सन्तों के वचन हैंः- भक्ति धन सतगुरु धनी, बख्श रहे दिन रैन।
जो आवे चरणार में पावे सुख और चैन।।
एक गरीब लकड़हारा था। रोजाना वन से लकड़ियां काटकर लाता उन्हें बाज़ार में बेचकर जीवन निर्वाह करता था। उसी वन में एक महात्मा जी रहते थे। झोंपड़ी बनाकर भजन सुमरिण किया करते थे। लकड़हारा रोज़ महात्मा जी को श्रद्धा से प्रणाम करता, यथायोग्य जितना उससे बन पड़ता उनकी सेवा करता था। महात्मा जी उसकी सेवा और श्रद्धा भावना से अति प्रसन्न थे। एक दिन महात्मा जी ने उसकी दीन अवस्था को देखकर उस पर दया करते हुये कहा, तुम वन में और आगे चले जाओ वहां तुम्हें हीरों की खदान मिलेगी, जिसे पाकर तुम मालामाल हो जाओगे और सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकोगे।
महात्मा जी के कहे अनुसार वह लकड़हारा वन में आगे गया। वहां जाकर उसे पहले तांबे की खदान मिली। वह ताँबा बेचकर निर्वाह करने लगा। महात्मा जी ने कहा, तुम और आगे क्यों नहीं जाते? लकड़हारा और आगे गया वहां उसे चाँदी की खदान मिली। वह चाँदी बेचकर निर्वाह करने लगा। थोड़ा सम्पन्न होने लगा। महात्मा जी ने कहा, तुझे समझ नहीं है? और आगे जा। वह और आगे गया तो उसे सोने की खदान मिल गयी। और वह सोने में ही उलझ गया। कुछ दिन बाद महात्मा जी ने कहा, तू जड़ बुद्धि ही रहा और आगे क्यों नहीं जाता? वह और आगे गया तो उसे हीरों की खदान मिल गयी जिसे पाकर वह बहुत धनवान हो गया।
फिर कई वर्षों के बाद महात्मा जी नगर में गये तो देखा। उसने बड़े महल खड़े कर लिए थे। उसके पास बड़ा धन था, धन के अंबार थे। नगर का सबसे अमीर व्यक्ति कहलाता था। महात्मा जी को आये देखकर उसने उनके चरणों में प्रणाम किया। और कहा, आपकी बड़ी कृपा है। आपकी कृपा से मेरे पास किसी चीज़ की कमी नहीं है। सुख वैभव के सब सामान मुझे उपलब्ध हैं। महात्मा जी तो उसे सच्चे धन से मालामाल करना चाहते थे। महात्मा जी ने कहा, "तू अभी भी दया का पात्र ही बना हुआ है। तू भीतर गरीब का गरीब है। जैसा तू लकड़हारा था, वैसा ही अब है। क्योंकि जिस सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात को पाकर तुम अपने आप को धनवान समझ रहे हो, जिसे सम्पत्ति समझ रहे हो यह वास्तविक सम्पत्ति नहीं है। ये असली हीरे नहीं है। सब नकली हैं। हम तुझे असली और अनमोल हीरों की खदान पर पहुँचाना चाहते थे। तू और आगे क्यों नहीं जाता जहां तुझे असली हीरों की खदान मिलेगी। उस लकड़हारे ने कहा, मैं आपकी बात नहीं समझा, आप कहना क्या चाहते हैं? महात्मा जी ने कहा, सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात जिन्हें तुम पाकर अपने आपको धनवान समझ रहे हो। इनको पाकर कोई धनवान नहीं हो जाता। क्योंकि ये सब नाशवान हैं, बिछुड़ जाने वाले हैं। विपत्ति का घर हैं। ये सब या तो जीते जी छूट जाते हैं या संसार से विदा होते समय इन्हें छोड़ देना पड़ता है। इनमें से एक सुई भी जीव के साथ नहीं जाती।
कबीर सो धन संचिये जो आगे को होय। सीस चढ़ाये गाठरी जात न देखा कोय।।
इसलिये ये सम्पत्ति नहीं है। असली सम्पत्ति तो वह है जो परलोक में जीव के साथ जाये।
