गुरु का वचन उलंघि करि, जो सेवक कहीं जाय।
जहां जाय तहां काल है, कहै कबीर समुझाय।।
एक दिन दीवान योगराज जी और श्री प्रभदयाल जी कोहाट से टेरी में श्री चरणों में उपस्थित हुए। सायंकाल जब उन्होंने वापस जाने की आज्ञा मांगी तो श्री महाराज जी सुनकर चुप हो रहे। चुंकि समय बहुत कम था अतः दीवान साहिब ने दो-तीन बार पुनः आज्ञा के लिये विनय की, परन्तु श्री महाराज जी ने फिर भी कोई उत्तर न दिया और इधर-उधर की बातचीत करने के पश्चात् फरमाया कि एक दिन हम जयपुर में एक महात्मा जी के पास बैठे थे (वास्तव में वे महात्मा श्री महाराज जी स्वयं ही हैं, परन्तु अपने आपको प्रकट न करने के लिए किसी महात्मा का नाम लेकर सारा वृत्तान्त सुना रहे हैं) उनका यह नियम था कि चाहे कोई आये चाहे कोई जाये, किसी से जाने या ठहरने के लिये नहीं कहते थे। एक दिन एक साहिब ने कुछ देर ठहर कर जाना चाहा तो महात्मा जी ने कहा-ठहरो!अभी जाकर क्या करोगे। वे साहिब थोड़ी देर तो रुक गये, परन्तु चूंकि उनको कोई आवश्यक कार्य था अतः पुनः जाने की आज्ञा चाही। महात्मा जी ने भी पुनः कहा कि साहिब थोड़ी देर तो और ठहरिये। यद्यपि यह बात इनके नियम के विरुद्ध थी, अतः हमने पूछा कि आज उनको आग्रह के साथ रोकने का क्या कारण है? तो फरमाया कि इस पर कुछ कष्ट आने वाला है, यदि ये यहां ठहर जाते तो कदाचित मेरे भगवान इसकी कुछ सहायता कर सकते। यह सुनकर वह साहिब हँस दिये। चूंकि उनको आवश्यक कार्य था अतः रुके नहीं और चल दिये।
मार्ग में जाते हुए एक खेत से गुज़रने लगे। वहां एक कड़ाहे में गुड़ का रस पड़ा हुआ था, परन्तु कड़ाहा धरती के अन्दर था और उस पर चटाई पड़ी हुई थी। वे साहिब उसमें जा गिरे। लोगों ने दौड़कर निकाला, परन्तु गुड़ का रस चूंकि अत्यधिक गर्म था अतः शरीर कमर तक झुलस गया। लोग उठाकर महात्मा जी के पास लाये तो उन्होने फरमाया कि मैं क्या करुँ? मैने तो इन्हें जाने से बहुत रोका था परन्तु इन्होंने नहीं माना। फिर कुछ औषधि आदि लगाने के लिये बतला दी।
इतना फरमाकर श्री महाराज जी तो चुप हो गये परन्तु चूंकि बाबू साहिब के जाने का समय तंग होता जा रहा था और काम भी अति आवश्यक था, अतएव वे खड़े हो गये और श्री महाराज जी से आज्ञा चाही। लाचार श्री महाराज जी ने आज्ञा दे दी। कई सत्संगी बाबू जी को पहुंचाने के लिये दूर तक गये। बाबू जी टमटम पर सवार हुये। टमटम अभी थोड़ी दूर ही गई थी कि उलट गई। बाबू साहिब को तो मामूली सी चोट आई परन्तु दीवान साहिब के पाँव से लेकर कमर तक सख़्त चोट आई, यहां तक कि सवार होना भी कठिन हो गया।
उस समय उन्हें श्री महाराज जी के पावन वचनों का ध्यान आया कि श्री प्रभु तो सब कुछ जानते हैं। इस कष्ट से बचाने के लिये ही मेरे बार-बार आज्ञा मांगने पर भी मुझे आज्ञा नहीं दे रहे थे परन्तु मेरा दुर्भाग्य मुझे ज़बरदस्ती यहां खींच लाया। यदि मैं श्री वचन मानकर वहीं रुक जाता तो इस कष्ट से बच जाता, परन्तु अब सिवा पछताने के और क्या हो सकता है। जो सत्संगी उन्हें पहुँचाने गये थे उनके साथ दीवान साहिब वापस आकर श्री चरणों में उपस्थित हुये। श्री महाराज जी ने तत्काल इलाज आदि का प्रबन्ध करवाया और लगभग बीस दिनों के पश्चात् चलने-फिरने के योग्य हुये, तब वापस कोहाट गये।
इस वृत्तान्त से स्पष्ट है कि सन्त सत्पुरुष त्रिकाल-दर्शी होते हैं। उन्हें तो सेवक की भलाई का ही विचार रहता है। उनकी प्रत्येक मौज और आज्ञा में सेवक की भलाई और अच्छाई ही निहित होती है। जो भाग्यशाली सेवक अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरुदेव जी की मौज और आज्ञानुसार चलते हैं, वे सभी कष्टों से बचे रहते हैं।
जहां जाय तहां काल है, कहै कबीर समुझाय।।
