एक गुरुमुख सेवक अपने सतगुरुदेव जी के साथ कहीं यात्रा में जा रहा था। जंगल में उन्हें रात आ गई। श्री गुरुमहाराज जी ने उसे फरमाया कि वन का प्रदेश है, हम दोनों में से एक को सावधान रहना चाहिये। सेवक ने यह सुन कर प्रार्थना की कि पहले श्री गुरुमहाराज जी विश्राम करें-मैं पहरा देता हूँ गुरुदेव जी आराम में हो गये। प्रातः तीन बजे जब वे उठे उन्होंने सेवक से कहा कि अब तुम भी झपकी ले लो। सेवक आज्ञा मान कर लेट गया। थोड़ी देर में उसकी आँख लग गई। इतने में गुरुमहाराज जी ने देखा कि एक सांप फण उठाये सेवक की तरफ भागा आ रहा है। अपने योग-बल से उन्होंने सर्प से पूछा- ""तुम मेरे सेवक की ओर क्यों जा रहे हो?'' साँप ने कहा- ""इसका और हमारा पूर्वजन्म का लेन-देन चला आता है एक जन्म में यह मेरे गले का रक्त पीता है, दूसरे जन्म में मैं इसका रूधिर पीता हूँ।'' गुरुमहाराज जी ने हंस कर कथन किया ठहरो-""हम इसकी ग्रीवा का रक्त तुम्हें पिला देते हैं और तुम्हारा व इसका खाता सदा के लिये समाप्त हो जाये।'' सर्प ने यह बात सहर्ष मान ली।
इस पर गुरुमहाराज ने उसकी छाती पर बैठकर चाकू से ज्यों ही उसकी ग्रीवा से रुधिर लेने के लिये खरौंच लगाई, सेवक ने आँख खोली और देखा कि स्वयं गुरु महाराज जी हैं कोई पराया पुरुष नहीं-सेवक ने निश्चिन्त होकर आँखे बन्द कर लीं और वह सो रहा। गुरुमहाराज जी ने रुधिर निकाल कर सर्प को पिला दिया। साँप तो चला गया। सेवक जब उठा तो श्री गुरुमहाराज ने अपने आप बात चलाने के विचार से पूछा कि तुम्हारी कमीज़ पर रक्त का दाग कैसा है? सेवक ने उत्तर दिया कि ""मैने देखा कि श्री गुरुमहाराज जी मेरी छाती पर बैठे हैं और उनके हाथ में चाकू है-परन्तु निडर होकर अपनी आँखें मूँद लीं।'' गुरुमहाराज जी ने पूछा ""तुम चुप क्यों रहे?'' सेवक ने निवेदन किया कि मैने दो बातों का पक्का निश्चय किया हुआ है-एक तो श्री गुरुमहाराज जी के हाथों से मेरी बुराई कदापि नहीं हो सकती- वे जो कुछ भी करेंगे उसमें मेरी भलाई ही होगी। दूसरा मुझे अन्तिम स्वांस तक सेवक धर्म ही निभाना है। अपने मन का कहना नहीं मानना-सदा गुरु की मौज में सन्तुष्ट रहना है। अतः इन बातों को विचार कर मैने अधिक कुछ नहीं सोचा और नेत्र बन्द कर लिये थे। श्री गुरुमहाराज जी ने कहा ""शाबाश'' तुम धन्य हो गये। तुम्हारा जन्म जन्म का लेखा हमने काट दिया और सारा वृत्तान्त उससे कह सुनाया। सेवक जिसे सुनकर उनके चरणों में गिर पड़ा और लगा श्री गुरुदेव जी की महिमा गाने।
गुरुभक्ति के मार्ग में एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिये, वह यह कि अपने इष्टदेव जी के प्रति अपने में ऊँची से ऊँची भावना को पालना चाहिये। उनसे ऊँचा ब्राहृ को भी नहीं जाने जितनी उच्चतम कोटि में आराध्यदेव जी को रखा जाएगा उतनी ही ऊँचाई तक साधक पहुँचेगा इतनी ऊँची चोटी तक पहुँचना अपने पुरुषार्थ के अधीन नहीं होता। इष्टदेव स्वयं अपने भक्त की पवित्र एवं विशुद्ध भावना को देखकर उसे शक्ति प्रदान करते हैं जिसके द्वारा वह अपने कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है।
जो सौभाग्यशाली जीव अपने इष्टदेव सत्गुरु के चरणों अटूट श्रद्धा विश्वास रखते हैं वे कर्मों के बन्धन से छूट जाते हैं। आवागमन के चक्र से आज़ाद हो जाते हैं। सत्गुरु की कृपा से उनका जन्म मरण मिट जाता है और वे मोक्ष पद को प्राप्त करके अपना जीवन सफल कर जाते हैं।
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