Thursday, January 7, 2016

कर्म भूमि


     यह हमारा भूलोक कर्मभूमि है। इसे ही मनुष्य-लोक कहा जाता है। मनुष्य को जन्म लेने का सौभाग्य इसी अवनितल पर मिलता है। लोक तो वैसे चौदह माने जाते हैं परन्तु उनमें अलौकिक लोक यही है। इस भूमण्डल की विशेषता यह है कि इसमें जन्म लेकर मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक कर्म कर सकता है। जन्म जन्मान्तरों में किये हुए कर्मों का फल भी यहाँ जीवों को प्राप्त होता है। उस फल को भोगने में जो प्रयत्न करना पड़ता है उसे "कर्म' नहीं कहते। यदि फलों के भोगने की क्रिया को भी "कर्म करना' कहा जाये तो अन्यान्य पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि सम्पूर्ण जीव जन्तु भी कर्मों के फल भोग रहे हैं। उनकी फलोपभोग की क्रिया को भी कर्म कहना होगा। उन्हें भी कर्म करने के कारण कर्ता मानना पड़ेगा। शास्त्रकारों ने ऐसा नहीं माना। उनका सिद्धान्त तो यह है कि चौरासी लाख योनियों में से अस्सी लाख योनियों में जन्म लेने वाले केवल भोगयोनि के जीव हैं और शेष चार लाख प्रकार की योनियाँ मनुष्यों की हैं जिन्हें कर्म योनि में गिना जाता है। भूमि पर अन्य भोगयोनि के जीवों के साथ कर्म योनि के प्राणी मनुष्य भी जन्म लेते हैं। इसलियेे इस लोक को कर्मभूमि कह सकते हैं।
      एक प्रश्न और उत्पन्न होता है कि मनुष्य क्या भोगयोनि नहीं है? यह भी तो पूर्व जन्म में किये हुए कर्मों के फल इसी धरणी पर आकर भोगता है। अतः यह "भोगयोनि' का जीव भी हुआ। निस्सन्देह मनुष्य कर्मयोनि और भोगयोनि दोनों योनियों का जीव है। इसलिये इस मानव को "उभय योनि' कहा जाता है। उभय का अर्थ है "दो'। अर्थात इसे अपने जीवन काल मे दोहरा अभिनय करना है कत्र्ता का और भोक्ता का भी। विगत जन्मों के कर्मों का फल बिना किसी आनाकानी के भोगने के लिये यह बाध्य है। बिना उनका भुगतान किये इसका कहीं-कोई छुटकारा नहीं। साथ ही इस मानव शरीर मे नवीन कर्म के करने का भी पूर्ण अधिकार इसी को है। अतएव देव-असुर-नागादि लोकों के निवासी कर्मभूमि में निवास नहीं करते-वे सब भोगस्थली के अधिवासी हैं। उनको भी मनुष्य जन्मों में किये हुए कर्मो के अनुसार देह प्राप्त होती है। सूर्य लोक में भी बालखिल्य नामक ऋषि रहा करते हैं जिनकी देह का परिमाण अँगूठे जितना ही होता है। परन्तु उसी में ही रहकर वे अपनी सम्पूर्ण जीवन चर्या को पूरा करते हैं।
     महाभारत अध्याय 137 दानधर्म पर्व में लिखा है कि मनुष्य लोक में ही जिन राजाओं ने शुभ कर्म किये थे उन्हें देवलोक की प्राप्त हुई-उदाहरण देते हुए राजर्षि भीष्म अपने समक्ष बैठे हुए महाराजा युधिष्ठिर जी को इस प्रकार समझाते हैं-"राजन्! लोक मेे प्रतिष्ठित महर्षि आत्रेय अपने शिष्यों को निर्गुण ब्राहृ का उपदेश देकर उत्तम लोकों में गये हैं।'
     उशीनर कुमार राजा शिबि अपने प्यारे पुत्र के प्राणों को ब्रााहृण के लिये न्यौछावर करके यहाँ से स्वर्गलोक को चले गये। संकृति जी के पुत्र राजा रन्तिदेव जी ने महात्मा वसिष्ठ मुनि जी को विधिपूर्वक अध्र्यदान किया उन्हें श्रेष्ठ लोकों की प्राप्त हुई। ऐश्वर्यशाली राजा अम्बरीष जी अमित तेजस्वी ब्राहृण को अपना सारा राज्य सौंपकर स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। मनु जी के पुत्र सुघुम्न जी ने महात्मा लिखित जी को जिन्होंने अपने बड़े भाई शंख जी के उद्यान में से फलों की चोरी करने के अपराध में महाराजा से अपने हाथ काट देने का दण्ड मांगा था-धर्म पूर्वक दण्ड देकर उत्तम लोकों की प्राप्ति की। राजा सुमन्यु जी ने भक्ष्य पदार्थों के पर्वत जैसे कितने ही ढेर लगा कर उन्हें शाण्डिल्य ऋषि जी के निमित्त समर्पित कर दिया जिससे उन्होने स्वर्गपुरी में स्थान प्राप्त कर लिया।
 

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