Friday, January 29, 2016

जीवन परिवर्तन शील है

 जीवन सतत परिवर्तन है, सतत बदलाहट है कुछ भी स्थायी नहीं है कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है ये बुनियादी सत्य है।जीवन तो प्रवाह है। जब तुम किसी परिवर्तनशील चीज़ से आसक्त हो तो उसके जाने पर तुम्हारा दुःख में पड़ना अनिवार्य है। क्योंकि वह सुख तो जाने वाला है। जीवन विरोधों से बना है। श्वास भीतर आता है स्वास बाहर जाता है। इन विरोधों के बीच, उनके कारण ही तुम जीवित हो। वैसे ही दुख है और सुख है। सुख आने वाली श्वास की भाँति है दुःख जाने वाली श्वास की भाँति है। इसलिये जीवन में सुख के क्षण भी आयेंगे दुःख के क्षण भी आयेंगे और दोनों को अंगीकार करना है। यह नहीं कह सकते कि मैं श्वासं लूंगा लेकिन छोड़ूंगा नहीं। मैं उसे बाहर नहीं जाने दूंगा। तो जीवित रहना असम्भव है। (नाव चलाने के लिये दोनों चप्पू कीआवश्यकता है।) इसलिये विवेकी पुरुष ज्ञानवान, गुरुमुख, दोनों की परिस्थितियों में समान रहता है। वह सुख पाकर इतराता नहीं, और दुःख पाकर घबराता नहीं। क्योंकि वह जानता है कि दोनों ही परिस्थितियां सदैव रहने वाली नहीं हैं। सदा न सुख रहता है ना ही दुःख रहता है। (दृष्टान्त एक नगर सेठ--) कारागार में टूट चुके सेठ में नई शक्ति का संचार किया। अन्त वह फिर समान्य जीवन व्यतीत करने लगा। ऐसे ही कठिन समय में हमें सोचना चाहिये कि जो भी विपरीत परिस्थितियां चल रही हैं या जिन कठिनाईयों के दौर से हम गुज़र रहे हैं ये हमेशा नहीं रहेंगी। दिन-रात की भाँति सुख-दुःख का चक्र हर व्यक्ति के जीवन में आता रहता है चाहे वह कितना ही धनवान है या दो जून की रोटी को तरसता गरीब।  इसलिये न तो सुख को पाकर इतराएं और ना ही दुःख को पाकर घबरायें।

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