Monday, January 25, 2016

मृत्यु में प्रेवशः मृत्यु के सिवाय सब-कुछ अनिश्चित है


शिव ने कहाः-अपने शरीर के पंजों से ऊपर उठती हुई अग्नि पर अपने होश को केंद्रित करो जब तक कि शरीर जलकर राख न हो जाए, लेकिन तुम नहीं।
     बुद्ध को यह विधि बहुत प्रीतिकर थी। उन्होने अपने शिष्यों को इस विधि में दीक्षित किया। जब भी कोई व्यक्ति बुद्ध द्वारा दीक्षित होता, तो पहली बात यही होती थी। वे उसे कहते कि श्मशान जाकर किसी जलते हुए शरीर को, जलती हुई लाश को देखो। तीन महीने तक उसे कुछ भी नहीं करना होता। बस वहां बैठना और देखना होता। बुद्ध कहते, उसके विषय में विचार मत करना, उसे बस देखना। और यह कठिन है कि मन में यह विचार न उठे कि देर-सबेर तुम्हारा शरीर भी जला दिया जाएगा। तीन महीना एक लंबा समय है, और साधक को रात-दिन निरंतर जब भी कोई चिता जलती, उस पर ध्यान करना था। देर-सबेर उसे अपना ही शरीर चिता पर दिखाई देने लगता। वह स्वयं को ही जलता हुआ देखने लगता।
     यदि तुम मृत्यु से बहुत भयभीत हो तो इस विधि को तुम नहीं कर सकते, क्योंकि भय ही तुम्हारा बचाव करेगा। तुम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते या तुम सतह पर ही उसकी कल्पना कर सकते हो, लेकिन तुम्हारे गहन प्राण उसमें नहीं होंगे। फिर तुम्हें कुछ भी नहीं घटेगा। स्मरण रखो, तुम भयभीत हो कि नहीं, मृत्यु ही एकमात्र निश्चित घटना है। जीवन में मृत्यु के सिवाय और कुछ भी नहीं है, सब कुछ अनिश्चित है, केवल मृत्यु ही एक निश्चितता है बाकी सब-कुछ सांयोगिक है-हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता-केवल मृत्यु सांयोगिक नहीं है, और मानवीय मन की ओर देखो। हम मृत्यु के संबंध में सदा ऐसे ही बात करते हैं जैसे वह कोई दुर्घटना हो जब भी कोई मरता है तो हम कहते हैं कि उसकी मृत्यु असामयिक थी। जब भी कोई मरता है, हम इस प्रकार बात करने लगते हैं जैसे यह कोई दुर्घटना नहीं है, बाकी सब घटनावश है। मृत्यु पूर्णतः निश्चित है। तुम्हें मरना ही है।
     और जब मैं कहता हूं कि तुम्हें मरना है,, तो लगता है मृत्यु भविष्य में, कहीं बहुत दूर है। ऐसा नहीं है-तुम मर ही चुके हो, जिस क्षण तुम पैदा हुए, तुम मरने लगे थे। जन्म के साथ ही मृत्यु एक निर्धारित घटना नहीं हो गई। उसका एक भाग-जन्म-तो घट ही गया, अब केवल दूसरे भाग का घटना रह गया है। तो तुम पहले ही मर चुके, आधे मर चुके, क्योंकि एक बार व्यक्ति पैदा हो गया, तो वह मृत्यु के घेरे में आ गया, प्रवेश कर गया। अब कुछ भी उसे बदल नहीं सकता। अब उसके बदलने का कोई उपाय नहीं है। तुम उसमें प्रवेश कर चुके। जन्म के साथ ही तुम आधे मर गये। दूसरे; मृत्यु अंत में नहीं होने वाली, वह पहले ही हो चुकी है। वह एक प्रक्रिया है। जिस प्रकार जीवन एक प्रक्रिया है, मृत्यु भी एक प्रक्रिया है। हम द्वैत पैदा करते हैं-लेकिन जीवन और मृत्यु तुम्हारे दो पैरों की तरह, जीवन और मृत्यु दोनों एक ही प्रक्रिया हैं। तुम हर क्षण मर रहे हो, यह मैं इस तरह कहूं, जब भी तुम श्वास भीतर लेते हो, तो वह जीवन है, और जब भी तुम श्वास छोड़ते हो, तो वह मृत्यु है। पहला काम जो बच्चा करता है, वह है श्वास भीतर लेना, बच्चा श्वास बाहर नहीं छोड़ सकता। क्योंकि उसकी छाती में हवा नहीं है; उसे श्वास भीतर लेनी होगी, पहला काम है श्वास भीतर लेना, और वृद्ध व्यक्ति मरते समय जो अंतिम काम करेगा, वह है श्वास बाहर छोड़ना मरते समय तुम भीतर नहीं ले सकते। जब तुम मर रहे हो, तुम श्वास भीतर ले नहीं सकते। अंतिम कृत्य श्वास भीतर लेना नहीं हो सकता। अंतिम कृत्य श्वास का बाहर छोड़ना होगा। पहला कृत्य श्वास लेना है, और अंतिम कृत्य श्वास छोड़ना है, श्वास भीतर लेना जन्म है और श्वास बाहर छोड़ना मृत्यु है, लेकिन हर क्षण तुम दोनों ही कार्य कर रहे हो-स्वास लेना भी और छोड़ना भी। श्वास लेना जीवन है, श्वास छोड़ना मृत्यु है। शायद तुमने देखा नहीं, पर इसे देखने का प्रयास करो। जब भी तुुम श्वास छोड़ते हो, तुम अधिकशांत होते हो, गहरी श्वास छोड़ो, और तुम भीतर एक विशेष शांति का अनुभव करोगे। जब भी तुम स्वास लेते हो, तुम सघन हो जाते हो, तन जाते हो। श्वास लेने की सघनता ही एक तनाव निर्मित कर देती है और सामान्यतः साधारणतः श्वास लेने पर ही जोर दिया जाता है, यदि मैं तुम्हें गहरी श्वास के लिए कहूं तोे तुम सदा श्वास लेने से ही शुरु करोगे।

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