Friday, January 8, 2016

11.01.2016छठी पादशाही जी को श्रद्धालु ने पाँच पैसे भेंट किये

 
     प्रेमी के मैं कर बिकूं ये तो मेरा उसूल।
            चार मुक्ति दूँ ब्याज में दे न सकूँ मूल।।
छठी पातशाही श्री गुरुगोबिन्द साहिब जी की, उस समय के देहली के बादशाह शाहजहान से मित्रता थी। कभी कभी बादशाह शाहजहान आपको अपने साथ शिकार में शामिल होने का निमन्त्रण भी दिया करते थे, एक बार ऐसा हुआ कि शाहजहान के निमन्त्रण पर श्री गुरु जी उनके साथ शिकार के लिये निकले। शिकार के लिये जंगल में खैमे लगाये गये। सप्ताह दो सप्ताह तक के लिये जंगल में डेरा था। संयोग की बात कि श्री गुरु जी और शाहजहान के खैमें (तम्बू) पास-पास थे। बीच में फकत एक छोटा सा जंगल था। इन बड़े खैमों के दोनों तरफ छोटे छोटे तंबओं में एक ओर शाहजहान के सिपाही, दरबारी और अन्य लाव-लश्कर आदि के लोग तथा दूसरी ओर श्री गुरु जी के शिष्य सेवक थे।
     श्री गुरु जी का डेरा लाहौर के जंगल के पास होने की खबर आस-पास के गाँवों में हो गई। लाहौर के निकटवर्ती किसी एक गाँव का रहने वाला एक गरीब घसियारा था, जो श्री गुरु जी पर अपार श्रद्धा रखता था। उसके मन में उनका परम-पवित्र दर्शन पाने की बड़ी लालसा थी, किन्तु निर्धन होने के कारण वह उनके दर्शन पाने अमृतसर साहिब तक न जा सकता था। निर्धन इतना कि सारा दिन घास खोदकर बेचता, तो बड़ी कठिनाई से चार या पाँच पैसे वसूल होते थे। उन्हीं में उसकी गुज़र बसर होती थी। उस ज़माने में अन्न सस्ता था और पैसे का मूल्य आज के ज़माना से कहीं अधिक था। तब चार पाँच पैसे में स्त्री-पुरुष दोनों की गुज़रान चल ही जाती थी।
     उस निर्धन प्रेमी को किसी के द्वारा जब पता चला कि गुरु जी यहीं निकट ही जंगल में पधारे हुये हैं, तो श्री दर्शन के लिये अच्छा अवसर जानकर उसने श्री चरणों में पहुंचने का इरादा किया। चित्त में सतगुरु की अपार श्रद्धा थी, पवित्र प्रेम था और सच्ची भक्ति थी। भक्त बहुत ही भोला-भाला और सीधा-साधा था। उसने सुन रखा था कि गुरु की शरण में जाने से भक्ति और मुक्ति का वरदान मिलता है,चौरासी के बन्धन से छूट जाता है और जीव सभी कष्टों-क्लेशों से मुक्त होकर सच्चे आनन्द को प्राप्त होता है। यही सोचकर श्री दर्शन की तीव्र इच्छा उसके मन में जाग पड़ी थी कि श्री गुरु जी के दर्शन पाकर अपने जीवन का कल्याण कर लूँ और जन्म सफल हो जाये। जाने का इरादा किया तो सोचा कि खाली हाथ कैसे जाऊँ तथा यदि ले जाऊं तो क्या भेंट लेकर जाऊँ? उस दिन का खोदा हुआ घास बेचकर उसे केवल पाँच पैसे मिले थे। वही लेकर चल पड़ा और वहाँ जा पहुँचा, जहाँ जंगल में श्री गुरु जी और शाहजहाँ के खैमे-डेरा साथ-साथ लगे हुये थे। सामने ही दो एक सन्तरी पहरा दे रहे थे। उसने आगे बढ़कर उनसे नम्रतापूर्वक पूछा,""प्यारे भाईयो! मैं सच्चे पादशाह का दर्शन करना चाहता हूँ, उनके दर्शन कहाँ होंगे?''
नोटः-पाठकों को मालूम रहे कि सिख-सेवक आमतौर पर गुरु जी को सच्चे पातशाह के नाम से सम्बोधन किया करते हैं।
     ये सन्तरी जिनसे प्रश्न किया गया था, बादशाह शाहजहाँ के पहरेदार थे और उस समय उन्हीं के खैमें के सामने पहरा दे रहे थे। उन्होने समझा कदाचित यह आदमी बादशाह सलामत (शाहजहाँ) की बाबत पूछ रहा है। एक सन्तरी ने हाथ के इशारे से शाहजहाँ का खैमा उसे बता दिया। प्रेमी सेवक (घसियारा) खैमें के भीतर जा पहुँचा। सामने ही एक जड़ाऊ सिंहासन पर तकिया लगाये हुये बादशाह शाहजहाँ बैठे थे। उनके तन पर मखमली पोशाक थी और सिर पर रेशमी पगड़ी में कलगी जड़ी थी, जो कि बादशाहों का खास निशान है। उस प्रेमी ने समझा-यही गुरु जी हैं। उसने आगे बढ़कर वही पाँच पैसे, जो वह साथ लाया था, भेंट रख दिये और दण्डवत् करता हुआ उनके आगे गिर पड़ा। साथ ही उसने अरदास की,""सच्चे पातशाह जी! मैं आपकी शरण में हूँ, सेवक को भक्ति-मुक्ति का वरदान मिले।'' शाहजहाँ यद्यपि