कबीर सब जग निर्धना धनवन्ता नहीं कोय। धनवन्ता सोई जानिये जाके सतनाम धन होय।
धनवान वास्तव में वह है जिसके पास प्रभु भक्ति का सच्चा धन है, नाम का धन है। जिसके ह्मदय में परमात्मा की याद है। जिसके पास परमात्मा के सच्चे नाम का धन नहीं है वह गरीब है। निर्धन है। महात्मा जी ने कहा, तुम सेठ नहीं हो, अमीर नहीं हो गरीब हो। क्योंकि तुम्हारे पास साथ ले जाने वाला धन नहीं है,साथ ले जाने वाला जितना जिसके पास है वह केवल उतना ही धनी है अमीर तो वही है जिसके पास साथ ले जाने वाला धन है जो मौत के पार ले जाया जा सके।
समुन्द साह सुल्तान गिरहा सेती मालु धन। कीड़ी तुलि न होवनी जे तिस मनहु न विसरहि।।
बड़े से बड़ा सम्राट हो जिसके पास समुन्द्र जैसा विशाल धन हो धन के पर्वतों के अम्बार लगे हों वह भी एक छोटी सी चिउंटी का मुकाबला नहीं कर सकता वह चींटी अगर परमात्मा की याद नहीं भूलती परमात्मा की याद अगर उसके दिल में बसी हुई है तो वह सम्राटों से भी बढ़कर है। महान से महान सम्राट भी परमात्मा की याद के धन के बिना दरिद्र है। एक ही दरिद्रता है परमात्मा की याद को भूल जाना एक ही समृद्धि है परमात्मा की याद को उपलब्ध हो जाना। इसलिये तुम अपने बारे में ये मत सोच लेना कि मेरा बैंक में इतना बैंलेंस है। ये धोखा है अपने भीतर के खाते को खोलना और देखना कि कितना नाम का धन एकत्र किया है? श्री गुरुनानकदेव जी के पास कौन सा धन था कौन सा राज्य था पद था? लेकिन बड़े से बड़े राजे महाराजे भी उनके चरणों में लौटते थे उनसे कृपा की भीख माँगते थे। (महात्मा बुद्ध, सन्त रविदास) आदि उदाहरण। इसलिये संसार में जो कुछ इकट्ठा कर रहे हो वह तभी तक बहुमुल्य है जब तक ज्ञान नहीं हुआ। ज्ञान सन्त महापुरुषों के मार्गदर्शन से उनकी संगत में आने से ही प्राप्त होता है जब ज्ञान हो जायेगा तो तुम पाओगे कि मैं कूड़ा कर्कट इकट्ठा कर रहा था। एक छोटा बच्चा कंकड़ पत्थर को एकत्र करके समझता है कि कीमती हैं, काँच की गोलियों को एकत्र करता है अपनी जेबें भरकर रखता है उसे वह बहुमुल्य हीरे जान पड़ते हैं। हीरे जैसे मालूम पड़ते हैं। माँ को समझाना पड़ता कि ये काँच की गोलियाँ क्यो एकत्र कर रखी हैं। उसे बच्चे के खीसे में से निकाल कर फैंकने पड़ते हैं लेकिन वह फिर उठा लाता है लेकिन जब वह बड़ा होगा, प्रोढ़ होगा तो वह भी अपने बच्चों से कहेगा कि ये क्या काँच के टुकड़े इकट्ठे कर रखे हैं? इसे फैकों। इसी तरह जब जीव को सन्त महापुरुषों की संगत में आने से समझ आ जाती है कि ये सब कंकड़ पत्थर हैं तो वह कहता है मैं व्यर्थ ही इन्हें एकत्र कर रहा था। इसीलिये ही कहा कि- कबीर सो धन संचिये जो आगे को होये। वह धन एकत्र कर जो तेरे साथ जाये क्योंकि परलोक में, परमात्मा की दरगाह में ये नहीं पूछा जायेगा कि तेरे पास कितना धन था। तेरी कितनी मान प्रतिष्ठा थी कितना साम्राज्य था? वहां तो ये पूछा जायेगा परमात्मा के नाम की कितनी जमा पूँजी है? प्रभु के प्रेमाभक्ति की कितनी सम्पदा एकत्र करके लाये हो?
