मनुष्य के जीवन पर संगति का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है इस पर सन्त रहीम साहब जी के वचन हैंः-
जिन जैसी संगत करी, तैसो ही फल लीन।
कदली सीप भुजंग मुख, स्वांति एक गुण तीन।।
फरमाते हैं किः- स्वांति नक्षत्र का जल तो एक ही होता है, परन्तु तीन भिन्न-भिन्न वस्तुओं के संसर्ग में आने से तीन भिन्न-भिन्न गुण ग्रहण करता है। केले के सम्पर्क में आने पर स्वांति नक्षत्र की बूंद कपूर बनती है, सीप के मुख में पड़ने से मूल्यवान मोती बनती है और सर्प के मुख में पड़ने पर वही बूँद विष बन जाती है। जो जैसी संगत करता है उसे उसी के अनुरुप फल प्राप्त होता है।
कहते भी हैं कि जैसी संगत वैसी रंगत। अर्थात् मनुष्य जिस प्रकार की संगत करता है, वह वैसा ही बन जाता है। जहाँ सुसंगति अर्थात् सन्तों सत्पुरुषों की संगति के प्रभाव से मनुष्य भला और नेक बन कर शुभकर्मों की ओर प्रवृत होता है और भक्ति-परमार्थ के पथ पर चलने लगता है। जिसके फलस्वरुप सच्चे सुख और आनन्द को प्राप्त करता है। दूसरी ओर कुसंगति अथवा बुरी संगति के प्रभाव से मनुष्य बुरे कार्यों की ओर प्रवृत हो जाता है और कुमार्गी और कुकर्मी बन कर नरक की राह चल पड़ता है। जिससे उसका ये जीवन भी दुःख कल्पना और अशान्ति में व्यतीत होता है और परलोक भी बिगड़ जाता है।
शुभ संगति से जो लाभ होता है और कुसंगति से जो हानि होती है, उसका वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कथन करते हैं किः-
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहूँ वेद विदित सब काहू।।
गगन चढ़ई रज पवन प्रंसगा। कीचहिं मिलई नीच जल संगा।।
साधु असाधु सदन सुक सारी। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी।।
धूम कुंसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।।
सोई जल अनल अनिल संधाता। होई जलद जग जीवन दाता।।
ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग। होहिं कुवस्तु सुवस्तु जग, लखहिं सुलच्छन लोग।।
अर्थः-कुसंगति से हानि और सुसंगति से लाभ होता है, यह बात लोक और वेद में प्रसिद्ध है और सभी लोग इस को जानते हैं। पवन का संग पाकर धूल आकाश पर चढ़ जाती है, परन्तु वही धूल नीच(अर्थात् नीचे की ओर बहने वाले) जल की संगति से कीचड़ मे मिल जाती है। साधु पुरुष के घर के तोता-मैना राम-नाम सुमिरते हैं, जबकि असाधु पुरुष के घर के तोता मैना गिन-गिनकर गालियां देते हैं। बुरी संगति के कारण धुआँ कालिख कहलाता है, परन्तु वही धुआँ सुसंगति से सुन्दर स्याही बनकर पुराण आदि सद्शास्त्र लिखने के काम में आता है और वही धुआँ जल, अग्नि तथा पवन के संग से बादल होकर जगत् को जीवन देने वाला बन जाता है, ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र- ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसार में बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं। चतुर एवं विचारवान शील पुरुष ही इस बात को जान पाते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी तोते का प्रमाण देते हुए कथन करते हैं कि साधु पुरुष के घर का तोता शुभ वाणी और असाधु पुरुष के घर का तोता अशुभ वाणी बोलता है, उस विषय में एक कथानक है कि एक राजा अपने साथियों सहित शिकार के लिये वन मे गया। एक स्थान पर एक हरिण देखकर राजा ने घोड़ा उसके पीछे छोड़ दिया। दोपहर हो गई, परन्तु हरिण हाथ न आया और एक जगह घनी झाड़ियों में आँखों से ओझल हो गया। साथियों