Friday, January 8, 2016

13.01.2016

महापुरुषों के वचन हैंः- लाखों सिर तू दे चुका यमराजा की भेंट।
                     एक सीस अब खुशी से कर सतगुरु की भेंट।।
खुशी और शाश्वत आनन्द को प्राप्त करने के लिये तूने लाखों शरीर यमराज के अर्पित कर दिये हैं और अब तक तुझे सच्ची खुशी और आनन्द प्राप्त नहीं हुआ, दुःख और अशान्ति ही नसीब हुई है। अब भी अगर तू अपना ये जीवन सतगुरु के अर्पण कर दे, खुशी से भेंट कर दे तो तू निश्चय ही सच्ची खुशी और आनन्द को प्राप्त कर सकता है। इस जीवन के पहले जीव ने लाखों ही शरीर धारण किये हैं जो यमराज के अर्पण करता रहा है। सदग्रन्थ और सदशास्त्रों की वाणियाँ इस बात की साक्षी देती हैं जैसे गुरुवाणी का वाक हैः-
कई जन्म भये कीट पतंगा। कई जन्म गज मीन कुरंगा।।
कई जन्म पंछी सरप होइयो। कई जन्म हैवर वृच्छ जोइयो।।
मिल जगदीश मिलन की बरिया। चिरंकाल एह देह संजरिया।।
फरमाते हैं कि ऐ जीव इस जीवन से पहले तूने कई बार कीड़े, पतंगों, हाथी मछलियों की योनियों में भरमता रहा है कई बार पक्षी, सर्प, हिरन के शरीर तूने धारण किये कई बार वृक्ष और पहाड़ों की योनि भरमता रहा है। अब तुझे ईश्वर से मिलने की बारी है ये देहि तुझे चिरकाल के बाद मिली है इसलिये ऐसा यत्न कर कि तुझे फिर नीच योनियों में न जाना पड़े। इससे सिद्ध होता है कि जीव ने लाखों शरीर धारण किये हैं। वे सब यमराज की भेंट कर चुका है।
श्री परमहँस दयाल जी की जीवन झलकियों में से एक पावन लीला का वर्णन मिलता है कि एक बार एक भक्त के तीन ऊँट गुम हो गये। उन्हें ढूँढने के लिये उसने बहुत प्रयत्न किया। कई दिन तक तलाश करने पर भी उन्हें न ढूँढ सका। आखिर निराश हो गया। जब मनुष्य सब तरफ से निराश हो जाता है तब फिर उसे अपने मालिक सतगुरु की याद आती है। उन दिनों श्री गुरुमहाराज जी टेरी में विराजमान थे। उसने अपने इष्टदेव श्री गुरुमहाराज जी को मन ही मन याद किया और श्री चरण कमलों में विनय की कि ऐ प्रभो अगर मेरे ऊंट आपकी कृपा से मिल जायें तो मैं 21/- रूपये सेवा में भेंट करूँगा। इतना कह कर जब वह अपने घर पहुँचा तो ऊंटो को अपने स्थान पर बँधा पाया। उसने अपनी पत्नि से पूछा कि ये ऊँट कौन बाँध गया है? उसकी पत्नि ने जवाब दिया मुझे तो मालूम नहीं मैं तो घर के कार्य में व्यस्थ थी। भक्त ने कहा कि ज़रूर ही श्री गुरु महाराज जी की कृपा से ही ये ऊँट हमें मिले हैं उन्होने हमारी विनय को स्वीकार किया है। चलो पहले  श्री गुरु महाराज जी के अब श्री दर्शन कर आयें। दोनों पति पत्नि श्री दर्शन के लिये श्री चरणों में उपस्थित हुये दण्डवत वन्दना की और श्री चरणों में 21/-की बजाय11/-भेंट कर दिये। मन हमेशा ही जीव को धोखा देता है। भक्त ने सोचा ऊंट तो मिल ही गये हैं अगर11/-ही भेंट कर दें