Saturday, January 30, 2016

जैसा कर्म करेगा बंदे वैसा फल देगा भगवान।


किसी ने क्या ही अच्छा कहा है –
जो करोगे दुनिया में, पाओगे आखिर को वही ।
नेक है नेकी का बदला, बद का बदला है बदी ।।
बीज होगा जैसा, वैसा फल उगेगा खेत मे ।
बोए जौ और मिले गन्दुम (गेहूँ), यही नहीं होगा कभी ।।
            बुद्धिमानों का कहना है कि संसार एक प्रकार का कर्मक्षेत्र है । मनुष्य के जैसे कर्म होंगे, वैसा ही उसका जीवन बनेगा । अपने किये कर्मों का फल अनिवार्य रूप से सब को भुगतान पड़ता है । जौ बोने से जौ की फसल होगी गेहुँ बोने से गेहुँ की । इसी प्रकार मनुष्य द्वारा जैसे कर्म होंगे, वैसा ही उसे फल मिलेगा । इस विषय पर एक प्राचीन कथा है । जो रोचक होने के साथ साथ शिक्षाप्रद भी है ।
जगत – विख्यात हकीम लुकमान के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे अति गरीब परिवार मे उत्पन्न हुए थे । किन्तु इस स्वनाम धन्य विचारक को प्राकृति ने आलौकिक बुद्धि प्रदान की थी। माता पिता बचपन मे ही छोड़कर दुनिया से चले गये थे । प्रत्येक मनुष्य की बुद्धि और उसका मस्तिष्क भी उस के पूर्व कर्मों के अनुसार हुआ करता है । बचपन मे यह बिना माता-पिता का बालक गली कूचों मे भीख माँग कर निर्वाह करता था । उन दिनों में दास प्रथा प्रचलित थी । धनवान और जमींदार लोग गुलामों की मण्डी मे जाकर गुलाम खरीद लेते और जीवन पर्यंत्त पशुओं की तरह काम लेते। लुकमान भी ऐसे ही लोगो के हाथ आ गया। एक सौ दीनार के बदले लुकमान को एक जागीरदार ने खरीद लिया । यह जागीरदार बहुत ही विलासी और निर्दयी व्यक्ति था । उसके पास अनेकों दास थे जिन से डंडे के जोर पर काम लेता था। लेकिन लुकमान को परमात्मा ने उच्चकोटि की सूझ-बूझ भी दी थी । वह बाल्यकाल से ही ईश्वर का उपासक था । तथापि उसे अपने नए मालिक के साथ निर्वाह करना था । थोड़े दिनो मे ही लुकमान ने अपने मालिक पर अपनी बुद्धि का सिक्का बिठा दिया । मालिक ने उसे अपने गुलामों की टोली का सरदार नियुक्त कर दिया । अब लुकमान अपनी टोली से काम लेना था । पर वह बड़ा ही दयालु एवं स्नेह शील था । सब दासों के साथ भाईयों जैसा व्यवहार करता उनके सुख-दुख का ध्यान रखता । अलबत्ता उसके दिमाग मे एक बात सदा गूंजती रहती थी वह यह कि उसे ऐसा अवसर मिले जब वह अपने मालिक को दुष्कर्मों तथा विलासप्रियता से दूर रखने के लिए अच्छा पाठ पढ़ा सके । अन्तत: एक दिन उसे अवसर मिल ही गया । उस दिन मालिक ने लुकमान को बुलाकर कहा कि बीस दासों को लेकर जाओ और अमुक खेत में बढ़िया गेहुँ बो दो । गुलामों को लेकर लुकमान चला गया । संध्या समय जब वह काम से लौटा तो मालिक ने पूछा क्या खेतों मे बीज बो दिया ?  लुकमान ने उत्तर दिया , हाँ मलिक ।
मालिक ने पूछा पर बीज बढ़िया गेहुँ का डाला है ना’ ?
लुकमान बोला नहीं मालिक! हमने खेतो ने बढ़िया जौं बोया है ।
मालिक को आश्चर्य हुआ । वह तानिक गर्म होकर बोला, हम ने तो बढ़िया गेहुँ बोने को कहा था, फिर तुमने जौ क्यों बोया ।
