Wednesday, January 6, 2016


एक दिवस श्री परमहँस दयाल जी की सेवा में बाई योगानन्द जी ने करबद्ध विनय की कि श्री महाराज जी! मीरां बाई जी और व्रज की गोपियों में से कौन उत्तम है? मेरे विचार में तो मीरांबाई जी का पद उच्च है क्योंकि उन्होंने तो भगवान् श्री कृष्ण को देखा भी नहीं और अदृश्य प्रेम में ही इस पद को पहुँच गर्इं। और गोपियों को प्रेम हो जाना तो कोई विशेष बात नहीं क्योंकि उन्होने तो भगवान श्री कृष्ण की शोभा एवं लीलाओं को अपने नेत्रों से देखा था। श्री महाराज जी ने फरमायाः-यह बात नहीं है। पद तो गोपियों का ही बड़ा है। गोपियाँ भगवान श्री कृष्ण के साथ आम लोगों के समान मिलजुल कर रहती थीं, उनके प्रत्येक व्यवहार को प्रसन्नतापूर्वक सहन करती थीं और उनकी कठोर से कठोर बात पर भी क्रोधित तथा रुष्ट नहीं होती थीं। भगवान श्री कृष्ण यद्यपि आम मनुष्यों की भांति उनके मध्य रहते-सहते और खाते-पीते थे, परन्तु फिर भी वे उनको महा- योगेश्वर और सोलह कला सम्पूर्ण अवतार समझ कर उनसे प्रेम करती थीं।
     किन्तु मीरांबाई जी के साथ ऐसा कहां हुआ? मूर्तिपूजन को तो इसीलिये प्रारम्भ किया गया क्योंकि लोग चेतन की पूजा करने की सामथ्र्य एवं योग्यता नहीं रखते। मन ने चाहा तो मूर्ति पर दो सेर दूध चढ़ा दिया, नहीं चाहा तो नहीं चढ़ाया; वह न कुछ बोलती है न चालती है। उसका ध्यान सुगम है, परन्तु चेतन की भक्ति तथा उसका ध्यान करना अत्यन्त कठिन है।
                निर्गुन रुप  सुलभ अति ,  सगुन जान  नहिं कोइ।
                सुगम अगम नाना चरित, सुनिमुनि मन भ्रम होइ।।
     अर्थः-निर्गुण रुप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझ में आ जाने वाला) है, परन्तु (गुणातीत दिव्य) सगुणरुप को कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान के अनेक प्रकार के सुगम तथा अगम चरित्रों को सुन कर ऋषियों-मुनियों का मन भी भ्रमित हो जाता है। चेतनरुप की भक्ति को इसलिये कठिन कहा गया है कि वे आम मनुष्यों की भाँति लोगों के मध्य रहते और खाते-पीते हैं, बीमार भी होते हैं और कभी-कभी दुःखी भी दिखलाई देते हैं। उनकी कुल चेष्टा और कार्यवाही आम मनुष्यों की सी होती है। उनको अवसर देखकर कठोर बात भी कहनी पड़ती है। यह सब देखकर उनके कुछ सेवक उनसे रुष्ट भी हो जाते हैं और उनकी प्रत्येक बात को सहन करना असम्भव हो जाता है, इसलिये उन पर निश्चय होना कठिन है। किन्तु गोपियां हर समय भगवान् के ध्यान में इस प्रकार तन्मय रहती थीं

2 comments:

  1. SSDN. Murti Puja is start of life. Nishkam sewa in Shri hajoori is art of life.. Jai Sachidanand Ji

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  2. SSDN. Murti Puja is start of life. Nishkam sewa in Shri hajoori is art of life.. Jai Sachidanand Ji

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