Wednesday, January 20, 2016

पाप का मूल कारण




प्रमाण के तौर पर जब एक मनुष्य दफ्तर में काम करता है तथा परिणाम यदि उसके हक में न हो तो वह कहता है कि  इस कामका उत्तरदायी ईश्वर है। इसीप्रकार जब वह मनुष्य दफ्तर में अच्छा काम करता है या अगर अच्छा काम होता है तो मनुष्य बढ़चढ़ कर कहता है कि मैने किया है और बुरे कर्मों का कर्ता ईश्वर को बनाता है। यही मनुष्य की मूर्खता है। प्रमाण के तौर पर एक कमरे में लैम्प रखा है। लैम्प की रोशनी पूरे कमरे में फैली है। उस प्रकाश में चाहे तो व्यक्ति अच्छी किताबे पड़े या अच्छा काम करे अथवा बुरी किताबें पढ़े या बुरा काम करें यह तो जीव की अपनी बुद्धि पर निर्भर है। लैम्प की रोशनी असंग है। मनुष्य उस रोशनी में जैसा काम करेगा वैसा ही फल पायेगा। ऐसे ही ईश्वर सत्ता देने वाला है जो पुरुष उस सत्ता को पाकर अच्छे कर्म करेंगे वे अच्छा फल पायेंगे तथा जो बुरे कर्म करेंगे बुरा फल पायेंगे । हाँ यह बात और है कि मृत्युलोक में आकर ईश्वर को भूलकर काल माया के चक्कर में पड़ जाता है। लेकिन ईश्वर का एक दूसरा रूप है साकार रूप-संतो का रूप। जब जीव यह निर्णय नहीं कर पाता कौन सा कर्म अच्छा है कौन सा बुरा तो जो जीव संत सतगुरु की शरण में आ जाते हैं सतगुरु उसको उसके अन्दर छुपे धन का ज्ञान करवाते हैं, आत्मा परमात्मा का विचार देते है। वो प्रेमी साधक अपनी मंजिल आसानी से ढूंढ़ लेते हैं। लेकिन अज्ञानी मनुष्य कर्म तो आप करता है अपनी वासनाओं को पूरा करने के लिए और दोष ईश्वर को देता है। पाप का मूल कारण भोगों के भोगने की इच्छा है यह इच्छा ही पापों का मूलकारण हैं। इसलिए पापों से बचने के लिए संसारिक विषय भोग की इच्छा को अन्तःकरण में स्थान नही देना चाहिए।

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