसका जवाब है, वो जवाब है खुशी। इन्सान अगर धन दौलत चाहता है तो खुशी के लिये,जायदाद मकान बनाता है तो खुशी को लिये,मान सम्मान चाहता है तो खुशी के लिये,ऐशो इशरत के सामानों की खाहिश है तो खुशी के लिये, अगर इन्सान भक्ति भी करता है तो खुशी के लिये। गौर करने से मालूम होता है दुनियां में खुशी से बढ़कर कोई भी चीज़ नहीं है।धन दौलत हो खुशी न हो तो कुछ भी नहीं, मान इज़्ज़त हो शरीर तन्दरुस्त और सुन्दर हो,ऐशो इशरत के सब सामान मौजूद हों सब कुछ हो पर खुशी न हो तो कुछ भी नहीं मिला। मान लो, अगर किसी को परमात्मा भी मिल जाये पर खुशी न हो तो कुछ भी नहीं मिला।कहने का तात्पर्य ये है कि जीव संसार में जो कुछ भी कार्यव्यवहार करता है,खाना पीना,उठना बैठना, नौकरी, खेती व्यापार आदि धन कमाने के लिये करता हैअर्थात जो भी कार्य करता है केवल खुशी के लिये ही। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक मनुष्य की ज़िन्दगी का मकसद खुशी को हासिल करना है। जाने या अन्जाने में हर इन्सान अपनी अपनी समझ अनुसार खुशी को हासिल करने के लिये प्रयत्नशील है। लेकिन अब ये देखना है कि कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें खुशी नसीब है।
आमतौर पर संसार में दुःख की ही शिकायत हुआ करती है। बड़े बड़े विद्वानों ने, सन्तों महापुरुषों ने, सदग्रन्थों की वाणियों ने इस संसार को दुःखसागर का नाम दिया है। एक भी आदमी ऐसा नहीं है जो इसे वैकुण्ठ सागर या सुखसागर कहता
77
हो। क्योंकि अगर हम संसार की तरफ गौर करके देखें तो मालूम होगा बल्कि हर इन्सान देखता भी है कि सभी को, बीमारी, बुढ़ापा दुर्घटनाओं और मौत के शिकार होने का डर हमेशा सिर पर बना रहता है। कोई बीमारी के हाथों तंग है कोई गरीबी का मारा परेशान है। बड़े बड़े व्यापारी, राजा महाराजा,धनवान सब अपनी अपनी चिन्ताओं की चक्की में पिसे चले जा रहे हैं।जब धनवानों का ये हाल है तो गरीबों की तो बात ही क्या है। हस्पतालों में जाकर देखो कैसे लोग तड़फ रहे हैं। जेलों में सख्त सजाएं हो रही हैं। मतलब क्या कि संसार में धनवान,बलवान प्रतिष्ठावान, किसी से भी पूछा जाये कि क्या उसे खुशी प्राप्त है,क्या वह सुखी है? तो वहअपने दुःखों की कहानी शुरु कर देगा। आप कहेंगे कि उसके पास अपार धन है,कुटुम्ब परिवार है नौकर चाकर हैं उसे और क्या चाहिये उसके पास सब कुछ है वह ज़रूर सुखी होगा। उसे ज़रूर खुशी प्राप्त होगी। उससे पूछने पर आप उसके दिल में भी एक निराशा, चिन्ता उदासी या खिन्नता के भाव ही पायेंगे। सन्त सहजो बाई जी का कथन है-: धनवन्ते सब ही दुःखी निर्धन दुःख का रूप।
फरमाती हैं कि धनवानों और अमीरों को मैने दुःखी और पीड़ा में कराहते हुये पाया है और निर्धन तो दुःख का रूप ही हैं। संसार का प्रत्येक प्राणी संसारिक पदार्थों में खुशी की तलाश करता है लेकिन गौर करने से, विचार करने से ये ही मालूम होता है कि खुशी न दौलत में है,न इज़्ज़त में,ना ही किसी और सांसारिक पदार्थों में खुशी है। किसी पंजाबी सन्त ने कहा है।
विषय वासना विच गल्तान बन्दा दीन दुःखी आजीज़ सुबह शाम रहंदा।
नित लोड़दा सुखां ते खुशियाँ नूं अफसोस मगर नाकाम रंहदा।
सुख मूल नहीं विषयाँ विच दासा ना ही सुख दा नाम निशान हरगिज़।
जिन्हां चीज़ां विच खुशी लभदा तूँ खुशी वाले ऐ नाहीं सामान हरगिज़।
अब प्रश्न होता है कि जब सांसारिक पदार्थों में खुशी नहीं है तो आखिर वह कहाँ से और किस प्रकार प्राप्त हो सकती है। महापुरुष फरमाते हैं कि जीव को सच्चा सुख व सच्ची खुशी तब ही मिल सकती है जब वह अपना रूख परमात्मा की तरफ मोड़े क्योंकि जिस चीज़ का जहाँ भण्डार हो वहीं से मिल सकती है किसी को कपड़ों की आवश्यकता है और वह बर्तनों की या मिठाई की दुकान पर तलाश
78
करे तो उसे कैसे मिल सकते हैं। कपड़े खरीदने के लिये उसे कपड़ों की दुकान पर ही जाना होगा।अगर उसे सोना चाँदी की ज़रूरत है तो वह सुनार की दुकान पर ही उपलब्ध होगा न कि गाजर मूली या सब्ज़ी की दुकान पर।
No comments:
Post a Comment