लुकमान ने सरल भाव से उत्तर दिया, हे मालिक ! इससे क्या अन्तर पड़ता है । फसल काटने के समय हम लोग जौ के स्थान पर गेहुँ की फसल काटेंगे। मालिक का आश्चर्य और बढ़ा । आश्चर्यपूर्ण मुद्रा मे उसने कहा, परन्तु तुम तो कह रहे हो कि खेत मे जौ बोया गया है ।
लुकमान पूर्ववत गम्भीर था । उसने उत्तर दिया, हाँ मालिक । बोया तो हमने जौ ही है , किन्तु फसल तो हम गेहुँ की ही काटेंगे । इस पर जमीदार के नेत्र रोब से लाल हो गये आग उगलता वह बोला, मूर्ख ! जब बीज ही जौ का बोया है, तो फसल गेहुँ की कैसे हो सकती है? मालिक के रोब की तनिक भी परवाह न करते हुए निर्भीकता पूर्ण उत्तर दिया, सरकार ! हम लोग जौ के बीज से गेहुँ का फसल उसी प्रकार काटेंगे , जैसे कि आप रात दिन अन्याय, अत्याचार और विलासता के बीज बोकर भी यह आशा करते है कि परलोक मे सुख मिलगा ।
यह गूढ़ तथा बुद्धिमता पूर्ण उत्तर ने मालिक को निरूत्तर कर दिया । उस के नेत्रो पर बँधी हुई गफ़लत एवं अज्ञान की पट्टी खुल गई । जो जो उसने पाप किये थे सब के चित्र उस की आँखों मे घूमने लगे। एक समय आता है जब मनुष्य के अपने ही बुराई के विचार भूत बन कर उसे भयभीत करने लगते है । वही समय लुकमान के मालिक का भी आ गया । क्यों कि अब उसे विश्वास हो गया कि मै भी अन्त मे वही काटूँगा, जो बो रहा हूँ। इस विचार के आते ही उसकी दशा बदल गई । मालिक रोता हुआ लुकमान के पैरों पर गिर पड़ा । और नम्रता पूर्वक बोला । मै नही जानता था आप इतने बुद्धिमान व प्रभु भगत है । अज्ञान वश ही मै आपसे दासों का काम लेता रहा । परन्तु अब मै आप की बड़ाई को जान गया हूँ । आपने मुझे घोर गर्त मे गिरने से बचा लिया है ।
उस दिन के बाद लुकमान के मालिक की काया पलट गई । शनै:  शनै: वह बुरे स्वभाव को त्याग कर धर्मात्मा सत्य प्रिय एवं ईश्वर भक्त बन गया । कहने का अभिप्राय यह कि हमारे जीवन का भला अथवा बुरा परिणाम मात्र हमारे जीवन अपने विचारों व कर्मो पर निर्भर है । विचार ही हमारे जीवन को संवारते है और विचार ही बिगाड़ते है
हम जिस प्रकार के विचारों के बीज इस जन्म मे बोते है आगामी जीवन मे काटते है । जैसे कर्म होंगे उन का फल भोगने के लिए वैसी ही योनि मे जन्म लेना पड़ता है । इस प्रकार यह क्रम , यह आवागमन का चक्र चलता रहता है । इस चक्र से छुटकारा पा सकना जीवात्मा के लिए कठिन होता है
यही कारण है कि सन्तों के सत्संग मे यह शिक्षा बार बार दी जाती है । कि अपने मन वचन एवं कर्म को सदैव निर्मल बनाए रखो । क्योंकि निर्मल विचार होंगे तो अच्छे कर्म होंगे । जिस प्रकार मकान बनाने के लिए जैसा मसाला प्रयोग होगा मकान तो वैसा ही बनेगा । अतएव परमार्थ के तलबगार को सदा अपने विचारों को निर्मल बनाने की और पूरा ध्यान देने की आवश्यकता है । हमारा मन हमारे विचार तब ही निर्मल बन सकते है जब हम महापुरुषों की चरण-शरण मे जाकर तन से निष्काम सेवा मन को सुमिरण में लागाये और अपनी मनमुखता को छोड़कर गुरुमत धारण करेंगे । सतगुरु की प्रसन्नता पाकर हमारा जनम – मरण कट जायेगा ।

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