बादशाह थे, तो भी गुरु जी के साथ मित्रता होने से यह भली प्रकार जानते थे कि उनके चरणों में प्रेमी शिष्य सेवक आकर इसी प्रकार अरदास किया करते हैं। इस प्रेमी की विनय सुनकर समझ गये कि भोला-भाला प्रेमी धोखा खा गया है। और गुरु जी के बदले यहाँ आन पहुँचा है। उस समय एक गुलाम शाहजहाँ के आगे हाथ बाँधे खड़ा था। उन्होंने उसे इशारे से बुलाकर समझाया कि इस प्रेमी से कह दो- ""सच्चे पातशाह का खैमा यह नहीं है। यह तो दिल्ली के बादशाह का खैमा है। सच्चे पातशाह का खैमा पास में दूसरा है, यह वहाँ जाये।'' गुलाम ने उस दण्डवत् करते हुये सेवक को उठाया और इशारे से सच्चे पातशाह का खैमा बतला दिया। सेवक ने उठकर तुरन्त अपनी भूल का अनुभव किया। उसने वे भेंट के लिये, लाये हुये पाँच पैसे वापिस उठा लिये और श्री गुरु जी के खैमे की तरफ चल पड़ा। अब शाहजहाँ के मन में उत्सुकता बढ़ी कि देखें श्री गुरुजी के साथ इस प्रेमी की क्या बातचीत होती है। दोनों खैमे पास ही पास तो थे, वे खैमे से कान लगाकर उधर की वार्ता सुनने लगे। भोला भाला प्रेमी दिल में सच्ची श्रद्धा और भक्ति को लिये हुए गुरु जी के चरणों में पहुँचा और वही पाँच पैसे, जोकि उसकी सारी पूँजी थी, उनकी भेंट रखकर श्री चरणों में गिर पड़ा। उसके नेत्रों से प्रेम के अश्रु झर-झर गिर रहे थे और मुख से अरदास कर रहा था, ""सच्चे पातशाह जी! मैं भूला-भटका आपकी शरण में आन पड़ा हूँ। भक्ति-मुक्ति का वरदान मिले।''
     श्री गुरु जी ने सेवक की सच्चाई और उसके पवित्र प्रेम को देखा। महापुरुष तो प्रेम और सच्चाई के वश में ही होते हैं। इस सच्चे सेवक की हार्दिक श्रद्धा से वे अत्यन्त प्रसन्न हुये और बोले, ""उठो प्रेमी! तथास्तु।'' निकट के खैमें में बैठा हुआ शाहजहाँ यह सब वार्ता सुन रहा था। उसके बाद श्री गुरुजी ने कुछ देर श्री मुख से उस सेवक के प्रतिपवित्र वचन-विलास किया। वह सच्चा प्रेमी निहाल और मालामाल होकर चला गया। उस प्रेमी के चले जाने के बाद बादशाह शाहजहाँ श्री गुरु जी से मिलने को आये। श्रीगुरुजी ने उनके लिये अलग मसनद लगवा दी। बादशाह बैठ गये तो बोले, ""गुरु जी! मैं आपसे एक बात पूछने आया हूँ। यह आपने मुक्ति का सौदा तो बहुत ही सस्ता लगा रखा है। सिर्फ पाँच पैसे में ही आप लोगों को मुक्ति का दान बख्श देते हैं। यह क्या भेद है?'' श्री गुरु जी ने उत्तर दिया, ""बादशाह सलामत! यह मुक्ति का सौदा तो सस्ता हरगिज़ नहीं। यह तो बहुत ही महँगा है। मैने इस प्रेमी को पांच पैसों के बदले मुक्ति नहीं दी, बल्कि उसके त्याग, बलिदान, उसकी अपार श्रद्धा, उसकी सच्चाई और उसके हार्दिक प्रेम के बदले ही मुक्ति बख्शी है। एक सच्चे प्रेमी की सच्ची श्रद्धा, भक्ति और उसके हार्दिक प्रेम के मूल्य का तो अंदाज़ा लगाया ही नहीं जा सकता। उसका मूल्य तो इतना बड़ा है कि एक मुक्ति तो चीज़ ही क्या है, यदि हज़ारों मुक्ति भी उसके बदले में दी जावें, तो कम हैं। दूसरी बात यह कि आप जिन पाँच पैसों को तुच्छ मान रहे हैं, यही इस बेचारे की सारी पूँजी है। मानों उसने अपना सर्वस्व भेंट करके मुक्ति का दान माँगा है। उसने आज भोजन भी नहीं किया। क्योंकि आज के घास के पैसे जिससे वो अपना राशन खरीद कर भोजन करता था। वे सारे पैसे भेंट कर दिये और स्वयं भूखा रह गया। इससे आप समझ सकते हैं कि उसकी कुर्बानी कितनी बड़ी है? अगर कोई हमें अपना सारा राज्य भी भेंट कर दें तो भी भक्ति-मुक्ति का अधिकारी नहीं हो सकता। अगर उसमें श्रद्धा प्रेम नहीं है। श्री गुरु जी का यह उत्तर सुनकर शाहजहाँ अति प्रसन्न हुये और अपने खैमे में लौट गये।
      भाव का भूखा हूं मैं और भाव ही बस सार है।
            भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है।।

 नारायण जप योग तप सब तो प्रेम प्रवीण।
            प्रेम हरि को करत है प्रेमी के आधीन।।

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