एक दिन दीवान योगराज जी और श्री प्रभदयाल जी कोहाट से टेरी में श्री चरणों में उपस्थित हुए। सायंकाल जब उन्होंने वापस जाने की आज्ञा मांगी तो श्री महाराज जी सुनकर चुप हो रहे। चुंकि समय बहुत कम था अतः दीवान साहिब ने दो-तीन बार पुनः आज्ञा के लिये विनय की, परन्तु श्री महाराज जी ने फिर भी कोई उत्तर न दिया और इधर-उधर की बातचीत करने के पश्चात् फरमाया कि एक दिन हम जयपुर में एक महात्मा जी के पास बैठे थे (वास्तव में वे महात्मा श्री महाराज जी स्वयं ही हैं, परन्तु अपने आपको प्रकट न करने के लिए किसी महात्मा का नाम लेकर सारा वृत्तान्त सुना रहे हैं) उनका यह नियम था कि चाहे कोई आये चाहे कोई जाये, किसी से जाने या ठहरने के लिये नहीं कहते थे। एक दिन एक साहिब ने कुछ देर ठहर कर जाना चाहा तो महात्मा जी ने कहा-ठहरो!अभी जाकर क्या करोगे। वे साहिब थोड़ी देर तो रुक गये, परन्तु चूंकि उनको कोई आवश्यक कार्य था अतः पुनः जाने की आज्ञा चाही। महात्मा जी ने भी पुनः कहा कि साहिब थोड़ी देर तो और ठहरिये। यद्यपि यह बात इनके नियम के विरुद्ध थी, अतः हमने पूछा कि आज उनको आग्रह के साथ रोकने का क्या कारण है? तो फरमाया कि इस पर कुछ कष्ट आने वाला है, यदि ये यहां ठहर जाते तो कदाचित मेरे भगवान इसकी कुछ सहायता कर सकते। यह सुनकर वह साहिब हँस दिये। चूंकि उनको आवश्यक कार्य था अतः रुके नहीं और चल दिये।
मार्ग में जाते हुए एक खेत से गुज़रने लगे। वहां एक कड़ाहे में गुड़ का रस पड़ा हुआ था, परन्तु कड़ाहा धरती के अन्दर था और उस पर चटाई पड़ी हुई थी। वे साहिब उसमें जा गिरे। लोगों ने दौड़कर निकाला, परन्तु गुड़ का रस चूंकि अत्यधिक गर्म था अतः शरीर कमर तक झुलस गया। लोग उठाकर महात्मा जी के पास लाये तो उन्होने फरमाया कि मैं क्या करुँ? मैने तो इन्हें जाने से बहुत रोका था परन्तु इन्होंने नहीं माना। फिर कुछ औषधि आदि लगाने के लिये बतला दी।
इतना फरमाकर श्री महाराज जी तो चुप हो गये परन्तु चूंकि बाबू साहिब के जाने का समय तंग होता जा रहा था और काम भी अति आवश्यक था, अतएव वे खड़े हो गये और श्री महाराज जी से आज्ञा चाही। लाचार श्री महाराज जी ने आज्ञा दे दी। कई सत्संगी बाबू जी को पहुंचाने के लिये दूर तक गये। बाबू जी टमटम पर सवार हुये। टमटम अभी थोड़ी दूर ही गई थी कि उलट गई। बाबू साहिब को तो मामूली सी चोट आई परन्तु दीवान साहिब के पाँव से लेकर कमर तक सख़्त चोट आई, यहां तक कि सवार होना भी कठिन हो गया।
उस समय उन्हें श्री महाराज जी के पावन वचनों का ध्यान आया कि श्री प्रभु तो सब कुछ जानते हैं। इस कष्ट से बचाने के लिये ही मेरे बार-बार आज्ञा मांगने पर भी मुझे आज्ञा नहीं दे रहे थे परन्तु मेरा दुर्भाग्य मुझे ज़बरदस्ती यहां खींच लाया। यदि मैं श्री वचन मानकर वहीं रुक जाता तो इस कष्ट से बच जाता, परन्तु अब सिवा पछताने के और क्या हो सकता है। जो सत्संगी उन्हें पहुँचाने गये थे उनके साथ दीवान साहिब वापस आकर श्री चरणों में उपस्थित हुये। श्री महाराज जी ने तत्काल इलाज आदि का प्रबन्ध करवाया और लगभग बीस दिनों के पश्चात् चलने-फिरने के योग्य हुये, तब वापस कोहाट गये।
इस वृत्तान्त से स्पष्ट है कि सन्त सत्पुरुष त्रिकाल-दर्शी होते हैं। उन्हें तो सेवक की भलाई का ही विचार रहता है। उनकी प्रत्येक मौज और आज्ञा में सेवक की भलाई और अच्छाई ही निहित होती है। जो भाग्यशाली सेवक अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरुदेव जी की मौज और आज्ञानुसार चलते हैं, वे सभी कष्टों से बचे रहते हैं।
Jai gura di
ReplyDeleteJai sachidanand ji
" Bolo Jai Kara Bol Mere Shri Gurumaharaj ki Jai "
ReplyDelete😇 💐 🙏 🙏 🙏 💐 😇
" Bolo Jai Kara Bol Mere Shri Gurumaharaj ki Jai "
ReplyDelete😇 💐 🙏 🙏 🙏 💐 😇