संसार में जीवन व्यतीत करते हुये हर व्यक्ति की हार्दिक कामना या दिली ख्वाहिश क्या होती है? उसके लिये सतपुरुषअपनी वाणी में वर्णन करते हैं:-
है ख्वाहिश हर इन्सान के दिल में मिले खुशी आनन्द अपार हरदम।
पड़े कभी न दुःख की छाँव काली रहें दूर सब गम अज़ार हरदम।
कहें सन्त सुख की चाह अच्छी बेशक रखो ऊँचे विचार हरदम।
मगर सुख केसाधन भी करना है वाज़िब पूर्ण पूरुष कहें बारबार हरदम।
बिना मालिक की भजन बन्दगी के रहे आत्मा दुःखीऔर खुआर हरदम।
मिले सुख कैसे मिटें दुःख क्योंकर जब तक न सिमरे करतार हरदम।।
संसार के हर एक व्यक्ति की ये कामना या ख्वाहिश हुआ करती है कि मुझे हमेशा खुशी और आनन्द प्राप्त हो मेरा जीवन सुख और शान्ति से व्यतीत हो मेरे जीवन पर कभी भी दुःख की काली छाँव न पड़े मैं हमेशा कल्पनाओं चिन्ताओं व परेशानियों से मुक्त रहूं। शाश्वतआनन्द को प्राप्त करने के लिये दिन रात दौड़ धूप करता है हमेंशा इस बात की तलाश में रहता है कि जीवन में ऐसा क्षण आ जाये विराम आ जाये जिसके बाद कुछ भी पाने को शेष न हो क्योंकि जब तक कुछ भी पाने को शेष है तब तक दुःख चिन्ता कल्पना से छुटकारा पाना असम्भव है।आनन्द उसीअवस्था का नाम है जब कोई व्यक्ति वहाँ पहुँच जाये जहाँ से आगे जाने के लिये कुछ भी शेष न रहे तनाव न रहे। सन्त महापुरुष कहते हैं कि खुशी और आनन्द की चाह रखना अच्छा है बुरा नहीं। शाश्वत आनन्द को प्राप्त करना जीव का जन्म सिद्ध अधिकार है बल्कि ऐसा कहना चाहिये कि जीवन काअसली मकसद उस सच्ची खुशी और शाश्वत आनन्द को प्राप्त करना ही है। लेकिन उसके लिये ये वाज़िब है,ये भी ज़रूरी है कि जीव उन्हीं साधनों को अपनाये जिनसे सच्ची खुशी और आनन्द प्राप्त हो सके।आम संसारी जीवों की हालत की ओर देखें तो मालूम होता है कि कई प्रकार के यत्न और पुरुषार्थ करने पर भी जीव को आनन्द प्राप्त नहीं हुआ अगर प्राप्त हो गया होता तो सभी भागदौड़ समाप्त हो गई होती। उल्टा जीव को दुःख ही दुःख प्राप्त हुआ है।
यत्न बहुत सुख के किये दुःख का किया न कोय।
तुलसी यह आश्चर्य है अधिक अधिक दुःख होय।।
जीव अपनी बुद्धि अनुसार जन्म जन्मान्तरों से खुशी प्राप्त करने के लिये हज़ारो तरह के यत्न और उपाय करता रहा है आनन्द मिलना तो दूर उल्टा अधिकाधिक दुःखों का शिकार हुआ है। उसे दुःख ही प्राप्त हुआ है।कारण क्या है इतना परिश्रम करने पर भी आनन्द प्राप्त नहीं होता? इसका सीधा सा उत्तर है कि जिन साधनों से जीव को खुशी प्राप्त हो सकती थी उन साधनों के तो उसने अपनाया नहीं और दूसरे दूसरे ही उपाय करता रहा है। क्योंकि जिस किसी कार्य को सिद्धकरना हो उसके लिये ये ज़रूरी हो जाता है कि उसी कार्य से सम्बन्धित सामग्री और साधन जुटायें जायें तभी वह कार्य पूर्ण हो सकेगा।जैसे किसी को भूख लगी हो तो उस के लिये अनाज, फल,दूध और कोई खाद्य पदार्थ एकत्र करना होगा अगर वह खाने वाले खाद्य पदार्थ एकत्र करने बजाय र्इंटें सिमेन्ट गिट्टीआदि एकत्र करता रहे तो उसकी भूख कैसे मिटेगी अगर किसी को मकान बनाना हो तो वह ईटों गिट्टी सिमेन्ट आदि सामग्री की बजाय खाद्य पदार्थ एकत्र करता रहे तो कैसे वह मकान बना पायेगा। इसलिये ऐसा ही लगता है कि जीव को अगर कई जन्मों से प्रयत्न करने पर भी आनन्द प्राप्त नहीं हुआ तो ज़रूर कहीं भूल हो रही है।
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