असली हीरे जवाहरात की खदान आगे है। अर्थात् हमारे गुरुदेव का आश्रम है जहां प्रभु के सच्चे नाम के, प्रेमा भक्ति के असली हीरे जवाहरात प्राप्त होते हैं जिन्हें पाकर जीव वास्तव में धनी हो सकता है मालामाल हो सकता है। जिन्हें पाकर जीव का ये जीवन भी आनन्दपूर्वक व्यतीत होता है और परलोक भी सँवर जाता है।
जो आवे चरणार में पावे सुख और चैन।।
एक गरीब लकड़हारा था। रोजाना वन से लकड़ियां काटकर लाता उन्हें बाज़ार में बेचकर जीवन निर्वाह करता था। उसी वन में एक महात्मा जी रहते थे। झोंपड़ी बनाकर भजन सुमरिण किया करते थे। लकड़हारा रोज़ महात्मा जी को श्रद्धा से प्रणाम करता, यथायोग्य जितना उससे बन पड़ता उनकी सेवा करता था। महात्मा जी उसकी सेवा और श्रद्धा भावना से अति प्रसन्न थे। एक दिन महात्मा जी ने उसकी दीन अवस्था को देखकर उस पर दया करते हुये कहा, तुम वन में और आगे चले जाओ वहां तुम्हें हीरों की खदान मिलेगी, जिसे पाकर तुम मालामाल हो जाओगे और सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकोगे।
महात्मा जी के कहे अनुसार वह लकड़हारा वन में आगे गया। वहां जाकर उसे पहले तांबे की खदान मिली। वह ताँबा बेचकर निर्वाह करने लगा। महात्मा जी ने कहा, तुम और आगे क्यों नहीं जाते? लकड़हारा और आगे गया वहां उसे चाँदी की खदान मिली। वह चाँदी बेचकर निर्वाह करने लगा। थोड़ा सम्पन्न होने लगा। महात्मा जी ने कहा, तुझे समझ नहीं है? और आगे जा। वह और आगे गया तो उसे सोने की खदान मिल गयी। और वह सोने में ही उलझ गया। कुछ दिन बाद महात्मा जी ने कहा, तू जड़ बुद्धि ही रहा और आगे क्यों नहीं जाता? वह और आगे गया तो उसे हीरों की खदान मिल गयी जिसे पाकर वह बहुत धनवान हो गया।
फिर कई वर्षों के बाद महात्मा जी नगर में गये तो देखा। उसने बड़े महल खड़े कर लिए थे। उसके पास बड़ा धन था, धन के अंबार थे। नगर का सबसे अमीर व्यक्ति कहलाता था। महात्मा जी को आये देखकर उसने उनके चरणों में प्रणाम किया। और कहा, आपकी बड़ी कृपा है। आपकी कृपा से मेरे पास किसी चीज़ की कमी नहीं है। सुख वैभव के सब सामान मुझे उपलब्ध हैं। महात्मा जी तो उसे सच्चे धन से मालामाल करना चाहते थे। महात्मा जी ने कहा, "तू अभी भी दया का पात्र ही बना हुआ है। तू भीतर गरीब का गरीब है। जैसा तू लकड़हारा था, वैसा ही अब है। क्योंकि जिस सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात को पाकर तुम अपने आप को धनवान समझ रहे हो, जिसे सम्पत्ति समझ रहे हो यह वास्तविक सम्पत्ति नहीं है। ये असली हीरे नहीं है। सब नकली हैं। हम तुझे असली और अनमोल हीरों की खदान पर पहुँचाना चाहते थे। तू और आगे क्यों नहीं जाता जहां तुझे असली हीरों की खदान मिलेगी। उस लकड़हारे ने कहा, मैं आपकी बात नहीं समझा, आप कहना क्या चाहते हैं? महात्मा जी ने कहा, सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात जिन्हें तुम पाकर अपने आपको धनवान समझ रहे हो। इनको पाकर कोई धनवान नहीं हो जाता। क्योंकि ये सब नाशवान हैं, बिछुड़ जाने वाले हैं। विपत्ति का घर हैं। ये सब या तो जीते जी छूट जाते हैं या संसार से विदा होते समय इन्हें छोड़ देना पड़ता है। इनमें से एक सुई भी जीव के साथ नहीं जाती।
कबीर सो धन संचिये जो आगे को होय। सीस चढ़ाये गाठरी जात न देखा कोय।।
इसलिये ये सम्पत्ति नहीं है। असली सम्पत्ति तो वह है जो परलोक में जीव के साथ जाये।