तो क्या हर्ज़ है? मैंने प्रत्यक्ष में तो कोई वायदा किया नहीं था कि 21/-भेंट करूँगा। भले आदमी ने ये नहीं सोचा कि घट घट की जानने वाले अन्तर्यामी सतगुरु ने तेरी मन ही मन की हुई विनती को सुनकर तेरी मनोकामना पूर्ण की है तो क्या 21/-का किया हुआ वायदा नहीं सुना होगा? लेकिन जीव बुद्धि मन के गलबे में आ जाती है। श्री गुरुमहाराज जी ने अन्तर्यामी होते हुये भी उससे कुछ न कहा कि भाई तू 21/-कहकर11/-क्यों भेंट कर रहा है? पत्नि सहित वह भक्त श्री दर्शन करके जब वापिस अपने गाँव जा रहा था अभी फर्लांग दो फर्लांग ही गया होगा कि रास्ते में उसे कुछ पठान लुटेरे मिल गये। उनसे छीना झपटी करने लगे। उसकी पत्नि ने सोने की जंजीर पहन रखी थी उसे छीन कर ले गये। वह दोनों फिर श्री चरणों में उपस्थित हुये सारी घटना कह सुनाई कि पठानों ने हमें लूट लिया। श्री गुरुमहाराज जी ने पूछा भाई, क्या लूट कर ले गये? उसने जवाब दिया कि भक्तानी की सोने की जंज़ीर छीनकर ले गये हैं। फिर पूछा कि कितने रूपयों की थी? उसने जवाब दिया लगभग10/-की होगी। उस समय सोना चार पांच रूपये तोला हुआ करता था। श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया ठीक ही तो हुआ अपना हिस्सा ही तो ले गये हैं अधिक तो नहीं ले गये। तुमने जो 21/-का वायदा किया था और11/-ही भेंट किये। भाई अगर दयाल से बचा कर रख लिया है काल तो ज़बरदस्ती ले ही जायेगा। वो तो नहीं छोड़ेगा। उस समय श्री गुरु महाराज जी ने फारसी का एक शेयर उच्चारण किया।
जाँ बजाना बिदह वगरना अज़ तो बिस्तानल अज़ल।
खुद ही मुन्सिफ बाश ऐ दिल र्इं नीको या आँ नीको।।
 अपना जीवन अपने सच्चे मित्र सन्त सतगुरु दयाल को खुशी सेअर्पण कर दे अन्यथा तुझसे काल छीन लेगा ऐ मन! तू स्वयं ही सोच समझ कर निर्णय कर कि काल तुझसे ज़बरदस्ती छीन कर तुझे चौरासी की कैद में डाल दे ये उत्तम है या अपने मालिक को अर्पण करके चौरासी की कैद से छूट कर परमात्मा को प्राप्त कर सच्चे आनन्द को प्राप्त कर ले ये उत्तम है। जीव के सुख शान्ति और आनन्द रूप ऊंट कई जन्म जन्मानतरों से गुम हो चुके हैं उन्हें तलाश करने के लिये निम्न कोटि की योनियों के चक्र काटता रहा है लेकिन खुशी और आनन्द प्राप्त नहीं हुआ अन्त में दुःखी परेशान होकर निराश होकर परमात्मा से प्रार्थना करता है कि है प्रभो मुझे इस दुःख से छुड़ा मुझे मानुष चोला प्रदान कर मैं वायदा करता हूँ अपने जीवन का एक एक स्वाँस तेरे अर्पण करूँगा तेरी याद में ही जीवन बिताऊँगा। संसार के पदार्थों की कामना नहीं करूँगा लेकिन जीवअपने किये हुये वायदे को फिर फिर भूल जाता है।काफ कौल  करके मालिक नाल आयों तेरा भजन मैं सदा कमावंगा।
      मैंनूं बाहर कढ दे इस नरक विचों तेरी बन्दगी दे विच चित लगावांगा।।
