Friday, January 8, 2016

12.01.2016संसार के धन्धे मेंढक तौलने की तरह


सत्पुरुषों के वचन हैंः-  भई परापत मानुख देहुरिया। गोबिंद मिलण की इह तेरी बरिआ।।
                     अवरि काज तेरै कितै न काम। मिलु साध संगति भजु केवल नाम।।
अर्थः-ऐ मनुष्य! तुझे जो यह मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, यह परमात्मा से मिलने का अवसर तेरे हाथ आ गया है। यदि इस शरीर में परमात्म-प्राप्ति का कार्य न किया और अन्य संसारिक कार्यों में ही फँसा रहा, तो स्मरण रख कि भजन-सुमिरण के अतिरिक्त अन्य सभी कार्य तेरे किसी काम नहीं आयेंगे अर्थात् परलोक में तुझे कोई लाभ नहीं पहुँचायेंगे। इसलिये सन्तों सत्पुरुषों की शरण-संगति में जाकर प्रभु-नाम का सुमिरण कर।
अज्ञानवश मनुष्य यह भूल जाता है कि वह संसार में किसलिये आया है और किसलिये उसे श्रेष्ठ मनुष्य-जन्म प्राप्त हुआ है? अपने वास्तविक काम को भूलकर वह संसार के अन्य कार्यों में फंस जाता है। जब सन्त महापुरुष जीव को समझाते हैं कि भाई! प्रभु का भजन सुमिरण करो, तो वह उत्तर देता है कि महाराज! क्या करुँ? चाहता तो बहुत हूँ परन्तु मेरे इतने काम धंधे हैं कि मुझे उनसे अवकाश ही नहीं मिलता। तनिक इन काम धंधों से छुटकारा मिल जाये, तब भजन-सुमरिण करूँगा।
    एक वैद्य जी बड़े ही विचारवान और पूर्ण सदगुरु के शिष्य थे। दुकान के अतिरिक्त उनके पास जो समय बचता, सत्संग तथा परमात्मा के सुमिरण ध्यान में व्यतीत करते थे। उनके एक बचपन के मित्र दिन-रात सांसारिक कार्यों में ही व्यस्त रहते थे। यद्यपि वैद्य जी उन्हें बहुत समझाते कि कुछ समय सत्संग और परमात्मा के सुमिरण ध्यान में भी लगाया करो ताकि तुम्हारा परलोक संवर जाये, परन्तु वे सदैव यही उत्तर देते, मुझे संसार के काम धंधों से ही अवकाश नहीं मिलता, फिर भजन सुमिरण कैसे करुँ? जब ये धंधे पूरे हो जायेंगे तो भजन सुमिरण भी कर लूँगा।
     एक दिन वैद्य जी अपनी दुकान पर बैठे थे, वर्षा हो रही थी औेर निकट ही तालाब में मेंढक टर्र-टर्र कर रहे थे। इतने में वैद्य जी के मित्र उनसे मिलने के लिये आ गये। वैद्य जी ने उन्हें एक मटकी देते हुये कहा-मित्र! एक काम तो करो। तालाब पर जाकर इस मटकी में पाँच किलो के लगभग मेंढक पकड़कर ले आओ, परन्तु ध्यान रखना कि कोई मेंढक मरने न पाये। वैद्य जी के मित्र ने सोचा कि किसी औषधि के परीक्षण के लिये उन्हें मेंढकों की आवश्यकता होगी, इसलिये वे मटकी लेकर तालाब पर चले गये और युक्ति पूर्वक पकड़-पकड़ कर मेंढकों को मटकी में डालने लगे। जब उनके अऩुमान से पांच किलो के लगभग मेंढक हो गये। तो उन्होंने मटकी लाकर वैद्य जी के सम्मुख रख दी। वैद्य जी पहले से ही एक तराजू लेकर तैयार बैठे थे। मित्र के आते ही उन्होंने दुकान का द्वार बन्दकर दिया और मित्र के हाथ में तराज़ू पकड़ाते हुये बोले-मैं साथ वाले कमरे में जा रहा हूँ, तुम पाँच किलो मेंढक तोलकर उस कमरे में ले आओ मित्र ने एक पलड़े में पाँच किलो का बाट रखा और दूसरे पलड़े में मेंढकों को उलट दिया। पलड़े में गिरते ही मेंढक-फुदक फुदक कर इधर-उधर भागने लगे। वे सज्जन उन्हें पकड़-पकड़कर पलड़े में रखते और मेंढक कूद-कूदकर पलड़े से बाहर निकल जाते। भाग-भाग कर वह सज्जन परेशान हो गये, परन्तु मेंढकों को तोलने में सफल नही हो सके। जब काफी समय बीत गया, तो वैद्य जी ने मित्र को सम्बोधित करते हुए कहा-अरे मित्र! इतनी देर क्यों कर रहे हो? शीघ्र मेंढक तोलकर ले आओ। यह कहते हुए वैद्य जी उसी कमरे में आ गये। उन्हें
