एक बार श्री हुज़ूर सतगुरु दाता दयाल जी ने श्री प्रयागधाम में पावन लीला करते हुये ये वचन फरमाये थे। ये सन 1975 की बात है कि श्री गुरु महाराज जी के श्री चरणों में किसी ने एक टोकरे में कुछ असली फल सेब, सन्तरे, आम, अनार आदि और कुछ नकली बनावटी फल भेंट किये।बनावटी फल देखने में बिल्कुल असली प्रतीत होते थे।सत्संग के पश्चात जब लीला करते हुये उन फलों कोअपने प्रेमियों भक्तों की तरफ लुटा रहे थे। संयोगवश वे लगभग सभी फल एक ही प्रेमी के हाथ में आते गये और उन फलों को वह अपनी कमर में लपेटी चादर में रखता गया अन्य प्रेमियों के हाथ में कोई भी फल न आया देखकर श्री गुरुमहाराज जी ने उन प्रेमियों को इशारा कर दिया इशारा पाते ही उन सभी ने मिलकर उससे सभी एकत्रित किये हुये फलों को छीन लिया। तब उस प्रेमी से पूछा कि कुछ हाथ में आया कि नहीं? उसने विनय की कि प्रभो। मिला तो बहुत कुछ था एकत्र भी कर लिया था लेकिन उसे इन सभी ने मुझसे छीन लिया है केवल एक ही फल मेरे पास शेष रह गया है।
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महापुरुषों की हर लीला, उनकी हर कार्यवाही जीवों के कल्याण के लिये जीवों को सत्य असत्य का भेद बताने के लिये हुआ करती है। अपनी पावन लीलाओं द्वारा ही जीवों का कल्याण किया करते हैं। उस समय वचन हुये कि प्रेमी जो तूने खा लिया वही तेरा अपना है और जो जोड़ लिया वह सब लोगों का है वो तेरा अपना नहीं है अर्थात खाने से मतलब ये है कि जो धन (तन,मन,धन) परमार्थ में लगा दे, गुरु सेवा में, भक्ति मे लगा दे वही तेरा अपना है बाकी तो सारा संसार ले ही जायेगा वो तेरा अपना नहीं है। शहद की मक्खी शहद एकत्र करती है जो वह खा लेती है केवल वही उसका है बाकी तो लोग ही तोड़कर ले जाते हैं। उसके हाथ में जो फल बचा था जब उसे उसने खाने का प्रयास किया तो उसे मालूम हुआ के यो तो नकली है मिट्टी का बना हुआ है।उसने विनती की प्रभो जो मेरे पास बचा है वह तो नकली फल है असली नहीं है। श्री वचन हुये अगर ये नकली है तो वो सब भी नकली है वो भी असली नहीं जिन्हें तुम असली समझ रहे हो वह सारा संसार ही नकली है उसमें कुछ भी हकीकत नहीं है सब ख्वाब है सपना है अफसाना है। जैसे सिनेमा घर में सब तस्वीरें चलती फिरती बोलती खाती पीती गाती नाचती प्रतीत होती हैं उसे देखकर लोग हँसते भी हैं आँखों में आँसू भी भर लेते हैं सुखी दुःखी भी होते हैंक्या वो अफसाना असली होता है?वो केवल अफसाना है उसमें वास्तविकता कुछ भी नहीं होती है इसी प्रकार संसार के जो भी कार्य व्यवहार जीव करता है वह सब असत्य है। पढ़ लिख लेना, कुटुम्ब परिवार बढ़ा लेना, संसार के ऐश्वर्य प्राप्त कर लेना सब कार्यवाही ही असत्य है हर आदमी की ज़िन्दगी एक अफसाना ही होती है। सत्य है तो केवल भगवान, उसका नाम,परमात्मा की भक्ति,प्रेम,सतपुरुषों की संगत,जो सतगुरु की पावन लीला,उनका ध्यान है वो सत्य है क्योंकि यही ध्यान ही, नाम व सेवा की कमाई ही जीव के परलोक में साथ जाती है। सतगुरु सत्य हैं उनकी संगत सत्य है उनकी रचना, लीला सत्य है बाकी सारा संसार असत्य है मिथ्या है ख्वाब है और जो संसार की रचना को हकीकत समझ लेता है वो बड़ा दीवाना है बे समझ है नादान है गफलत में पड़ा हुआ है,सोया हुआ है जो अफसाना को ही हकीकत समझने लगे उसे दीवाना नहीं कहा जाये तो और क्या कहा जायेगा? एक बार ग्रामीण व्यक्ति पहली बार सिनेमा देखने के लिये गया उसने कभी