      तेरा बन के रहसां संसार अन्दर किथे होर न मन अटकावांगा।
      तेरी बन्दगी करसां कबूल हरदम कदी दिलों न तैनूं भुलावांगा।।
       ऐत्थे  आ के बन्या दुनियाँ  दा  बन्दा दासन दास ए गल  शर्म दी  ए।
      कोई दोष न मालिक दा जान इस विच सारी मार ए अपने कर्म दी ए।।
      जीव अपने किये वायदे को भूल जाता है महापुरुष दया करके दयाल रूप धार कर जीव को उसके किये वायदे को याद दिलाते हैं उसे चेतावनी देते हैं सुजाग करते हैं कि ईश्वर की कृपा से कई बार याचना करने के बाद मानव शरीर मिला है अपने वायदे को याद कर सांसारिक इच्छाओं कामनाओं को त्याग कर मालिक की भक्ति में जीवन लगा। अपना एक एक स्वांस मालिक के अर्पण कर ताकि पहले शरीरों की तरह ये मानव जीवन भी यमराज के समर्पित न हो जाए। ये अवसर मत गँवा अपना जीवन सतगुरु के अर्पित करके सच्चे आनन्द को प्राप्त कर ले। एक सीस अब खुशी से कर सतगुरु की भेंट। यमराज तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। जीवन अर्पण करने का मतलब ये नहीं कि संसार के कार्य व्यवहार रिश्ते नाते सम्बन्धी सब छोड़कर कहीं चले जाना है। महापुरुष संसार के कार्य व्यवहार करते हुये मालिक का सुमिरण करते रहने के लिये ही फरमाते हैं। करना केवल ये है कि संसार की कामनाओं की बजाय मालिक की भक्ति की कामना करे। सतगुरु की कृपा से गुरुमुखों को जो सच्चे नाम की प्राप्ति हुई है उसका चलते फिरते उठते बैठते खाते पीते संसार के सब कार्य व्यवहार करते हुये स्वांस स्वांस में नाम जपना है। ये दम हीरा लाल है गिन गिन गुरु को सौंप। हत्थ कार वल ते दिल यार वल। इसलिये स्वांस स्वांस मालिक के अर्पण करना है यमराज कुछ न बिगाड़ सकेगा। छू भी नहीं सकता धर्मराय अब का करेगो जब फाटयो सगलो लेखा।
फिर जो एक एक स्वांस मालिक की भक्ति में नाम में लगायेंगे तो उनके कल्याण में शक ही क्या है? वह निश्चय ही सच्चे आनन्द को प्राप्त सकेंगे। हम सब सौभाग्यशाली हैं जिन्हें ईश्वर की कृपा से मानुष जन्म मिला यम त्रास निवारण,जगतारण श्री परमहँसदयाल जी की शरण प्राप्त हुई, उनकी सच्ची राहनुमाई नसीब हुई और उनसे सच्चे नाम की प्राप्ति हुई है हमारा कर्तव्य है कि इस सुनहरीअवसर का लाभ उठाते हुये महापुरुषों के वचनों केअनुसार अपने जीवन के एक एक स्वांस को मालिक के अर्पित करते हुये अपनी आत्मा को आवागमन के चक्कर से,चौरासी की कैद से छुड़ाकर परमात्मा से मिलाना है। और मालिक से यही प्रार्थना करें कि प्रभो ः-
            कई जन्मो के बिछुड़े थे माधो ये जन्म तुम्हारे लेखे।
            कहे रविदास आस लग जीवां चिर भयो दरसन पेखे।
प्रभो कई जनमों से आपसे बिछुड़े थे ये जीवन आपके लेखे लग जाये मन धोखा न दे इसी आस पर जीऊं कि आपकेदर्शन पाकर जीवन सफल करूँ।

No comments:

Post a Comment