सांसारिक सम्बन्धी अपना-अपना प्यार एवं सहानुभूति जतलाते हुये साफ-सुथरे और चमकीले वस्त्र तो पहनाते हैं, शारीरिक शुद्धता और पवित्रता के साधन भी उपलब्ध कर देते हैं, परन्तु शारीरिक पवित्रता और सुन्दर वस्त्रों के पहनने से दुःख और कष्टों के आधार का अन्त नहीं होता, क्योंकि आत्मा पर मोह-माया और ममता के दाग़-धब्बों की जो मैल चढ़ी हुई है जब तक वह मैल दूर न होगी,दुःखों का अन्त होना असम्भव है। सत्पुरुषों ने स्पष्ट फरमाया हैः-
उज्जल पहिरे कापड़े , पान सुपारी खाहिं ।
सो इक गुरु की भक्ति बिनु, बाँधे जमपुर जाहिं।।
नाम की कमाई किये बिना आत्मिक पवित्रता प्राप्त नहीं होती। जब तक आत्मा पवित्र निर्मल न होगी, वह कुल मालिक से मिल नहीं सकती अर्थात् आत्मा-परमात्मा का मेल नहीं हो सकता। परमात्मा में मिलकर एक हुये बिना जीवात्मा चौरासी के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता और जीव के दुःखों की निवृत्ति नहीं हो सकती। यदि गुरु की भक्ति और नाम की कमाई करने से मन निर्मल हो जाये तो जीवात्मा को वह आनन्द प्राप्त होता है जिसका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि मालिक स्वयं उसके पीछे-पीछे फिरते हैंः-
कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु।
पाछे लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर।।
कितनी ऊंची दात है सद्गुरुदेव जी की; जिनके बख़्शे हुये नाम के प्रताप से अर्थात् गुरु-शब्द के प्रताप से जब गुरुमुख सेवक का मन निर्मल हो जाता है तो स्वयं मालिक उसकी रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेते हैं। विचार करने की बात है कि जिसका रखवाला और रक्षक स्वयं कुल मालिक हो, उसको कैसा भय अथवा कैसा अभाव? वह तो महाराजा हो गया। सन्त सद्गुरु बिना स्वार्थ ऐसा उपकार करते हैं। सेवक के साथ सद्गुरु के प्यार का कितना सच्चा प्रमाण है। उसे कुछ से कुछ बना देते हैं।
साध संगि मलु लाथी। पारब्राहृु भइओ साथी।।
सन्त सद्गुरु की नेक और पवित्र संगति की कृपा से जब मनुष्य का मन और चित्त अर्थात् अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तब परब्राहृ परमेश्वर अर्थात् कुल मालिक उसके संगी-साथी बन जाते हैं।
भाई गुरुदास जी श्रेष्ठ सेवकों में से थे। जब श्रीगुरुमहाराज जी ने उनकी सुरति में अर्थात् अन्तःकरण में थोड़ा सा अहंकार का धब्बा देखा तो उसके धोने का तत्काल ही प्रबन्ध किया। यद्यपि उन्हें घोड़ों की आवश्यकता थी या नहीं थी, परन्तु उनकी सुरति की पवित्रता के लिये घोड़े खरीदने की रचना रचाई। "सूरजप्रकाश' नाम के ग्रन्थ में यह पूर्ण इतिहास लिखा हुआ है। भाई गुरुदास जी की सुरति को पवित्र निर्मल करने के लिये घोड़े खरी़द करने की रचना पर लाखों रुपये व्यय कर दिये। अन्त में भाई गुरुदास जी के मन का अभिमान चकनाचूर हो गया तो उन्होंने सद्गुरु देव जी के चरणों में गिर कर क्षमा मांगी और भविष्य में दीनभाव अपनाया।
उज्जल पहिरे कापड़े , पान सुपारी खाहिं ।
सो इक गुरु की भक्ति बिनु, बाँधे जमपुर जाहिं।।
नाम की कमाई किये बिना आत्मिक पवित्रता प्राप्त नहीं होती। जब तक आत्मा पवित्र निर्मल न होगी, वह कुल मालिक से मिल नहीं सकती अर्थात् आत्मा-परमात्मा का मेल नहीं हो सकता। परमात्मा में मिलकर एक हुये बिना जीवात्मा चौरासी के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता और जीव के दुःखों की निवृत्ति नहीं हो सकती। यदि गुरु की भक्ति और नाम की कमाई करने से मन निर्मल हो जाये तो जीवात्मा को वह आनन्द प्राप्त होता है जिसका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि मालिक स्वयं उसके पीछे-पीछे फिरते हैंः-
कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु।
पाछे लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर।।
कितनी ऊंची दात है सद्गुरुदेव जी की; जिनके बख़्शे हुये नाम के प्रताप से अर्थात् गुरु-शब्द के प्रताप से जब गुरुमुख सेवक का मन निर्मल हो जाता है तो स्वयं मालिक उसकी रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेते हैं। विचार करने की बात है कि जिसका रखवाला और रक्षक स्वयं कुल मालिक हो, उसको कैसा भय अथवा कैसा अभाव? वह तो महाराजा हो गया। सन्त सद्गुरु बिना स्वार्थ ऐसा उपकार करते हैं। सेवक के साथ सद्गुरु के प्यार का कितना सच्चा प्रमाण है। उसे कुछ से कुछ बना देते हैं।
साध संगि मलु लाथी। पारब्राहृु भइओ साथी।।
सन्त सद्गुरु की नेक और पवित्र संगति की कृपा से जब मनुष्य का मन और चित्त अर्थात् अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तब परब्राहृ परमेश्वर अर्थात् कुल मालिक उसके संगी-साथी बन जाते हैं।
भाई गुरुदास जी श्रेष्ठ सेवकों में से थे। जब श्रीगुरुमहाराज जी ने उनकी सुरति में अर्थात् अन्तःकरण में थोड़ा सा अहंकार का धब्बा देखा तो उसके धोने का तत्काल ही प्रबन्ध किया। यद्यपि उन्हें घोड़ों की आवश्यकता थी या नहीं थी, परन्तु उनकी सुरति की पवित्रता के लिये घोड़े खरीदने की रचना रचाई। "सूरजप्रकाश' नाम के ग्रन्थ में यह पूर्ण इतिहास लिखा हुआ है। भाई गुरुदास जी की सुरति को पवित्र निर्मल करने के लिये घोड़े खरी़द करने की रचना पर लाखों रुपये व्यय कर दिये। अन्त में भाई गुरुदास जी के मन का अभिमान चकनाचूर हो गया तो उन्होंने सद्गुरु देव जी के चरणों में गिर कर क्षमा मांगी और भविष्य में दीनभाव अपनाया।
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