एक रोज़ इरशाद हुआ¬ः- कि किसी औरत ने अपने मकान का कूड़ा झाड़कर बाहर फेंकते वक़्त कहा कि "कृष्णार्पण'।
कहीं उधर से नारद जी महाराज गुज़र रहे थे। औरत की यह हरकत और अपने स्वामी (ईश्वर, कृष्ण) का अपमान न सह सके और एक चाँटा उस औरत के बड़े ज़ोर से रसीद किया।
उस औरत ने थप्पड़ खाकर भी कहा कि "कृष्णार्पण।'
जब नारद जी वैकुण्ठपुरी पहुँचे तो क्या देखते हैं कि कुल देवता उनकी बुराई कर रहे हैं कि "नारद जी ने बड़ा खोटा काम किया जो उस औरत के चाँटा मारा। वह थप्पड़ कृष्ण महाराज के लगा है।'
यह सुनकर नारद जी के होश उड़ गए और कृष्ण जी महाराज के चरणों में सिर रखकर मुआफ़ी के ख़्वास्तगार (प्रार्थी) हुए।
उन्होंने फ़रमाया कि "नारद जी! तुमने हमारा तो कोई क़सूर किया नहीं। अगर चांटा मारा तो उस औरत के मारा। फिर हमसे किस बात की मुआफ़ी चाहते हो? अगर मुआफ़ी माँगनी है तो उस भक्तिन से ही जाकर माँगो।'
नारद जी यह सुनकर उस औरत के पास दौड़े आए और बहुत आज़िज़ी (नम्रता) से मुआफ़ी के ख़्वास्तगार हुए तो उसने (औरत ने) जवाब दिया कि "यह भी कृष्णार्पण।'
जब नारद जी मुआफ़ी माँगकर वैकुण्ठ वापस गए तो क्या देखते हैं कि उनकी मुआफ़ी का ख़्याल और थप्पड़ मारने का क़ुसूर, दोनों मजिस्म-(साकार)-सूरत कृष्ण जी के सामने खड़े कह रहे हैं कि "महाराज! हमको बताइये, हम कहाँ जायें?'
कृष्ण महाराज ने फ़रमाया कि "अब तुमको और कहाँ जगह बताऊँ? तुम भी मुझमें ही समा जाओ।' यह सुनकर वे दोनों सूरतें उनमें समा गर्इं।
कहीं उधर से नारद जी महाराज गुज़र रहे थे। औरत की यह हरकत और अपने स्वामी (ईश्वर, कृष्ण) का अपमान न सह सके और एक चाँटा उस औरत के बड़े ज़ोर से रसीद किया।
उस औरत ने थप्पड़ खाकर भी कहा कि "कृष्णार्पण।'
जब नारद जी वैकुण्ठपुरी पहुँचे तो क्या देखते हैं कि कुल देवता उनकी बुराई कर रहे हैं कि "नारद जी ने बड़ा खोटा काम किया जो उस औरत के चाँटा मारा। वह थप्पड़ कृष्ण महाराज के लगा है।'
यह सुनकर नारद जी के होश उड़ गए और कृष्ण जी महाराज के चरणों में सिर रखकर मुआफ़ी के ख़्वास्तगार (प्रार्थी) हुए।
उन्होंने फ़रमाया कि "नारद जी! तुमने हमारा तो कोई क़सूर किया नहीं। अगर चांटा मारा तो उस औरत के मारा। फिर हमसे किस बात की मुआफ़ी चाहते हो? अगर मुआफ़ी माँगनी है तो उस भक्तिन से ही जाकर माँगो।'
नारद जी यह सुनकर उस औरत के पास दौड़े आए और बहुत आज़िज़ी (नम्रता) से मुआफ़ी के ख़्वास्तगार हुए तो उसने (औरत ने) जवाब दिया कि "यह भी कृष्णार्पण।'
जब नारद जी मुआफ़ी माँगकर वैकुण्ठ वापस गए तो क्या देखते हैं कि उनकी मुआफ़ी का ख़्याल और थप्पड़ मारने का क़ुसूर, दोनों मजिस्म-(साकार)-सूरत कृष्ण जी के सामने खड़े कह रहे हैं कि "महाराज! हमको बताइये, हम कहाँ जायें?'
कृष्ण महाराज ने फ़रमाया कि "अब तुमको और कहाँ जगह बताऊँ? तुम भी मुझमें ही समा जाओ।' यह सुनकर वे दोनों सूरतें उनमें समा गर्इं।
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