हमारे
पाप और पुन्य कर्मों का उत्तरदायी कौन यहाँ यह शंका उठती है। ईश्वर ने मनुष्य को
संसार में भेजते समय मन बुद्धि विवेक देकर भेजा है जो कि 84 लाख योनियों में केवल
मनुष्य शरीर को प्राप्त है। इस मनुष्य शरीर को पाकर इन्सान सोच विचारकर अच्छे करता
हैं या मन माया के पीछे लगकर बुराई का रास्ता चुनता है। यह प्रभु ने मनुष्य पर
छोड़ दिया है। लेकिन अज्ञानी मनुष्य मिथ्या ईश्वर को ही दोष देता है कि अच्छे बुरे
कर्म ईश्वर की प्रेरणा से होते हैं। जबकि परमात्मा ने उसे पूर्ण आजादी दी है कि वह
अच्छे कर्म करके अपना लोक परलोक सवारता है या फिर बुरे कर्मों द्वारा नीच योनियों
में भ्रमण करता हैं।
प्रमाण
के तौर पर जब एक मनुष्य दफ्तर में काम करता है क्या वह यह कहता है किं इस कामका
उत्तरदायी ईश्वर है। अगर उत्तरदायी ईश्वर है तो बेतन भी ईश्वर को ही मिलना चाहिए।
इसीप्रकार जब वह मनुष्य दफ्तर में अच्छा काम करता है बेतन बढ़ाने के लिए कहता है
तो अगर ईश्वर उत्तरदायी है तो वेतन ईश्वर को बढ़ना चाहिए शोक तो इस बात का है कि
अगर अच्छा काम होता है तो मनुष्य बढ़चढ़ कर कहता है कि मैने किया है और बुरे
कर्मों का कर्ता ईश्वर को बनाता है। यही मनुष्य की मूर्खता है। प्रमाण के तौर पर
एक कमरे में लैम्प रखा है। लैम्प की रोशनी पूरे कमरे में फैली है। उस प्रकाश में
चाहे तो व्यक्ति अच्छी किताबे पड़े या अच्छा काम करे अथवा बुरी किताबें पढ़े या
बुरा काम करें यह तो जीव की अपनी बुद्धि पर निर्भर है। लैम्प की रोशनी असंग है।
मनुष्य उस रोशनी में जैसा काम करेगा वैसा ही फल पायेगा। ऐसे ही ईश्वर सत्ता देने
वाला है जो पुरुष उस सत्ता को पाकर अच्छे कर्म करेंगे वे अच्छा फल पायेंगे तथा जो
बुरे कर्म करेंगे बुरा फल पायेंगे । हाँ यह बात और है कि मृत्युलोक में आकर ईश्वर
को भूलकर काल माया के चक्कर में पड़ जाता है। लेकिन ईश्वर का एक दूसरा रूप है
साकार रूप संतो के रूप में जब जीव यह निर्णय नहीं कर पाता कौन सा कर्म अच्छा है
कौन सा बुरा तो जो जीव संत सतगुरु की शरण में आ जाते है सतगुरु उसको उसके अन्दर
छुपे धन का ज्ञान करवाते हैं, आत्मा परमात्मा का विचार देते है। वो प्रेमी साधक
अपनी मंजिल आसानी से ढूंढ़ लेते हैं। लेकिन अज्ञानी मनुष्य कर्म तो आप करता है
अपनी वासनाओं को पूरा करने के लिए दोष ईश्वर का देता है। पाप का मूल कारण भोगों के
भोगने की इच्छा है यह इच्छा ही पापों का मूलकारण हैं। इसलिए पापों से बचने के लिए
संसारिक विषय भोग की इच्छा को अन्त करण में स्थान नही देना चाहिए।
शुभ
कर्मः- इसमें कोई संशय नहीं कि
शुभ कर्मों का फल सदैव सुखदायी होता है। जब हम शुभ कर्म करते है वह हमारी आने वाली
प्रारब्ध के लिए बहुत अच्छी नीव रूप बन जाते हैं। तब हमें मीठी शान्ति अनुभव होती
है। कहते हैं कि जंगल में हिरणी व उसका बच्चा घूम रहे थे। शिकारी आया उसने उनको