देखते ही उनके मित्र बोले-इन मेंढकों को तोलना मेरे बस की बात नहीं है। मैं तो भागते भागते परेशान हो गया।      वैद्य जी बड़ी ज़ोर से हँसे, फिर प्रेमपूर्वक समझाते हुए बोले-देखो भाई! जैसे इन मेंढकों की तोल को पूरा करना कठिन है, वैसे ही संसार के धन्धे भी कभी पूरे नहीं होते।
     माया दे धन्धियां विच उलझिया फिरें, बन्दिया तूं सांझ सवेरे।
     ज़िन्दगी तेरी मुक जाणी, पर कम्म नहीं मुकने तेरे।
      जिस प्रकार मेंढक पकड़ में नहीं आते, तुम एक को पकड़ते हो, तो दूसरा इधर-उधर कूद जाता है, दूसरे को पकड़ते हो, तो तीसरा कूद कर पलड़े के बाहर हो जाता है, उसी प्रकार सांसारिक धन्धों की भी स्थिति है। मनुष्य अनाज का प्रबन्ध करता है, तो लकड़ी समाप्त हो जाती है, लकड़ी लाता है, तो घी समाप्त हो जाता है। आज लड़की का विवाह है तो कल लड़के की सगाई है। आज किसी के जन्म लेने की खुशी है, तो  कल किसी के मरने का दुःख। अभिप्राय यह कि इसी हेर-फेर में आयु समाप्त हो जाती है, परन्तु ये सांसारिक धन्धे समाप्त होने में नहीं आते, परिणामस्वरुप मनुष्य इन्हीं गोरख धन्धों में फँसा हुआ अपना जीवन नष्ट कर लेता है। इन धन्धों से न उसे अवकाश मिलता है और न ही वह परमात्मा के भजन-सुमिरण के वास्तविक कार्य को कर पाता है।
यह करता हूँ यहकर लिया मैंने इसी फिक्रो इऩ्तज़ार में शामो सहर गई।
ज़िन्दगी भर फुर्सत न होगी काम से। एक समय ऐसा निकालो प्रेम कर लो राम से।
       इसलिये मेरा कहा मानो और सांसारिक कर्तव्यकर्म करने के साथ साथ परमात्मा के भजन सुमिरण और सत्संग की ओर भी ध्यान दो। इसी में तुम्हारी भलाई है। वैद्य जी के उपदेश से वे सज्जन अत्यन्त प्रभावित हुये और उस दिन से नित्यप्रति सत्संग में आने-जाने और भजन सुमिरण करने लगे।
       सन्त महापुरुष संसार के काम धन्धे करने को मना नहीं करते, फरमाते हैं कि संसार के काम बेशक करो लेकिन अपनी आत्मा के कल्याण का कार्य भी अवश्य करो। मानुष जन्म का असली मकसद है परमात्मा की प्राप्ति उसके लिये भी प्रयत्न करो, अर्थात् संत महापुरुषों की संगत में जाकर उनसे नाम दीक्षा लेकर नाम की कमाई भी करो। ताकि तुम्हारा ये जीवन भी सुखपूर्वक व्यतीत हो और परलोक भी संवर जाये। सौभाग्यशाली हैं वे जीव, जो सत्पुरुषों की चरण-शरण में आ जाते हैं, उनके  द्वारा बनाये हुये परमात्मा प्राप्क्षि के साधनों को अपना कर और नाम की कमाई में लग जाते हैं। ऐसे गुरुमुख जीव ही इस संसार से सच्चा लाभ कमाकर जाते हैं और परलोक में उज्जवल मुख होते हैं। उनके लोक और परलोक दोनों सँवर जाते हैं।

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