एक जिज्ञासु महापुरुषों से प्रश्न करता है। मन के साथ प्रभु
का क्या सम्बन्ध है और उनका परस्पर मिलाप कैसे होता है?
महापुरुष फ़रमाते हैं कि इस बात में तो कोई शंका ही नहीं
रही कि आत्मा का दर्शन इन चर्म नेत्रों से कदापि नहीं हो हो सकता। क्योंकि जो
वस्तु चर्म आँखों से नजर आती हैं वह संसारिक पदार्थों की तरह नाशवान है। दिमाग
संसारिक विचार वाली वृति है और दिल परमार्थिक विचार वाली वृति है। दिमाग चतुराई की
ओर ले जाता है और अपनी योग्यता के चमत्कार दिखा दिखाकर अहंकार दृढ़ करता है।
परन्तु दिल प्रेम अनुभव का घर है। भक्ति इसी के अन्दर उत्पन्न होती है। इसलिए
परमार्थ से दिल अधिक उत्पन्न होती है। इसलिए परमार्थ में दिल अधिक आवश्यक है, दिमाग
प्रकाश का कारण है। परन्तु दिल के अन्दर आत्मिक बल उत्पन्न होता है । यहाँ अकल और
प्रेम के झगड़े का शेयर वर्णन है –
अकल कहे सिआना हो, प्रेम कहे दीवना हो ।
अकल कहे कुछ महल पवाईये, प्रेम कहे सब खाक रुलाइये ।।
प्रेम
सच्ची प्रीति का नाम है और मोह से बिल्कुल भिन्न है क्योंकि प्रेम में संसारी बंधन
नहीं। इसलिए हे जिज्ञासु परमार्थ के लिए हमारा सम्बन्ध अधिकतर दिल से है और दिल भी
वह जो शुद्ध निर्मल भाव को प्राप्त हो चुका हो। जैसे लोहे के ऊपर से मिट्टी आदि
उतर चुकी है तो चुम्बक उसे शीघ्र खींच लेगा। जब तक मिट्टी लोहे के चारों ओर लिपटी
हुई है तो समीप होने पर भी चुम्बक नहीं खींच सकता। ऐसे ही जब दिल शुद्ध हो जायेगा
तो दिलवर उसे शीघ्र खेंच लेगा। यदि प्रभु हमारा दिलवर है तो वह हमारी तरफ जरुर
आकर्षित होगा। अगर दिल संसार के संबन्धों की ओर तो प्रभु कैसे मिल सकते है। दृढ़
माया में जकड़ा हुआ दिल कैसे परमार्थ की प्राप्ति करेगा। जो दिल में अपने शरीर की
चिन्ता संबन्धों का प्रेम रुपये का लोभ और स्वर्गदिक की इच्छा कैद हो वह प्रियतम
के मिलाप के लिए कभी पग नही उठा सकता। इन माया के जंजीरों से मुक्त होकर नाम से
चित जोड़ कर आत्मा में तदाकार करना ही पग उठाना है। चौबीस घंटे दिल मायिक पदार्थों
का ध्यान है और फिर इच्छा करता है कि परमात्मा की प्राप्ति हो जिस प्रकार एक 20
किलो मिर्चा के अन्दर अगर एक छटाँक चीनी डालने से मिर्च का कड़वा पन नही जा सकता।
सारा दिन संसारी कामों में रहकर घड़ी आधी घड़ी भजन करने से परमात्मा के दर्शन
असम्भव है। हाँ हर कर्म करते हर पल चित में उसकी याद बनी रहे तो वो प्रभु हमारे
अंग संग है। इसलिए उत्तम विचारों का बारम्बर अभ्यास करके दिल बलवान बनाना है।
निष्काम कर्मों से इसे शुद्ध बनाना है और माया के बन्धन से मुक्त करना है। फिर प्रभु
मिलाप में जरा देरी नही। याद रखो प्रियतम की खोज में इधर उधर न भटको, वह तुम्हारे
अति समीप है, केवल दिल को शुद्ध करो। परमात्मा का नाम दिलवर है अर्थात वह स्वंय
दिल को अपनी ओर खेंच लेता है।
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