पकड़ने के लिए जाल फैलाया हिरणी भाग गई लेकिन उसका बच्चा शिकारी के हाथ आ गया वह
उसको लेकर चल पड़ा। तो पीछे हिरणी अपनी बच्चे के साथ चल पड़ी क्योंकि माँ की ममता
ही ऐसी होती है वह अपने बच्चे को नही छोड़ सकती अपनी जान गवां देगी। जब शिकारी ने
पीछे मुड़कर देखा कि हिरणी पीछे पीछे आ रही है। और उसकी आँखे उससे अपने बच्चे के
लिए दया की भीख माँ रही है। अमुक प्राणीबोल नहीं सकता उसका दर्द उसका मुख बता देता
है। शिकारी के मन में दया आई कि जिस प्रकार हमें अपने बच्चे प्यारे है वैसे ही
जानवर को भी अपना बच्चा प्यारा है उसने हिरणी के बच्चे को छोड़ दिया। हिरणी चली
गई। उसके मन से शिकारी के लिए दुआयें निकल रही थी। इधर रात को जब शिकारी सोया तो
एक देव पुरुष ने उसे कहा कि आज तूने बहुत नेक काम किया है उस बच्चे की जान बख़्श
कर तेरे सारे पिछले पाप इस नेक काम से धुल गये। सुबह उठा शिकारी ने शिकार करना
छोड़ दिया। शुभ कर्म हमें सुख ही नही देते बल्कि सदैव के मार्ग पर ले जाते है।
तीन
प्रकार के कर्मों का नाश कैसे होता है?
प्रारब्ध
कर्म बिना भोगे नाश नहीं होते। क्रियामान कर्म निष्काम और अहमभाव छोड़ने से दग्ध
जाते है। प्रारब्ध कर्म की कथा सत्य है कि एक सेठ अपने घक के बाहर बैठा रूई से कान
साफ कर रहा था। क्योंकि कई वर्षो से उसके कान से पस मवाद बहती रहती थी बहुत इलाज
करवाने पर भी ठी नहीं हुआ। कुदरत की करनी जब कर्म कटने का समय आता है कि एक संत
उसके पास से गुजरे पूछा सेठ जी क्यों कान खुजला रहे हो?
सेठ जी ने कहा क्या करूं बहुत इलाज करवा चुका हुँ लेकिन कान से मवाद बहना बन्द नही
हुआ। तो सन्तों ने फ़रमाया कल हमारे पास आना। जब दूसरे दिन सेठ जी संतजी के पास
गये उन्होंने बताया सेठजी यह आपका प्रारब्ध कर्म है यह इलाज से ठीक नहीं होगा
क्योंकि आपने किसी जन्म में कोड़ियों से घृणा की है जिसके कारण आप को कष्ट है।
इसलिए आप कोड़ियों के आश्रम जाकर उहें दाल चावल बिना घृणा किये खिलाकर आओ। दूसरे
दिन सेठजी कोड़ियों को खाना खिला कर आये उनको ऐसा लगा जैसे उन्हें बहुत शान्ति मिल
रही है। सुबह उठे तो कान बिल्कुल ठीक था । सो गुरुमुखो प्रारब्ध कर्म से कोई नही
बच सकता। हाँ अगर जीव सन्तों के शरण में जाकर नाम की कमाई व सेवा करता है तो श्री
सतगुरु सूली का काँटा बनाकर साधक को उस कर्म से बचा लेते है। संचित कर्म ज्ञानि
द्वारा नाश हो जाते है। इसलिए महापुरुष फ़रमाते हैं अगर अपना लोक परलोक सवांरना है
मृत्यु को सुधारना है तो हमेशा शुभ कर्म व निष्काम कर्म करो। निष्काम कर्म का अर्थ
है कि बिना किसी कामना के कर्म करना जब कर्म करके हम कर्ता बनते है तो उस कर्म का
फल भी हमें भोगना है। चाहे अच्छे कर्म हो या बुरे अगर निष्काम सेवा सुमिरण करेंगे
तो लोक परलोक में सतगुरु सहाई होंगे।
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