कबीर सब जग निर्धना धनवन्ता नहीं कोय। धनवन्ता सोई जानिये जाके सतनाम धन होय।
धनवान वास्तव में वह है जिसके पास प्रभु भक्ति का सच्चा धन है, नाम का धन है। जिसके ह्मदय में परमात्मा की याद है। जिसके पास परमात्मा के सच्चे नाम का धन नहीं है वह गरीब है। निर्धन है। महात्मा जी ने कहा, तुम सेठ नहीं हो, अमीर नहीं हो गरीब हो। क्योंकि तुम्हारे पास साथ ले जाने वाला धन नहीं है,साथ ले जाने वाला जितना जिसके पास है वह केवल उतना ही धनी है अमीर तो वही है जिसके पास साथ ले जाने वाला धन है जो मौत के पार ले जाया जा सके।
समुन्द साह सुल्तान गिरहा सेती मालु धन। कीड़ी तुलि न होवनी जे तिस मनहु न विसरहि।।
बड़े से बड़ा सम्राट हो जिसके पास समुन्द्र जैसा विशाल धन हो धन के पर्वतों के अम्बार लगे हों वह भी एक छोटी सी चिउंटी का मुकाबला नहीं कर सकता वह चींटी अगर परमात्मा की याद नहीं भूलती परमात्मा की याद अगर उसके दिल में बसी हुई है तो वह सम्राटों से भी बढ़कर है। महान से महान सम्राट भी परमात्मा की याद के धन के बिना दरिद्र है। एक ही दरिद्रता है परमात्मा की याद को भूल जाना एक ही समृद्धि है परमात्मा की याद को उपलब्ध हो जाना। इसलिये तुम अपने बारे में ये मत सोच लेना कि मेरा बैंक में इतना बैंलेंस है। ये धोखा है अपने भीतर के खाते को खोलना और देखना कि कितना नाम का धन एकत्र किया है? श्री गुरुनानकदेव जी के पास कौन सा धन था कौन सा राज्य था पद था? लेकिन बड़े से बड़े राजे महाराजे भी उनके चरणों में लौटते थे उनसे कृपा की भीख माँगते थे। (महात्मा बुद्ध, सन्त रविदास) आदि उदाहरण। इसलिये संसार में जो कुछ इकट्ठा कर रहे हो वह तभी तक बहुमुल्य है जब तक ज्ञान नहीं हुआ। ज्ञान सन्त महापुरुषों के मार्गदर्शन से उनकी संगत में आने से ही प्राप्त होता है जब ज्ञान हो जायेगा तो तुम पाओगे कि मैं कूड़ा कर्कट इकट्ठा कर रहा था। एक छोटा बच्चा कंकड़ पत्थर को एकत्र करके समझता है कि कीमती हैं, काँच की गोलियों को एकत्र करता है अपनी जेबें भरकर रखता है उसे वह बहुमुल्य हीरे जान पड़ते हैं। हीरे जैसे मालूम पड़ते हैं। माँ को समझाना पड़ता कि ये काँच की गोलियाँ क्यो एकत्र कर रखी हैं। उसे बच्चे के खीसे में से निकाल कर फैंकने पड़ते हैं लेकिन वह फिर उठा लाता है लेकिन जब वह बड़ा होगा, प्रोढ़ होगा तो वह भी अपने बच्चों से कहेगा कि ये क्या काँच के टुकड़े इकट्ठे कर रखे हैं? इसे फैकों। इसी तरह जब जीव को सन्त महापुरुषों की संगत में आने से समझ आ जाती है कि ये सब कंकड़ पत्थर हैं तो वह कहता है मैं व्यर्थ ही इन्हें एकत्र कर रहा था। इसीलिये ही कहा कि- कबीर सो धन संचिये जो आगे को होये। वह धन एकत्र कर जो तेरे साथ जाये क्योंकि परलोक में, परमात्मा की दरगाह में ये नहीं पूछा जायेगा कि तेरे पास कितना धन था। तेरी कितनी मान प्रतिष्ठा थी कितना साम्राज्य था? वहां तो ये पूछा जायेगा परमात्मा के नाम की कितनी जमा पूँजी है? प्रभु के प्रेमाभक्ति की कितनी सम्पदा एकत्र करके लाये हो?
असली हीरे जवाहरात की खदान आगे है। अर्थात् हमारे गुरुदेव का आश्रम है जहां प्रभु के सच्चे नाम के, प्रेमा भक्ति के असली हीरे जवाहरात प्राप्त होते हैं जिन्हें पाकर जीव वास्तव में धनी हो सकता है मालामाल हो सकता है। जिन्हें पाकर जीव का ये जीवन भी आनन्दपूर्वक व्यतीत होता है और परलोक भी सँवर जाता है।
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