Monday, January 18, 2016

18.01.2016 मनुष्य का संग्रह अहंकार बढ़ाता है।

    यूनान के एक सन्त हुये हैं जिनका नाम था सुकरात। उनके पास एथेन्स शहर का एक सेठ आया और सुकरात जी के सामने अपनी तारीफ करने लगा कि मैं अमुक सेठ हूँ इतना धन मेरे पास है मेरी इतनी मिलें हैं कारखाने हैं हज़ारों नौकर मेरे हुक्म मे चलते हैं। सुकरात जी ने कहा मैं तो आपको जानता नहीं लेकिन आपको जानने की कोशिश करता हूँ। संसार का नक्शा अपने कमरे की दीवार से उतार कर उसके आगे रख दिया कि बताओ इसमें युनान कहाँ है? उसने अँगुली से युनान का नक्शा बता दिया। युनान में एथेन्स शहर कहां हैं? उस युनान के नक्शे में एथेन्स शहर के लिये एक बिन्दु दर्शाया गया था जैसे कि नक्शे में होता ही है। अब सुकरात जी ने उससे पूछा कि बताओ इसमें आपकी मिलें कारखाने या आपका घर कहां है? उस नक्शे में उसका घर कहाँ से नज़र आता उसने कहा इसमें हमारा घर कहीं नहीं दीखता। सुकरात जी ने कहा जब केवल एक ही पृथ्वी के नक्शे पर आपके घर का, आपका कोई अता पता नहीं तो परमात्मा की बनाई इस सारी सृष्टि में जिसमे असंख्य ब्राहृाण्ड और पृथ्वियाँ हैं उसमें आपकी क्या गिनती है? क्या हैसियत है? कुछ भी नहीं। आपका अस्तित्व आपसे कुछ जान पहचान है केवल जब तक आपका जीवन है तब तक ही है। मृत्यु के उपरान्त कोई भी आपको नहीं जानेगा। संसार में केवल उन्हीं का नाम सब, युगों तक जानते हैं जिन्होंने परमात्मा की भक्ति की, नाम का सुमिरण किया। प्रभु का प्रेम प्राप्त किया उनकी ही संसार में युगों तक खुशबू फैली रहती है।

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