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पहले सिनेमा देखा नहीं था। सिनेमा में जब जंगल का दृश्य आया उस में हाथी भागते हुये नज़र आ रहे थे उसे देखकर वह व्यक्ति ज़ोर ज़ोर से शोर मचाने लगा भागो हाथी आ गये हाथी आ गये, हमें कुचल डालेंगे अन्य दर्शकों ने कहा कि बैठ जाओ ये तो सिनेमा हो रहा है ये हाथी असली हाथी थोड़े ही हैं। उस व्यक्ति ने कहा कि ये तो हमको पता है कि सिनेमा हो रहा है इन हाथियों को क्या पता कि सिनेमा हो रहा है। आप उस ग्रामीण की नादानियों पर हँसेंगे केवल वही नादान नहीं है बड़े बड़े विद्वान बुद्धिमान समझदार भी कभी कभी धोखा खा जाते हैं।
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महापुरुषों की हर लीला, उनकी हर कार्यवाही जीवों के कल्याण के लिये जीवों को सत्य असत्य का भेद बताने के लिये हुआ करती है। अपनी पावन लीलाओं द्वारा ही जीवों का कल्याण किया करते हैं। उस समय वचन हुये कि प्रेमी जो तूने खा लिया वही तेरा अपना है और जो जोड़ लिया वह सब लोगों का है वो तेरा अपना नहीं है अर्थात खाने से मतलब ये है कि जो धन (तन,मन,धन) परमार्थ में लगा दे, गुरु सेवा में, भक्ति मे लगा दे वही तेरा अपना है बाकी तो सारा संसार ले ही जायेगा वो तेरा अपना नहीं है। शहद की मक्खी शहद एकत्र करती है जो वह खा लेती है केवल वही उसका है बाकी तो लोग ही तोड़कर ले जाते हैं। उसके हाथ में जो फल बचा था जब उसे उसने खाने का प्रयास किया तो उसे मालूम हुआ के यो तो नकली है मिट्टी का बना हुआ है।उसने विनती की प्रभो जो मेरे पास बचा है वह तो नकली फल है असली नहीं है। श्री वचन हुये अगर ये नकली है तो वो सब भी नकली है वो भी असली नहीं जिन्हें तुम असली समझ रहे हो वह सारा संसार ही नकली है उसमें कुछ भी हकीकत नहीं है सब ख्वाब है सपना है अफसाना है। जैसे सिनेमा घर में सब तस्वीरें चलती फिरती बोलती खाती पीती गाती नाचती प्रतीत होती हैं उसे देखकर लोग हँसते भी हैं आँखों में आँसू भी भर लेते हैं सुखी दुःखी भी होते हैंक्या वो अफसाना असली होता है?वो केवल अफसाना है उसमें वास्तविकता कुछ भी नहीं होती है इसी प्रकार संसार के जो भी कार्य व्यवहार जीव करता है वह सब असत्य है। पढ़ लिख लेना, कुटुम्ब परिवार बढ़ा लेना, संसार के ऐश्वर्य प्राप्त कर लेना सब कार्यवाही ही असत्य है हर आदमी की ज़िन्दगी एक अफसाना ही होती है। सत्य है तो केवल भगवान, उसका नाम,परमात्मा की भक्ति,प्रेम,सतपुरुषों की संगत,जो सतगुरु की पावन लीला,उनका ध्यान है वो सत्य है क्योंकि यही ध्यान ही, नाम व सेवा की कमाई ही जीव के परलोक में साथ जाती है। सतगुरु सत्य हैं उनकी संगत सत्य है उनकी रचना, लीला सत्य है बाकी सारा संसार असत्य है मिथ्या है ख्वाब है और जो संसार की रचना को हकीकत समझ लेता है वो बड़ा दीवाना है बे समझ है नादान है गफलत में पड़ा हुआ है,सोया हुआ है जो अफसाना को ही हकीकत समझने लगे उसे दीवाना नहीं कहा जाये तो और क्या कहा जायेगा? एक बार ग्रामीण व्यक्ति पहली बार सिनेमा देखने के लिये गया उसने कभी
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पहले सिनेमा देखा नहीं था। सिनेमा में जब जंगल का दृश्य आया उस में हाथी भागते हुये नज़र आ रहे थे उसे देखकर वह व्यक्ति ज़ोर ज़ोर से शोर मचाने लगा भागो हाथी आ गये हाथी आ गये, हमें कुचल डालेंगे अन्य दर्शकों ने कहा कि बैठ जाओ ये तो सिनेमा हो रहा है ये हाथी असली हाथी थोड़े ही हैं। उस व्यक्ति ने कहा कि ये तो हमको पता है कि सिनेमा हो रहा है इन हाथियों को क्या पता कि सिनेमा हो रहा है। आप उस ग्रामीण की नादानियों पर हँसेंगे केवल वही नादान नहीं है बड़े बड़े विद्वान बुद्धिमान समझदार भी कभी कभी धोखा खा जाते हैं।
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