का दूर दूर तक कहीं पता न था। राजा ने एक तालाब के किनारे वृक्ष की छाया में घोड़ा रोका और कुछ देर वहां सुस्ता कर राजधानी वापिस जाने का विचार किया। मार्ग जब न सूझा तो अनुमान से उसने घोड़ा एक ओर बढ़ाया। कुछ दूर जाने पर उसे एक बस्ती नज़र आई जिसमें तीस-चालीस झोंपड़ियां थीं। वह भीलों की बस्ती थी जो लूट-मार का धन्धा करते थे। राजा अभी बस्ती के निकट ही पहुँचा था कि एक झोंपड़ी के द्वार पर टंगे पिंजरे में बन्द तोता चिल्ला उठा- ""शिकार आ गया। पकड़ लो इसे। मार डालो इसे। सब कुछ छीन लो इसका।''
राजा समझ गया कि यह लुटेरों की बस्ती है। उसने घोड़े को तेज़ी से दौड़ाया। लुटेरे अपनी झोंपड़ियों से जब तक बाहर आते, तब तक राजा काफी दूर निकल गया था। लुटेरे उसे तब तक देखते रहे जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गया। कुछ देर बाद राजा मुनियों के आश्रम पर जा पहुँचा। वहाँ भी एक कुटिया के बाहर एक पिंजरा टंगा हुआ था और उसमें भी एक तोता था। राजा को देखते ही वह बोल उठा-""आइये! आपका स्वागत है। मुनिजनो! अध्र्य लाओ, आसन लाओ, अतिथि द्वार पर आये हैं।'' तोते के ये शब्द सुनकर मुनिजन कुटियाओं से बाहर आ गए। उन्होने राजा का स्वागत-सत्कार किया। राजा ने मुनियों से दोनों ही तोतों के बारे में बताते हुए कहा-एक ही जाति के पक्षियों के स्वभाव में ऐसा अन्तर क्यों?
मुनियों के उत्तर देने से पूर्व ही तोता बोल उठा- ""यह सब संगति का प्रभाव है, अन्यथा वह तोता और मैं दोनों भाई भाई हैं और एक ही माता-पिता की सन्तान हैं।'' इसी का वर्णन एक पंजाबी कवि ने इस प्रकार किया हैः-
तोता लगा कहन बोल के सुन ओ प्यारे भाई। इक पिता दे पुत्त हां दोनों इक्को साडी माई।।
इक्केबन विच चोगा चुगिये दोनों सक्के भाई। इक फंदक ने आन पकड़िया सानूँ लाके फाई।।
उसनूँ वेचिया पास दुष्ट दे मैं संता हथ आया। दुष्ट ने गाली देन सिखाया संतां शुभ पढ़ाया।।
ओह ते सबनूं मंदा बोले हिरदय बहुत दुखावे। मिठे शब्द मैं आखां सबनूँ जो देखे सुख पावे।।
उसदा नहीं दोष है कोई नहीं मेरी वड़ियाई। वैसी वैसी बाणी सिखी जैसी संगत पाई।।
न ही जाती न ही पाँती नहीं और कुछ कारण। जैसी संगत वैसी रंगत कर लौ मन विच धारण।
परमसंत श्री कबीर साहिब जी के वचन हैंः-
सुसंगति से सुख ऊपजे, कुसंगति से दुःख जोय।
कहै कबीर तहाँ जाइये, साधु संग जहाँ होय।।
जैसे अमृत का पान करने से अमरत्व की प्राप्ति होती है, फिर मृत्यु निकट नहीं आती, वैसे ही सन्तों महापुरुषों की शुभ संगति ग्रहण करने से नित्य सुख, शाश्वत आनन्द और परमशान्ति की प्राप्ति होती है। जिसकी तुलना संसार का कोई सुख नहीं कर सकता। फिर-दुःख, अशान्ति, कलह, कलपना निकट भी नहीं आते; न इस लोक में और न ही परलोक में।
जब सन्त महापुरुषों की संगति प्राप्त हो जाये तो जीव को अपने बहुत ही ऊंचे भाग्य समझने चाहियें जैसा कि कथन है। पूरै भागि सतसंगति लहै सतगुरु भेटै जिसु आइ।। अर्थात् जिसके पूर्ण भाग्य हों, संसार में ऐसे मनुष्य का ही सद्गुरु से मिलाप होता है और उसे ऐसी शुभ संगति प्राप्त होती है। और जब ऐसी उत्तम संगति सौभाग्य से प्राप्त हो जाए तो फिर मनुष्य का जीवन संवर जाता है, उसका जीवन सत्यम् शिवम् सुन्दरम् बन जाता है। सत्पुरुषों के वचन हैं किः-सेई सुन्दर सोहणे। साध संगि जिन बैहणे।। अर्थात् वही मनुष्य सुन्दर और शोभनीय है जिसको सत्संगति में बैठक मिली है।
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